नई दिल्ली। भारत को रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) लगातार नई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। मिसाइल तकनीक से लेकर अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों तक, DRDO देश की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन अब इसी संगठन की वैज्ञानिक भर्ती को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।
जाने-माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शेखर गुप्ता ने DRDO के हालिया भर्ती विज्ञापन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतने महत्वपूर्ण पदों के लिए प्रस्तावित वेतन देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उनकी टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर सरकारी वैज्ञानिकों के वेतन, प्रतिभा पलायन और राष्ट्रीय सेवा के बीच संतुलन को लेकर व्यापक चर्चा छिड़ गई है।
क्या है DRDO का भर्ती विज्ञापन?
Just look at these salaries. A scientist after 11 years gets basic pay of 1,23,000. With DA, allowances might reach 2 lakhs or thereabouts. There’s a challenge with govt salaries, but this won’t attract the best talent. https://t.co/gZY22mS5jg
— Shekhar Gupta (@ShekharGupta) June 7, 2026 DRDO ने हाल ही में साइंटिस्ट-सी, साइंटिस्ट-डी और साइंटिस्ट-ई पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया। यह भर्ती रक्षा अनुसंधान एवं विकास सेवा (DRDS) के अंतर्गत की जा रही है।
विज्ञापन के अनुसार साइंटिस्ट-ई पद के लिए लगभग 11 वर्ष का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों की आवश्यकता है। इस पद के लिए सातवें वेतन आयोग के अनुसार 1,23,100 रुपये मासिक बेसिक वेतन निर्धारित किया गया है।
वहीं साइंटिस्ट-डी पद के लिए 78,800 रुपये तथा साइंटिस्ट-सी पद के लिए 67,700 रुपये बेसिक सैलरी तय की गई है। इसके अलावा महंगाई भत्ता (DA), हाउस रेंट अलाउंस (HRA), ट्रांसपोर्ट अलाउंस और अन्य सरकारी सुविधाएं भी मिलती हैं।
सरकारी वेतन संरचना के अनुसार कुल मासिक वेतन बेसिक सैलरी से काफी अधिक हो सकता है। फिर भी इस वेतन को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या यह आज के प्रतिस्पर्धी टेक्नोलॉजी और डिफेंस सेक्टर के मुकाबले पर्याप्त है।
शेखर गुप्ता ने क्या कहा?
शेखर गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर DRDO की भर्ती पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि 11 वर्षों का अनुभव रखने वाले वैज्ञानिक को 1.23 लाख रुपये बेसिक सैलरी मिलना चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि सभी भत्तों को जोड़ने के बाद भी कुल वेतन लगभग 2 लाख रुपये प्रतिमाह या उससे थोड़ा अधिक होगा। उनके अनुसार इतनी विशेषज्ञता और अनुभव रखने वाले वैज्ञानिकों के लिए यह राशि निजी क्षेत्र की तुलना में काफी कम है।
गुप्ता ने सवाल उठाया कि यदि भारत को विश्वस्तरीय वैज्ञानिक और इंजीनियर चाहिए तो क्या वर्तमान सरकारी वेतन संरचना पर्याप्त है? उनका मानना है कि कम वेतन के कारण शीर्ष प्रतिभाएं निजी क्षेत्र या विदेशों की ओर आकर्षित हो सकती हैं।
प्राइवेट सेक्टर में कितनी मिलती है सैलरी?
भारत में रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में निजी कंपनियों ने भी रक्षा उत्पादन में बड़ा निवेश किया है।
उद्योग से जुड़े विभिन्न वेतन सर्वेक्षणों के अनुसार रक्षा एवं एयरोस्पेस क्षेत्र में 10 से 12 वर्ष का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का वार्षिक पैकेज 30 लाख से 40 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है। कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, साइबर सुरक्षा और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स में यह पैकेज इससे भी अधिक देखा गया है।
वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो अमेरिकी रक्षा कंपनी Lockheed Martin, Boeing Defence और Northrop Grumman जैसी कंपनियां अनुभवी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को करोड़ों रुपये के बराबर वार्षिक वेतन देती हैं। यही कारण है कि प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं को बनाए रखना दुनिया भर की सरकारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
लेकिन केवल सैलरी ही पूरी तस्वीर नहीं है
हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी वैज्ञानिकों की तुलना केवल निजी क्षेत्र से करना पूरी तरह उचित नहीं होगा।
DRDO जैसी संस्थाओं में नौकरी के साथ दीर्घकालिक सुरक्षा, पेंशन संबंधी लाभ, स्वास्थ्य सुविधाएं, अनुसंधान संसाधनों तक पहुंच, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अवसर मिलता है। कई वैज्ञानिकों के लिए ये कारक वेतन से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
पूर्व वैज्ञानिकों का कहना है कि मिसाइल, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और रणनीतिक रक्षा परियोजनाओं पर काम करने का अवसर हर जगह उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में कई प्रतिभाशाली लोग अपेक्षाकृत कम वेतन के बावजूद सरकारी अनुसंधान संस्थानों को चुनते हैं।
भारत के लिए यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत वर्तमान समय में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। सरकार ने रक्षा निर्यात को बढ़ाने और घरेलू अनुसंधान को मजबूत करने का लक्ष्य रखा है।
ऐसे में वैज्ञानिक प्रतिभा की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि देश के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियर और शोधकर्ता निजी कंपनियों या विदेशी संस्थानों की ओर रुख करते हैं तो इसका असर दीर्घकालिक अनुसंधान क्षमता पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य की रक्षा तकनीकों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, हाइपरसोनिक हथियार, ड्रोन तकनीक और साइबर युद्ध जैसी अत्याधुनिक क्षमताएं शामिल होंगी। इन क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बेहद तेज है और प्रतिभा को आकर्षित करना किसी भी देश के लिए रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
सोशल मीडिया पर लोगों की क्या रही प्रतिक्रिया?
शेखर गुप्ता की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं बंटी हुई नजर आईं।
कुछ लोगों ने कहा कि सरकारी वैज्ञानिकों को मिलने वाला वेतन वर्तमान बाजार परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है और इसमें सुधार की जरूरत है। उनके अनुसार यदि देश को सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा चाहिए तो वेतन संरचना को भी प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।
वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने तर्क दिया कि सरकारी सेवा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं होता। राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थिर करियर, सम्मान और देश के लिए योगदान देने की भावना भी महत्वपूर्ण होती है।
कई यूजर्स ने यह भी कहा कि भारत में वैज्ञानिकों को मिलने वाली सामाजिक पहचान और सम्मान बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि अधिक युवा अनुसंधान और विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित हों।
निष्कर्ष
DRDO भर्ती की सैलरी को लेकर शुरू हुई बहस केवल एक नौकरी विज्ञापन तक सीमित नहीं है। यह सवाल भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान ढांचे, प्रतिभा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। एक तरफ निजी क्षेत्र लगातार आकर्षक पैकेज देकर विशेषज्ञों को अपनी ओर खींच रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी संस्थानों को भी विश्वस्तरीय प्रतिभा बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
आने वाले वर्षों में भारत यदि रक्षा तकनीक और अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनना चाहता है तो केवल प्रयोगशालाओं और परियोजनाओं में निवेश पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वैज्ञानिक प्रतिभा को आकर्षित करने और उसे बनाए रखने की रणनीति पर भी गंभीरता से काम करना होगा।


