Crude Oil Price: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन तेज गिरावट देखने को मिली है। 26 अगस्त को ब्रेंट क्रूड का भाव 87 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी गिरकर करीब 81 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता नजर आया। महज दो दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 6 फीसदी तक फिसल चुकी है।
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह नरमी भारत के लिए राहत की खबर मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ता है और इसका असर रुपये, महंगाई तथा पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसके उलट, क्रूड की कीमतों में गिरावट से आयात लागत कम होने की उम्मीद रहती है।
हालांकि, हालिया गिरावट के बावजूद इस साल कच्चे तेल की कीमतें अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं। बाजार में तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा इस समय पश्चिम एशिया में तनाव और खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी सप्लाई का जोखिम है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बातचीत से बदला बाजार का सेंटीमेंट
कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई गिरावट के पीछे सबसे अहम वजह ईरान और ओमान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चल रही बातचीत को माना जा रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा पैदा होने की आशंका तेल की कीमतों को तुरंत प्रभावित करती है।
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान और ओमान समुद्री जहाजों की आवाजाही को सुचारू बनाने के लिए एक अंतरिम व्यवस्था तैयार करने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। इस खबर से बाजार में यह उम्मीद मजबूत हुई है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए जोखिम कम हो सकता है।
यही वजह है कि कच्चे तेल में हालिया तेजी के बाद निवेशकों ने बिकवाली शुरू कर दी और कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली।
ईरान-ओमान के बीच स्थायी समुद्री कॉरिडोर पर चर्चा
ईरान और ओमान के बीच बातचीत सिर्फ तत्काल आवाजाही बहाल करने तक सीमित नहीं रहने की उम्मीद है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देश स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की सामान्य आवाजाही के लिए एक अधिक स्थायी व्यवस्था तैयार करने पर भी विचार कर रहे हैं।
इस व्यवस्था में कॉरिडोर के संचालन, गवर्नेंस, सूचना साझा करने और समुद्री ट्रैफिक के प्रबंधन से जुड़े नियम शामिल हो सकते हैं।
अगर दोनों देशों के बीच इस तरह की व्यवस्था सफल रहती है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई को लेकर बनी चिंता कुछ कम हो सकती है। यही संभावना फिलहाल क्रूड ऑयल की कीमतों पर दबाव डाल रही है।
बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तेल की सप्लाई में किसी बड़ी रुकावट की आशंका घटे। जब ट्रेडर्स को लगता है कि मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति जारी रहेगी, तो वे भविष्य में कीमतों में अचानक उछाल की आशंका को कम आंकते हैं। इसका असर क्रूड के फ्यूचर्स और स्पॉट मार्केट दोनों पर दिखाई दे सकता है।
30 से 60 दिन में स्थायी रूट बनाने की कोशिश
रिपोर्टों में ईरान के उप-विदेश मंत्री के हवाले से कहा गया है कि ईरान और ओमान अगले 30 से 60 दिनों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही के लिए स्थायी रूट तैयार करने को लेकर बातचीत जारी रखेंगे।
अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो समुद्री परिवहन कंपनियों के लिए अनिश्चितता कम हो सकती है। इसका सीधा असर तेल की सप्लाई पर पड़ने वाले जोखिम प्रीमियम पर हो सकता है।
दरअसल, जब किसी प्रमुख तेल मार्ग पर तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमत में सिर्फ वास्तविक सप्लाई के आधार पर ही तेजी नहीं आती, बल्कि भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका भी कीमतों को ऊपर ले जाती है। इसी तरह, तनाव कम होने की संभावना सामने आने पर कीमतों में तेजी से करेक्शन भी देखने को मिल सकता है।
पाकिस्तान के सेना प्रमुख के ईरान दौरे की भी चर्चा
इस बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख के ईरान दौरे ने भी पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर चर्चाओं को बढ़ाया है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने ईरान का एक दिवसीय दौरा किया और दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई।
ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष तथा उसके बाद युद्धविराम से जुड़ी घटनाओं में पाकिस्तान की भूमिका की भी चर्चा होती रही है। ऐसे में पाकिस्तान की ओर से ईरान के साथ उच्चस्तरीय संपर्क को क्षेत्रीय तनाव कम करने की व्यापक कोशिशों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि, तेल बाजार में किसी भी राजनयिक पहल का असर तभी स्थायी रूप से दिखाई देगा, जब उससे वास्तविक सप्लाई जोखिम कम हो और प्रमुख समुद्री मार्गों पर जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहे।
युद्ध के दौरान 120 डॉलर तक पहुंचा था क्रूड
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला था। एक समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था।
इसके बाद जब दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम की स्थिति बनी और बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई। जून में युद्धविराम के बाद क्रूड का भाव 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे भी चला गया था।
बाद में पश्चिम एशिया में फिर से तनाव और सप्लाई जोखिम बढ़ने के कारण तेल की कीमतों में तेजी लौटी। अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत की खबरों ने बाजार में एक बार फिर नरमी का माहौल बना दिया है।
इस साल अब भी करीब 40% ऊपर क्रूड
हालिया गिरावट को देखते हुए ऐसा लग सकता है कि कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ गया है, लेकिन साल की शुरुआत के मुकाबले तस्वीर अभी भी अलग है। हालिया नरमी के बावजूद क्रूड ऑयल की कीमतें इस साल करीब 40 फीसदी ऊपर बताई जा रही हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में लगातार बना हुआ भू-राजनीतिक जोखिम है। ईरान से जुड़े घटनाक्रम, अमेरिका की ओर से प्रतिबंधों का दबाव और खाड़ी क्षेत्र से होने वाली तेल सप्लाई पर संभावित असर ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है।
तेल बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम को लेकर निवेशक काफी संवेदनशील रहते हैं। यदि किसी बड़े उत्पादक देश की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा बढ़ता है, तो कीमतों में तेजी आ सकती है। दूसरी ओर, बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से सप्लाई सामान्य रहने की संभावना बढ़ती है तो कीमतों में तेजी से गिरावट भी आ सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है क्रूड की गिरती कीमत?
कच्चे तेल की कीमत में गिरावट भारत के लिए कई स्तरों पर सकारात्मक हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत जितनी कम होगी, भारतीय कंपनियों और देश के आयात बिल पर उतना ही कम दबाव पड़ सकता है।
क्रूड सस्ता होने से सबसे पहले देश के ऑयल इंपोर्ट बिल में कमी की संभावना रहती है। इससे चालू खाते और विदेशी मुद्रा की मांग पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।
इसके अलावा, लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें नीचे रहने पर महंगाई के मोर्चे पर भी राहत मिल सकती है। पेट्रोल-डीजल सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था के परिवहन खर्च को प्रभावित करते हैं और ईंधन की कीमतों का असर कई वस्तुओं और सेवाओं की लागत पर पड़ सकता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय क्रूड में गिरावट का मतलब यह जरूरी नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत उसी अनुपात में कम हो जाएंगी। घरेलू ईंधन की कीमतों पर टैक्स, रिफाइनिंग लागत, रुपये की विनिमय दर और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति समेत कई अन्य कारकों का भी असर होता है।
आगे क्या देखेगा तेल बाजार?
अब क्रूड ऑयल बाजार की नजर मुख्य रूप से तीन चीजों पर रहेगी। पहला, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही कितनी सामान्य होती है। दूसरा, ईरान और ओमान के बीच प्रस्तावित समुद्री कॉरिडोर को लेकर बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है। और तीसरा, अमेरिका-ईरान के बीच तनाव और प्रतिबंधों से तेल की वास्तविक सप्लाई पर कितना असर पड़ता है।
अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आवाजाही सामान्य होती है और क्षेत्रीय तनाव कम होता है, तो क्रूड की कीमतों पर आगे भी दबाव रह सकता है। वहीं, अगर बातचीत विफल होती है या समुद्री मार्ग पर फिर से तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में दोबारा तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
फिलहाल ब्रेंट क्रूड का 87 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आना बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। लगातार तीसरे दिन की गिरावट बताती है कि ट्रेडर्स ने सप्लाई जोखिम को लेकर अपनी चिंता कुछ कम की है। हालांकि, पश्चिम एशिया की स्थिति अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं है, इसलिए क्रूड में आगे भी तेज उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रह सकती है।
निवेशकों और भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए आने वाले दिनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी खबरें बेहद महत्वपूर्ण रहेंगी।


