Sohrabuddin Sheikh Encounter Case: साल 2005 के बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। सोहराबुद्दीन के छोटे भाई नायबुद्दीन शेख ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 22 आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया था। इन 22 आरोपियों में 21 पुलिसकर्मी शामिल हैं।
नायबुद्दीन ने यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले के खिलाफ दायर की है। हाईकोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों रूबाबुद्दीन और नायबुद्दीन की अपीलों को खारिज करते हुए दिसंबर 2018 में मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा दिए गए बरी के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या चुनौती दी गई है?
24 अगस्त 2026 को सामने आई जानकारी के मुताबिक नायबुद्दीन शेख ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। उनकी मांग है कि आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले की सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा की जाए। याचिका में 2005 के पूरे घटनाक्रम और मामले में सामने आए सबूतों पर फिर से विचार किए जाने की मांग की गई है।
यह मामला खास इसलिए है क्योंकि हाईकोर्ट ने मई में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपी हुए थे बरी
मामले में बरी किए गए 22 आरोपियों में गुजरात और राजस्थान के पुलिस अधिकारियों समेत कुल 21 पुलिसकर्मी शामिल थे। एक अन्य आरोपी गुजरात के उस फार्महाउस से जुड़ा था, जहां अभियोजन पक्ष के अनुसार सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी को कथित तौर पर रखा गया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि सोहराबुद्दीन, कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को पुलिस टीम ने हिरासत में लिया और बाद में उनकी कथित फर्जी मुठभेड़ों में हत्या कर दी गई। हालांकि, मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष इन आरोपों को अदालत में निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सका।
क्या हुआ था 2005 में?
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 22-23 नवंबर 2005 की रात सोहराबुद्दीन शेख और अन्य लोग हैदराबाद से महाराष्ट्र जाने वाली बस में सफर कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें पुलिस टीम ने कथित तौर पर हिरासत में लिया।
इसके बाद 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद के पास एक कथित पुलिस मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन की मौत हो गई। उनकी पत्नी कौसर बी की भी कुछ दिनों बाद हत्या किए जाने का आरोप लगा।
मामले में महत्वपूर्ण गवाह माने जाने वाले तुलसीराम प्रजापति की 27 दिसंबर 2006 को गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक अलग पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई। बाद में प्रजापति मामले को भी सोहराबुद्दीन केस से जोड़ा गया।
जांच गुजरात CID से CBI तक कैसे पहुंची?
शुरुआत में मामले की जांच गुजरात पुलिस की CID ने की थी। सोहराबुद्दीन के भाई रूबाबुद्दीन शेख ने जांच पर असंतोष जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
इसके बाद जनवरी 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI को आगे की जांच करने का निर्देश दिया। CBI ने जांच के बाद कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। बाद में मुकदमे को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में ट्रायल को मुंबई स्थानांतरित करने का आदेश दिया था।
2018 में स्पेशल CBI कोर्ट ने सभी आरोपियों को किया था बरी
मुंबई की विशेष CBI अदालत ने 21 दिसंबर 2018 को मामले में बचे 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत के सामने अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर था।
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 210 गवाहों से पूछताछ की। इनमें से 92 गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए और अभियोजन पक्ष के खिलाफ हो गए। हाईकोर्ट के फैसले में भी इन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मई 2026 में क्या कहा?
7 मई 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड की पीठ ने रूबाबुद्दीन और नायबुद्दीन की अपीलें खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए जरूरी कड़ियां पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकीं। अदालत ने निचली अदालत के बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं पाया।
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, मुकदमे में 210 अभियोजन गवाह पेश किए गए थे और 92 गवाहों के मुकर जाने के कारण अभियोजन की कहानी को साबित करना मुश्किल हुआ। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष कथित आपराधिक साजिश और पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता को पर्याप्त सबूतों से स्थापित नहीं कर पाया।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली लड़ाई
अब नायबुद्दीन शेख की याचिका के बाद मामला फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने है। हालांकि, केवल याचिका दाखिल होने का मतलब यह नहीं है कि आरोपियों की बरी का फैसला बदल गया है। आगे सुप्रीम कोर्ट याचिका पर सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत है या नहीं।
इस तरह करीब दो दशक पुराने इस हाई-प्रोफाइल मामले में 2005 की घटनाओं से लेकर 2018 की ट्रायल कोर्ट की बरी, 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले और अब सुप्रीम कोर्ट की चुनौती तक कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में आ गई है।


