नई दिल्ली। देश की प्रमुख गोल्ड ज्वेलरी और बुलियन कारोबार से जुड़ी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स इन दिनों बाजार और नियामकीय हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। कंपनी के शेयरों में हालिया दिनों में तेज गिरावट देखने को मिली है और इसी बीच भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बड़ी हिस्सेदारी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। इन चर्चाओं के बीच कंपनी के चेयरमैन और प्रमोटर Rajesh Mehta ने एक इंटरव्यू में कई अहम बातें कही हैं।
राजेश मेहता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि LIC के निवेश फैसलों से उनका या कंपनी का कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें यह भी नहीं पता कि LIC का कार्यालय कहां स्थित है। उनका दावा है कि LIC ने पिछले लगभग दो दशकों में खुले बाजार से कंपनी के शेयर खरीदे हैं और यह पूरी तरह उसका स्वतंत्र व्यावसायिक निर्णय था।
क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में राजेश एक्सपोर्ट्स को लेकर निवेशकों की चिंता बढ़ी है। कंपनी पर नियामकीय दबाव और विभिन्न कारोबारी चुनौतियों की खबरों के बीच इसके शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 3 जून से कंपनी का शेयर 14 फीसदी से अधिक टूट चुका है और सोमवार को यह करीब 94.50 रुपये के स्तर तक पहुंच गया, जो इसका नया निचला स्तर माना जा रहा है।
शेयर में आई इस कमजोरी ने उन संस्थागत निवेशकों को भी चर्चा में ला दिया है जिनकी कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी है। इनमें सबसे बड़ा नाम LIC का है, जिसके पास वर्तमान में कंपनी की लगभग 10.80 फीसदी हिस्सेदारी मौजूद है।
यही वजह है कि बाजार में यह सवाल उठने लगे कि क्या LIC का निवेश प्रभावित होगा और क्या कंपनी की स्थिति को लेकर सरकारी बीमा कंपनी चिंतित है।
LIC की हिस्सेदारी पर क्या बोले राजेश मेहता?
राजेश मेहता ने कहा कि LIC की हिस्सेदारी किसी विशेष डील या प्रमोटर स्तर की व्यवस्था का परिणाम नहीं है। उनके अनुसार LIC ने समय-समय पर खुले बाजार से शेयर खरीदे हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी प्रमोटर ने कभी LIC को अपने शेयर नहीं बेचे। न ही कंपनी ने LIC को कोई विशेष शेयर आवंटित किए। ऐसे में LIC की ओर से की गई खरीदारी से न तो कंपनी को सीधा लाभ मिला और न ही प्रमोटरों को।
मेहता का कहना है कि LIC एक पेशेवर निवेश संस्था है जो अपने स्वतंत्र विश्लेषण और निवेश रणनीति के आधार पर निर्णय लेती है। इसलिए उसके निवेश के लिए कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
‘हमें तो LIC का दफ्तर भी नहीं पता’
इंटरव्यू के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में आया उनका यह बयान रहा कि उन्हें यह तक नहीं पता कि LIC का दफ्तर कहां है।
उनका कहना था कि कंपनी का LIC के निवेश निर्णयों से कोई लेना-देना नहीं है और न ही दोनों पक्षों के बीच इस संबंध में कोई समन्वय या संपर्क रहा है। उन्होंने कहा कि सेकेंडरी मार्केट से शेयर खरीदना पूरी तरह LIC का अपना फैसला था।
हालांकि बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान इस बात को रेखांकित करने की कोशिश है कि कंपनी खुद को संस्थागत निवेशकों के निर्णयों से अलग दिखाना चाहती है।
शेयर में गिरावट के बावजूद क्यों जताया भरोसा?
राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में हालिया गिरावट के बावजूद राजेश मेहता ने दावा किया कि उनकी समझ के अनुसार LIC को अब तक नुकसान नहीं हुआ है।
उन्होंने तर्क दिया कि LIC ने एक-दो साल पहले नहीं बल्कि लगभग 20 वर्षों की अवधि में अलग-अलग स्तरों पर शेयर खरीदे हैं। ऐसे में केवल हालिया गिरावट को देखकर निवेश के पूरे प्रदर्शन का आकलन नहीं किया जा सकता।
बाजार विश्लेषकों का भी मानना है कि किसी बड़े संस्थागत निवेशक की वास्तविक स्थिति समझने के लिए उसकी औसत खरीद लागत और निवेश अवधि को देखना जरूरी होता है।
अगर नुकसान हुआ तो फायदा किसे मिला?
राजेश मेहता ने बातचीत के दौरान एक दिलचस्प सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी निवेशक को नुकसान हुआ है तो बाजार के दूसरे पक्ष में किसी को फायदा भी हुआ होगा।
उनके मुताबिक LIC ने जिन निवेशकों से शेयर खरीदे, वे आम भारतीय निवेशक थे। यदि उन निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर अपने शेयर बेचे और लाभ कमाया तो इसका फायदा भी भारतीय जनता को ही मिला।
उन्होंने सवाल किया कि अगर आम निवेशकों को लाभ हुआ है तो फिर इस प्रक्रिया को गलत कैसे कहा जा सकता है?
यह बयान निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि बाजार में लाभ और हानि दोनों पक्षों में बंटते हैं। हालांकि किसी निवेश की सफलता का अंतिम आकलन लंबी अवधि के रिटर्न के आधार पर ही किया जाता है।
क्या LIC की बिकवाली से बढ़ सकती है परेशानी?
जब उनसे पूछा गया कि अगर LIC भविष्य में अपनी हिस्सेदारी घटाने का फैसला करती है तो क्या कंपनी के शेयर पर दबाव बढ़ सकता है, तब उन्होंने इस संभावना को ज्यादा महत्व नहीं दिया।
मेहता का कहना है कि बाजार में हमेशा खरीदार और विक्रेता दोनों मौजूद रहते हैं। यदि कोई बड़ा निवेशक हिस्सेदारी बेचता है तो अन्य निवेशकों को खरीदने का अवसर मिलता है।
हालांकि बाजार विशेषज्ञों का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि किसी भी कंपनी में बड़े संस्थागत निवेशक की बिकवाली अल्पकाल में शेयर पर दबाव बना सकती है क्योंकि इससे निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ता है।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला केवल एक कंपनी या एक निवेशक तक सीमित नहीं है। यह कॉर्पोरेट गवर्नेंस, संस्थागत निवेश और शेयर बाजार में भरोसे से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
निवेशकों को इस समय कुछ प्रमुख बातों पर नजर रखनी चाहिए:
- कंपनी से जुड़े नियामकीय घटनाक्रम।
- SEBI या अन्य एजेंसियों की संभावित कार्रवाई।
- तिमाही नतीजों में कारोबार की स्थिति।
- कंपनी के कर्ज और नकदी प्रवाह की स्थिति।
- बड़े संस्थागत निवेशकों की शेयरहोल्डिंग में बदलाव।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल किसी बड़े निवेशक की मौजूदगी देखकर निवेश नहीं करना चाहिए। निवेश का निर्णय कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, भविष्य की संभावनाओं और जोखिमों को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।
आगे क्या?
राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में हालिया गिरावट और कंपनी को लेकर बढ़ती चर्चाओं के बीच निवेशकों की नजर अब आने वाले नियामकीय और कारोबारी घटनाक्रमों पर रहेगी। LIC की 10.80 फीसदी हिस्सेदारी होने के कारण इस मामले पर बाजार की दिलचस्पी और भी बढ़ गई है।
फिलहाल कंपनी प्रबंधन यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि LIC का निवेश पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय था और कंपनी का उससे कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन शेयर बाजार में अंतिम फैसला हमेशा कंपनी के प्रदर्शन, पारदर्शिता और निवेशकों के भरोसे पर ही निर्भर करता है।


