कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और बढ़ते सब्सिडी बोझ ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि सरकार अब बजट के कुछ हिस्सों में खर्च कम करने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले एक महीने के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ कई उच्चस्तरीय बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों के खर्चों की समीक्षा की गई है। हालांकि अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका असर केवल सरकारी खजाने पर ही नहीं बल्कि महंगाई, सब्सिडी, विकास परियोजनाओं और आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।
क्यों बढ़ी सरकार की टेंशन?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत का आयात बिल भी तेजी से बढ़ जाता है।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इससे सरकार पर सब्सिडी और अन्य वित्तीय दायित्वों का बोझ बढ़ने लगा है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो उर्वरक सब्सिडी, ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े खर्च और अन्य सहायता योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
किन क्षेत्रों में हो सकती है खर्च की समीक्षा?
सूत्रों के अनुसार सरकार पूंजीगत व्यय और रक्षा बजट में कटौती करने के पक्ष में नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बनाया है। इसलिए सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में बड़ी कटौती की संभावना कम मानी जा रही है।
इसके बजाय सरकार उन क्षेत्रों की पहचान कर रही है जहां खर्च कम करके राजकोषीय संतुलन बनाए रखा जा सके। इनमें जल संसाधन परियोजनाएं, कुछ प्रशासनिक खर्च और राज्यों को दिए जाने वाले ऋण संबंधी आवंटन शामिल हो सकते हैं।
हालांकि किसी भी प्रकार की कटौती को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
राजकोषीय घाटा क्यों बना चिंता का विषय?
राजकोषीय घाटा वह स्थिति होती है जब सरकार की आय उसके कुल खर्च से कम होती है। ऐसे में अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है।
वित्त मंत्रालय का लक्ष्य मार्च 2027 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखना है। लेकिन बढ़ती तेल कीमतें इस लक्ष्य को चुनौती दे सकती हैं।
हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष के पहले महीने अप्रैल में राजकोषीय घाटा लगभग 3.6 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है। यह संकेत देता है कि सरकारी खर्चों की गति आय की तुलना में तेज बनी हुई है।
उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ सकता है दबाव
सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए उर्वरक सब्सिडी मद में लगभग 1.71 ट्रिलियन रुपये का प्रावधान किया है। लेकिन यदि प्राकृतिक गैस और ऊर्जा की वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो यह खर्च काफी बढ़ सकता है।
भारत में खाद उत्पादन की लागत ऊर्जा कीमतों से सीधे जुड़ी हुई है। गैस महंगी होने पर उर्वरकों की लागत बढ़ती है, जिसका बड़ा हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऊर्जा संकट लंबा खिंचता है तो उर्वरक सब्सिडी का बिल अनुमान से कहीं अधिक हो सकता है।
रुपये की कमजोरी भी बढ़ा रही मुश्किलें
कच्चे तेल के महंगा होने के साथ-साथ रुपये पर भी दबाव बढ़ा है। जब रुपया कमजोर होता है तो तेल आयात और अधिक महंगा हो जाता है क्योंकि भुगतान डॉलर में किया जाता है।
रुपये में गिरावट का असर केवल तेल पर ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।
यही वजह है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों ही आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
आम लोगों पर क्या पड़ सकता है असर?
यदि सरकार खर्च में कटौती का रास्ता अपनाती है तो इसका प्रभाव विभिन्न स्तरों पर देखने को मिल सकता है।
कुछ सरकारी योजनाओं के विस्तार की गति धीमी हो सकती है। राज्यों को मिलने वाले कुछ वित्तीय आवंटनों की समीक्षा हो सकती है। वहीं ग्रामीण विकास, जल प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों की परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि गरीबों और किसानों के लिए चल रही महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
इसके बावजूद यदि तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो पेट्रोल-डीजल, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर अप्रत्यक्ष असर देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा फैसला
सरकारी खर्च में कटौती केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक चुनौती भी है। कई राज्यों ने पहले भी केंद्र से मिलने वाले संसाधनों और कर हिस्सेदारी को लेकर चिंता जताई है।
यदि राज्यों को मिलने वाले फंड में कमी आती है तो इससे राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं, यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है।
इसके अलावा ग्रामीण और सामाजिक योजनाओं में किसी भी प्रकार की कमी का असर करोड़ों लोगों पर पड़ सकता है, इसलिए सरकार बेहद सावधानी से आगे बढ़ना चाहती है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल सरकार स्थिति का लगातार मूल्यांकन कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि वर्ष की दूसरी छमाही में तेल बाजार, महंगाई और राजस्व संग्रह की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में नरमी आती है तो सरकार पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन यदि कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं या और बढ़ती हैं तो खर्च नियंत्रण के उपायों पर तेजी से काम किया जा सकता है।
सरकार अतिरिक्त राजस्व जुटाने, निवेश आकर्षित करने, विदेशी पूंजी के बहिर्वाह को रोकने और आर्थिक विकास को गति देने जैसे विकल्पों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है।
निष्कर्ष
भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल कई वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। बढ़ती तेल कीमतें, महंगाई का खतरा, कमजोर रुपया और बढ़ता सब्सिडी बोझ सरकार के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। ऐसे में खर्च में कटौती के विकल्पों पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
हालांकि अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है, लेकिन आने वाले महीनों में सरकार के कदम देश की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आम लोगों, किसानों, राज्यों और उद्योग जगत की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार राजकोषीय अनुशासन और विकास के बीच संतुलन कैसे बनाती है।


