नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते तनाव, अमेरिका-ईरान टकराव और वैश्विक सप्लाई बाधाओं के बीच आशंका जताई जा रही थी कि कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया एक बड़े तेल संकट के बेहद करीब पहुंच गई थी, फिर भी तीन बड़े ‘शॉक एब्जॉर्बर्स’ ने बाजार को संभाल लिया और कीमतों में बेकाबू उछाल आने से रोक दिया।
आईएमएफ के मुताबिक, मई के अंत तक करीब 1.1 अरब बैरल कच्चा तेल वैश्विक बाजार तक नहीं पहुंच पाया। यह मात्रा दुनिया की लगभग 10 दिनों की कुल तेल खपत के बराबर है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित रहीं और 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर बनी रहीं।
कैसे टला दुनिया का बड़ा तेल संकट?
वैश्विक बाजार में सप्लाई प्रभावित होने के बावजूद तीन प्रमुख कारणों ने तेल बाजार को संतुलित बनाए रखा।
1. मांग में आई कमी ने दबाव घटाया
आईएमएफ के अनुसार, कई एशियाई देशों ने महंगे कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए कोयला, प्राकृतिक गैस और रिन्यूएबल एनर्जी का अधिक उपयोग किया। इससे तेल की मांग में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई।
इसके अलावा कई सरकारों ने ईंधन पर टैक्स में राहत और सीमित सब्सिडी जारी रखी, जिससे परिवहन क्षेत्र पर कीमतों का असर कम रहा और बाजार में घबराहट वाली खरीदारी देखने को नहीं मिली।
2. दूसरे देशों ने बढ़ाया तेल उत्पादन
जब खाड़ी क्षेत्र में उत्पादन और सप्लाई प्रभावित हुई, तब कई अन्य उत्पादक देशों ने तेजी से उत्पादन बढ़ाया।
आईएमएफ के अनुसार अमेरिका, रूस, वेनेजुएला और गुयाना जैसे देशों ने मिलकर प्रतिदिन करीब 20 लाख बैरल अतिरिक्त कच्चे तेल का उत्पादन किया। इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई का बड़ा हिस्सा संतुलित रहा और कीमतों पर दबाव कम हुआ।
3. रणनीतिक तेल भंडार बने सबसे बड़ा सहारा
मार्च से मई के बीच वैश्विक बाजार में प्रतिदिन लगभग 40 लाख बैरल तेल की कमी दर्ज की गई।
इस कमी को पूरा करने के लिए कई देशों ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) और चीन ने अपने कमर्शियल ऑयल स्टॉक का इस्तेमाल किया। इससे बाजार में तत्काल उपलब्धता बनी रही और कीमतों में तेज उछाल नहीं आया।
संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि खतरा अभी टला नहीं है। अमेरिका-ईरान तनाव और पश्चिम एशिया की अस्थिर स्थिति के कारण दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सुरक्षित आवाजाही को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग पूरी तरह सामान्य भी हो जाए, तब भी शिपिंग कंपनियों, बीमा कंपनियों और ऊर्जा कारोबारियों का भरोसा लौटने में 2 से 3 महीने का समय लग सकता है।
यदि लंबे समय तक उत्पादन बाधित रहता है, तो कई तेल क्षेत्रों में कुओं को स्थायी नुकसान भी हो सकता है। खासकर उन देशों में जहां उत्पादन दोबारा शुरू करने के लिए पर्याप्त निवेश उपलब्ध नहीं है।
भविष्य के लिए IMF की अहम सलाह
आईएमएफ ने भविष्य में ऐसे ऊर्जा संकटों से बचने के लिए सरकारों और नीति निर्माताओं को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
- रणनीतिक तेल भंडारों को समय रहते फिर से भरना चाहिए ताकि भविष्य में आपूर्ति संकट का सामना किया जा सके।
- दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा केवल एक समुद्री मार्ग पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए। नए सप्लाई रूट विकसित करने और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाने की जरूरत है।
- ईंधन सब्सिडी केवल जरूरतमंद उपभोक्ताओं तक सीमित रखी जाए ताकि सरकारी वित्तीय बोझ कम रहे और ऊर्जा की बचत को बढ़ावा मिले।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल सीधे पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, विमान ईंधन, परिवहन लागत और महंगाई पर असर डाल सकता है।
हालांकि फिलहाल आईएमएफ की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई और मांग के बीच संतुलन बनने से तत्काल बड़े मूल्य विस्फोट की आशंका कम हुई है। लेकिन यदि पश्चिम एशिया में तनाव दोबारा बढ़ता है या होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेज उछाल देखने को मिल सकता है।


