नई दिल्ली: दुनिया भर में बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, महंगाई और ऊर्जा संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक रिपोर्ट सामने आई है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) ने अपने ताजा आर्थिक आउटलुक में अनुमान जताया है कि भारत वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में 6.3 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2027-28 (FY28) में 6.4 प्रतिशत की मजबूत विकास दर हासिल कर सकता है। वैश्विक स्तर पर आर्थिक सुस्ती और व्यापारिक चुनौतियों के बावजूद भारत की यह रफ्तार दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले काफी बेहतर मानी जा रही है।
OECD की रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब दुनिया के कई बड़े देश आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं। विशेष रूप से चीन की अर्थव्यवस्था में लगातार नरमी के संकेत मिल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चीन की आर्थिक वृद्धि दर 2025 में 5 प्रतिशत रहने के बाद 2026 में 4.5 प्रतिशत और 2027 में घटकर 4.3 प्रतिशत तक आ सकती है। ऐसे में भारत और चीन के बीच विकास दर का अंतर और अधिक बढ़ने की संभावना दिखाई दे रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था को क्या दे रहा है मजबूती?
रिपोर्ट के अनुसार भारत की आर्थिक वृद्धि को कई कारक समर्थन दे रहे हैं। देश में मजबूत घरेलू मांग, बढ़ता बुनियादी ढांचा निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और सरकारी पूंजीगत व्यय आर्थिक गतिविधियों को गति दे रहे हैं। इसके अलावा बैंकिंग क्षेत्र में सुधार और निजी निवेश में धीरे-धीरे बढ़ती भागीदारी भी विकास दर को सहारा दे रही है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पिछले वर्षों में अपनाई गई संतुलित मौद्रिक नीति का भी अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। ब्याज दरों में नरमी और क्रेडिट ग्रोथ में तेजी से उद्योगों तथा उपभोक्ताओं दोनों को फायदा हुआ है। OECD ने उल्लेख किया है कि मार्च तक गैर-खाद्य बैंक ऋण में सालाना आधार पर 15.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत है।
चीन की अर्थव्यवस्था पर क्यों बढ़ रहा दबाव?
OECD की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की आर्थिक वृद्धि पर सबसे बड़ा दबाव उसके रियल एस्टेट सेक्टर से आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में चीन के प्रॉपर्टी बाजार में आई कमजोरी का असर उपभोक्ता विश्वास और निवेश गतिविधियों पर पड़ा है। इसके अलावा निर्यात आधारित मॉडल पर निर्भरता और वैश्विक मांग में कमी भी चीनी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन रही है।
हालांकि चीन अक्षय ऊर्जा और नई तकनीकों में निवेश बढ़ा रहा है, लेकिन रियल एस्टेट क्षेत्र की समस्याएं अभी भी उसके विकास के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई हैं। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारत और चीन के बीच आर्थिक वृद्धि का अंतर बढ़ सकता है।
मध्य पूर्व संघर्ष ने बढ़ाई दुनिया की चिंता
OECD ने अपनी रिपोर्ट में मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा जोखिम बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी से फारस की खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा और कई प्रमुख कृषि तथा औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई है। उत्पादन और निर्यात में आई बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतें बढ़ी हैं, जिससे महंगाई का दबाव फिर से बढ़ने लगा है।
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का असर केवल तेल आयात करने वाले देशों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव खाद्य पदार्थों, परिवहन लागत, विनिर्माण क्षेत्र और उपभोक्ता खर्च पर भी पड़ता है। OECD का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार और धीमी हो सकती है।
भारत में महंगाई को लेकर क्या है चिंता?
हाल के महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने महंगाई को लेकर नई चिंता पैदा की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुकूल आधार प्रभाव कम होने और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण मुख्य महंगाई दर में फिर से वृद्धि के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
OECD का अनुमान है कि महंगाई को भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत लक्ष्य के आसपास बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के अंत तक लगभग 25 आधार अंकों (0.25 प्रतिशत) की अस्थायी ब्याज दर वृद्धि करनी पड़ सकती है। यदि ऐसा होता है तो होम लोन, ऑटो लोन और अन्य प्रकार के ऋणों पर ब्याज दरों में हल्का असर देखने को मिल सकता है।
राजकोषीय घाटे पर भी बढ़ सकता है दबाव
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.4 प्रतिशत से घटाकर 4.3 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि OECD का मानना है कि ऊर्जा कीमतों में अचानक बढ़ोतरी से राहत देने के लिए सरकार को अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार ऐसे कदमों के कारण राजकोषीय घाटा बजट लक्ष्य की तुलना में लगभग 0.4 प्रतिशत अधिक हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मजबूत कर वसूली और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि इस अतिरिक्त दबाव को काफी हद तक संतुलित कर सकती है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
यदि OECD का अनुमान सही साबित होता है और भारत 6 प्रतिशत से अधिक की विकास दर बनाए रखता है, तो इसका सीधा फायदा रोजगार, निवेश और आय के अवसरों के रूप में दिखाई दे सकता है। तेज आर्थिक वृद्धि से उद्योगों का विस्तार होगा, नई परियोजनाएं शुरू होंगी और बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ेगा।
हालांकि महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चुनौतियां बनी रह सकती हैं। ऐसे में सरकार और RBI के सामने विकास तथा महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी।
निष्कर्ष
OECD की ताजा रिपोर्ट भारत के लिए उत्साहजनक संकेत लेकर आई है। जहां दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं धीमी पड़ रही हैं और चीन भी विकास दर में नरमी का सामना कर रहा है, वहीं भारत के 6.3 प्रतिशत से अधिक की रफ्तार से आगे बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि महंगाई, ऊर्जा कीमतें और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन मजबूत घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रख सकती हैं।


