Goldman Sachs Warning on Crude Oil: वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नई चेतावनी जारी की है। बैंक का अनुमान है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) में तनाव और सप्लाई बाधित रहने की स्थिति बनी रहती है, तो 2026 की चौथी तिमाही तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच सकती है। हालांकि बैंक का कहना है कि यह उसका बेस केस नहीं है, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए इस जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति महंगाई, व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव बढ़ाने वाली साबित हो सकती है।
Goldman Sachs ने क्यों दी 120 डॉलर प्रति बैरल की चेतावनी?
20 जुलाई को जारी अपनी रिसर्च रिपोर्ट में गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने कहा कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति में संभावित रुकावट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गई है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि फारस की खाड़ी से होने वाली तेल सप्लाई युद्ध-पूर्व स्तर के 45% से भी नीचे चली जाती है और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार कर सकती हैं।
हालांकि बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका मौजूदा बेस केस अभी भी यही है कि क्षेत्रीय तनाव धीरे-धीरे कम होगा और तेल बाजार में स्थिरता लौटेगी।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है पूरी दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
भारत के लिए इसका महत्व और भी अधिक है क्योंकि देश के 40% से ज्यादा कच्चे तेल का आयात इसी समुद्री मार्ग से होता है। यदि यहां किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई, जहाजों की आवाजाही में बाधा या सुरक्षा संकट पैदा होता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है।
मध्य पूर्व में तनाव से फिर बढ़ा बाजार का जोखिम
इस महीने अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को फिर से अस्थिर कर दिया है। इसके साथ ही यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब से होने वाली तेल शिपमेंट को निशाना बनाने की धमकी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
लाल सागर और फारस की खाड़ी दोनों क्षेत्रों में समुद्री सुरक्षा से जुड़े जोखिम बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि दूसरी तिमाही में वैश्विक तेल भंडार (Global Oil Inventories) पहले ही घट चुके हैं। ऐसे में यदि सप्लाई में कोई नई रुकावट आती है तो बाजार की प्रतिक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो सकती है।
फिलहाल क्या है तेल की कीमत?
मंगलवार के कारोबार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 88.87 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड लगभग 82.47 डॉलर प्रति बैरल पर रहा।
हालांकि कीमतों में हल्की नरमी देखने को मिली, लेकिन दोनों बेंचमार्क हाल के एक महीने के उच्च स्तर के आसपास बने हुए हैं। इससे साफ है कि निवेशकों के बीच भू-राजनीतिक जोखिम को लेकर चिंता अभी खत्म नहीं हुई है।
Goldman Sachs का बेस केस क्या कहता है?
जोखिमों के बावजूद गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव धीरे-धीरे कम होता है तो:
- चौथी तिमाही में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है।
- अगले वर्ष औसत कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है।
- हालांकि होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर में किसी भी नई रुकावट की स्थिति में यह अनुमान बदल सकता है।
भारत के लिए महंगा क्रूड क्यों है बड़ी चुनौती?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लेकिन अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
यदि ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के करीब पहुंचता है तो भारत को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
1. आयात बिल में भारी बढ़ोतरी
घरेलू ब्रोकरेज जेएम फाइनेंशियल के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है।
यदि कीमतें 30 से 35 डॉलर तक बढ़ती हैं तो इसका असर अरबों डॉलर के अतिरिक्त विदेशी मुद्रा खर्च के रूप में सामने आ सकता है।
2. चालू खाता घाटा बढ़ेगा
महंगा तेल आयात करने के लिए भारत को अधिक डॉलर खर्च करने होंगे। इससे Current Account Deficit (CAD) बढ़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
3. रुपये पर बढ़ेगा दबाव
जैसे-जैसे तेल आयात के लिए डॉलर की मांग बढ़ती है, वैसे-वैसे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है।
4. महंगाई बढ़ने का खतरा
डीजल और पेट्रोल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है। इसका असर खाद्यान्न, सब्जियों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है।
ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए महंगाई को नियंत्रित रखना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
5. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव
यदि सरकार घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत नहीं बढ़ाती है तो सरकारी तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
क्या आम लोगों पर भी पड़ेगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहता है तो इसका असर धीरे-धीरे आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंचता है।
हाल के महीनों में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार संशोधन देखने को मिला है। यदि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो भविष्य में ईंधन की कीमतों में फिर बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
मध्य पूर्व पर भारत की बड़ी निर्भरता
भारत और मध्य पूर्व के आर्थिक संबंध केवल तेल तक सीमित नहीं हैं।
- भारत के कुल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा मध्य पूर्व जाता है।
- भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 55% इसी क्षेत्र से आता है।
- विदेशों से भारत आने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 38% हिस्सा भी खाड़ी देशों से प्राप्त होता है।
ऐसे में यदि क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो इसका असर व्यापार, लॉजिस्टिक्स, शिपिंग, बीमा लागत और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर भी पड़ सकता है।
आगे किन बातों पर रहेगी बाजार की नजर?
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में बाजार इन प्रमुख घटनाओं पर नजर रखेगा—
- होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही की स्थिति
- अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच भू-राजनीतिक घटनाक्रम
- लाल सागर में हूती विद्रोहियों की गतिविधियां
- ओपेक+ देशों की उत्पादन नीति
- चीन और वैश्विक मांग में बदलाव
यदि इन मोर्चों पर स्थिति सामान्य रहती है तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है, लेकिन किसी भी बड़े सैन्य या आपूर्ति संकट की स्थिति में बाजार में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
निष्कर्ष
गोल्डमैन सैक्स की चेतावनी फिलहाल एक संभावित जोखिम का संकेत है, न कि निश्चित भविष्यवाणी। फिर भी होर्मुज स्ट्रेट में लगातार बना तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल केवल ईंधन तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह महंगाई, रुपये, व्यापार घाटे और आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी सीधा असर डाल सकता है। आने वाले महीनों में मध्य पूर्व की स्थिति और वैश्विक तेल सप्लाई पर बाजार की सबसे ज्यादा नजर रहेगी।


