Unlisted Share Market: पिछले कुछ वर्षों में अनलिस्टेड शेयरों में निवेश का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। अब निवेशक किसी कंपनी के शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने का इंतजार नहीं करते, बल्कि IPO आने से महीनों या वर्षों पहले ही अनलिस्टेड मार्केट से शेयर खरीद लेते हैं। उम्मीद रहती है कि IPO के बाद लिस्टिंग गेन मिलेगा और बड़ा मुनाफा होगा। लेकिन हाल के कई बड़े IPO ने यह साबित किया है कि अनलिस्टेड मार्केट में महंगे दाम पर खरीदे गए शेयर हमेशा फायदे का सौदा नहीं होते।
क्यों बढ़ा है अनलिस्टेड शेयरों का क्रेज?
स्टार्टअप्स, फिनटेक कंपनियों और बड़ी प्राइवेट कंपनियों के IPO की बढ़ती संख्या ने अनलिस्टेड मार्केट को निवेशकों के बीच लोकप्रिय बना दिया है। कई निवेशकों को लगता है कि अगर वे IPO से पहले ही शेयर खरीद लेंगे तो उन्हें कम कीमत पर एंट्री मिल जाएगी।
हालांकि, वास्तविकता कई बार इसके उलट होती है। कई मामलों में अनलिस्टेड मार्केट में शेयरों के दाम इतने ज्यादा बढ़ जाते हैं कि IPO का प्राइस उनसे काफी कम निकलता है। ऐसे में पहले निवेश करने वाले निवेशकों को कागजी (Notional) नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हाल के उदाहरण क्या बताते हैं?
हाल के कुछ बड़े IPO इस बात का उदाहरण हैं कि अनलिस्टेड मार्केट में ऊंचे दाम पर खरीदारी हमेशा सही रणनीति नहीं होती।
- HDB Financial Services के शेयर अनलिस्टेड मार्केट में लगभग ₹1,000 से ₹1,300 तक कारोबार कर रहे थे। एक समय इनकी कीमत ₹1,525 तक पहुंच गई थी। लेकिन कंपनी ने IPO के लिए ₹700-740 का प्राइस बैंड तय किया।
- Tata Capital के शेयर भी अनलिस्टेड मार्केट में ₹700 से ₹1,125 तक पहुंच गए थे, जबकि IPO में कीमत ₹310-326 रखी गई।
- SBI Funds Management के IPO में भी शेयरों की कीमत अनलिस्टेड मार्केट की तुलना में 30% से अधिक डिस्काउंट पर तय की गई।
इन उदाहरणों से साफ है कि कंपनी अच्छी होने के बावजूद अनलिस्टेड मार्केट में जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाने वाले निवेशकों को नुकसान झेलना पड़ सकता है।
1. अनलिस्टेड मार्केट में शेयर की कीमत कैसे तय होती है?
लिस्टेड शेयर बाजार में कीमत मांग और आपूर्ति (Demand & Supply) के आधार पर हजारों निवेशकों की भागीदारी से तय होती है। लेकिन अनलिस्टेड मार्केट में ऐसा नहीं होता।
यहां शेयरों की खरीद-बिक्री सीमित खरीदारों और विक्रेताओं के बीच निजी सौदों (Private Transactions) के जरिए होती है। कम लिक्विडिटी और सीमित ट्रांजैक्शन के कारण कुछ बड़ी डील भी शेयर की कीमत को काफी ऊपर ले जा सकती हैं।
जैसे ही किसी कंपनी के IPO आने की चर्चा शुरू होती है, अनलिस्टेड मार्केट में शेयरों की मांग अचानक बढ़ जाती है और कई बार कीमतें वास्तविक वैल्यू से काफी ऊपर चली जाती हैं।
2. अच्छी कंपनी का मतलब हर कीमत पर अच्छा निवेश नहीं
किसी कंपनी का मजबूत ब्रांड या अच्छा बिजनेस मॉडल यह गारंटी नहीं देता कि उसके शेयर किसी भी कीमत पर खरीद लेना सही फैसला होगा।
निवेश करने से पहले इन बातों का मूल्यांकन जरूरी है:
- कंपनी की कमाई (Earnings)
- बुक वैल्यू (Book Value)
- भविष्य की ग्रोथ
- वैल्यूएशन
- संभावित रिटर्न
IPO की कीमत तय करने के दौरान कंपनी, मर्चेंट बैंकर और संस्थागत निवेशकों की मांग, बाजार की स्थिति और वैल्यूएशन का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। इसलिए कई बार IPO का प्राइस अनलिस्टेड मार्केट से काफी कम निकलता है।
3. FOMO के आधार पर निवेश करना पड़ सकता है भारी
अनलिस्टेड शेयरों में निवेश करने वाले कई निवेशक FOMO (Fear of Missing Out) का शिकार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि यदि अभी शेयर नहीं खरीदा तो बाद में मौका नहीं मिलेगा।
यही मानसिकता कई बार शेयरों में कृत्रिम तेजी (Bubble) पैदा कर देती है।
किसी भी निवेश से पहले यह समझना जरूरी है कि:
- कंपनी का बिजनेस मॉडल क्या है?
- भविष्य की कमाई की संभावना कितनी है?
- मौजूदा वैल्यूएशन उचित है या नहीं?
- IPO आने पर प्राइस कितना हो सकता है?
सिर्फ दूसरों को देखकर या सोशल मीडिया की चर्चा के आधार पर निवेश करना लंबे समय में नुकसानदायक साबित हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है सीख?
अनलिस्टेड शेयर बाजार में निवेश करने से पहले सिर्फ संभावित लिस्टिंग गेन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। सही वैल्यूएशन, कंपनी की वित्तीय स्थिति और बिजनेस की गुणवत्ता का आकलन करना बेहद जरूरी है। हाल के IPO यह संकेत देते हैं कि अनलिस्टेड मार्केट में ऊंची कीमत पर शेयर खरीदना हमेशा फायदे का सौदा नहीं होता।
यदि किसी शेयर की कीमत उसकी वास्तविक वैल्यू से काफी ऊपर पहुंच चुकी है, तो धैर्य रखना कई बार बेहतर रणनीति साबित हो सकती है। निवेश का फैसला हमेशा फंडामेंटल एनालिसिस के आधार पर लें, न कि केवल FOMO या बाजार की चर्चा के आधार पर।


