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बिजनेस न्यूज़

Trump Tariffs: कनाडा ने अमेरिका को दिखाया आईना, भारत को ट्रेड डील में नहीं करनी चाहिए ये बड़ी गलती

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/23 at 10:31 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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US-Canada Trade Talks Failed: अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार वार्ता टूटने के बाद भारत के लिए भी कई अहम सबक सामने आए हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को अमेरिका के साथ ट्रेड डील में जल्दबाजी करने के बजाय अपनी रणनीतिक और नियामकीय स्वायत्तता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

Contents
अमेरिका-कनाडा बातचीत क्यों टूटी?अमेरिका ने कनाडा पर लगाए भारी टैरिफअमेरिका की रियायतों के साथ जुड़ी थीं कई शर्तेंकनाडा के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या थी?भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा सबक?भारत को ट्रेड डील में किन गलतियों से बचना चाहिए?भारत-अमेरिका ट्रेड डील में क्यों बढ़ी चुनौती?सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी टैरिफ नीति पर नजरनिष्कर्ष

नई दिल्ली: अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार वार्ता का टूटना वैश्विक व्यापार के लिए अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। कनाडा ने 21 अगस्त 2026 को अमेरिका के साथ चल रही व्यापार बातचीत को रद्द कर दिया और अपनी वार्ता टीम को वापस बुला लिया। कनाडा का कहना है कि अमेरिका जिन रियायतों की मांग कर रहा था, उनके बदले पर्याप्त टैरिफ राहत नहीं दी जा रही थी।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, कनाडा का यह फैसला भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है। भारत इस समय अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली को किसी भी दबाव में आकर जल्दबाजी में ऐसी रियायतें नहीं देनी चाहिए, जिनका असर भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों पर पड़े।

अमेरिका-कनाडा बातचीत क्यों टूटी?

कनाडा और अमेरिका के बीच तीन दिन तक गहन बातचीत चली, लेकिन दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके। कनाडा को लगा कि अमेरिका की ओर से मिलने वाली टैरिफ राहत सीमित और शर्तों से जुड़ी हुई थी, जबकि बदले में वॉशिंगटन कई बड़ी रियायतें चाहता था।

अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने बातचीत टूटने को ‘गंवा दिया गया मौका’ बताया। उनके मुताबिक, अमेरिका ने कनाडा को अमेरिकी बाजार में पहुंच के मामले में दूसरे बड़े निर्यातकों की तुलना में बेहतर ट्रीटमेंट देने की पेशकश की थी। हालांकि, कनाडा की ओर से नई मांगें रखे जाने और पहले की प्रतिबद्धताओं में बदलाव के कारण बातचीत का संतुलन बिगड़ गया।

दूसरी ओर, कनाडा का कहना है कि अमेरिका की मांगें उसके आर्थिक हितों और संप्रभुता के लिए नुकसानदेह हो सकती थीं।

अमेरिका ने कनाडा पर लगाए भारी टैरिफ

बातचीत टूटने के बाद अमेरिका ने कनाडाई सामानों पर 50% तक टैरिफ लगाए। कनाडा ने भी जवाबी कार्रवाई का ऐलान करते हुए 8 सितंबर से ‘डॉलर-के-बदले-डॉलर’ के आधार पर जवाबी शुल्क लगाने की बात कही है।

दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं। 1994 में लागू हुए नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (NAFTA) के बाद दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार की व्यवस्था मजबूत हुई थी। 2020 में NAFTA की जगह अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट (USMCA) ने ले ली।

USMCA के तहत तय नियमों को पूरा करने वाले उत्तर अमेरिकी सामानों के लिए काफी हद तक शुल्क-मुक्त व्यापार की व्यवस्था है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस ढांचे के बाहर भी कई अतिरिक्त टैरिफ लगाए हैं।

इनमें कनाडाई स्टील, एल्युमीनियम, तांबे और संबंधित उत्पादों पर 50% तक के सेक्शन 232 टैरिफ तथा ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर 25% शुल्क शामिल हैं। इसके अलावा लकड़ी और लकड़ी से जुड़े उत्पादों पर भी अलग-अलग शुल्क लगाए गए हैं।

अमेरिका की रियायतों के साथ जुड़ी थीं कई शर्तें

GTRI के मुताबिक, अमेरिका कुछ क्षेत्रों में कनाडा को राहत देने के लिए तैयार था, लेकिन इसके साथ कड़ी शर्तें भी थीं।

मसलन, अमेरिका ने स्टील और एल्युमीनियम पर 50% टैरिफ को घटाकर 25% करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, इसके साथ कड़े आयात कोटा की शर्त जुड़ी थी।

इसी तरह कनाडा में बने वाहनों पर टैरिफ को 25% से घटाकर 15% करने की पेशकश की गई, लेकिन मीडियम और हेवी-ड्यूटी ट्रकों के लिए राहत नहीं दी गई। इसका असर कनाडा में बने फोर्ड और जनरल मोटर्स जैसे वाहनों पर पड़ सकता था।

इसके अलावा, करीब 20 अरब डॉलर मूल्य के कनाडाई उपभोक्ता और कृषि निर्यात पर 50% शुल्क को अस्थायी रूप से टालने का प्रस्ताव भी सामने आया। लेकिन इसके बदले आयात कोटा, डेयरी और कृषि क्षेत्र की सप्लाई-मैनेजमेंट व्यवस्था में बदलाव तथा अमेरिकी शराब की बिक्री पर लगे कुछ प्रांतीय प्रतिबंध हटाने जैसी शर्तों की मांग की गई।

कनाडा के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या थी?

कनाडा की सबसे बड़ी चिंता केवल टैरिफ नहीं थी। अमेरिका की कुछ मांगें पारंपरिक व्यापार नीति से आगे जाती दिखीं।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका कनाडा की दूसरे देशों के साथ स्वतंत्र रूप से व्यापार समझौते करने की क्षमता पर सीमाएं चाहता था। साथ ही अमेरिकी कंपनियों को कनाडा के महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों तक प्राथमिकता देने की मांग भी चर्चा में थी।

कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी शर्तों को आर्थिक रूप से नुकसानदेह और अनुचित बताया। उनका तर्क था कि अगर कनाडा ऐसी डील स्वीकार करता है तो अमेरिका के भारी टैरिफ बने रह सकते हैं, जबकि कनाडा की व्यापार नीति, रणनीतिक संसाधनों, कृषि व्यवस्था और अन्य नीतियों पर उसकी स्वतंत्रता कम हो सकती है।

कनाडा अब अमेरिका से आने वाले चुनिंदा सामानों पर जवाबी शुल्क लगाने की तैयारी में है। इनमें स्टील, डेयरी उत्पाद, घरेलू उपकरण, कृषि मशीनरी, पल्प-पेपर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उत्पाद शामिल हैं।

भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा सबक?

GTRI के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, भारत को अमेरिका के साथ बातचीत में कनाडा के अनुभव को गंभीरता से देखना चाहिए।

उनका कहना है कि भारत को कृषि, डिजिटल रेगुलेशन, क्रिटिकल मिनरल्स या सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कोई बड़ा वादा करने से पहले उसके बदले स्पष्ट, बाध्यकारी और लंबे समय तक टिकने वाली टैरिफ रियायत सुनिश्चित करनी चाहिए।

यानी सिर्फ कुछ अमेरिकी टैरिफ कम होने के आधार पर भारत को अपनी नीतियों में बड़े बदलाव करने से बचना चाहिए।

भारत को ट्रेड डील में किन गलतियों से बचना चाहिए?

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ट्रेड डील में मिलने वाले फायदे स्पष्ट और लागू करने योग्य हों। अगर किसी समझौते के तहत अमेरिका कुछ टैरिफ कम करता है, लेकिन भविष्य में अपने घरेलू कानूनों के तहत फिर नए शुल्क लगाने की गुंजाइश बनाए रखता है, तो इससे भारतीय निर्यातकों के लिए व्यापारिक अनिश्चितता बनी रह सकती है।

भारत को खास तौर पर इन मुद्दों पर सावधानी बरतनी होगी:

  • कृषि क्षेत्र में जल्दबाजी में बड़ी रियायत न देना।
  • डिजिटल रेगुलेशन और डेटा से जुड़े नियमों में अपनी नीति-निर्धारण क्षमता सुरक्षित रखना।
  • क्रिटिकल मिनरल्स जैसे रणनीतिक संसाधनों पर नियंत्रण से समझौता न करना।
  • सरकारी खरीद में ऐसी शर्तों से बचना जिनसे घरेलू उद्योग को नुकसान हो।
  • भविष्य में एकतरफा अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करना।
  • भारत की दूसरे देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार नीति पर किसी तरह की सीमा स्वीकार न करना।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील में क्यों बढ़ी चुनौती?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है। ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति ने इस बातचीत को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

अमेरिका की ओर से टैरिफ और व्यापार नीति में लगातार बदलाव के कारण भारतीय कंपनियों के लिए भविष्य की लागत और अमेरिकी बाजार तक पहुंच को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए केवल तत्काल टैरिफ राहत हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती ऐसी डील तैयार करने की होगी, जिसमें भारतीय निर्यातकों को लंबे समय तक स्थिर और भरोसेमंद बाजार पहुंच मिले।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी टैरिफ नीति पर नजर

ट्रंप प्रशासन के जवाबी टैरिफ को लेकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भी अमेरिकी व्यापार नीति में नया मोड़ पैदा किया है। इसके बाद प्रशासन दुनिया के अलग-अलग देशों पर टैरिफ लागू करने के वैकल्पिक कानूनी रास्ते तलाश रहा है।

यही वजह है कि भारत के लिए किसी भी व्यापार समझौते में भविष्य की टैरिफ नीति को लेकर स्पष्ट सुरक्षा हासिल करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

निष्कर्ष

अमेरिका-कनाडा व्यापार वार्ता का टूटना भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार खबर नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक चेतावनी भी है। भारत को अमेरिका के साथ बातचीत में बाजार पहुंच और टैरिफ राहत के बदले ऐसी रियायतें देने से बचना होगा जो लंबे समय में घरेलू उद्योग, कृषि, डिजिटल नीति या रणनीतिक संसाधनों को प्रभावित कर सकती हैं।

सीधी बात यह है कि भारत को ट्रेड डील में ‘जल्द समझौता’ नहीं, बल्कि ‘संतुलित और टिकाऊ समझौता’ प्राथमिकता देनी चाहिए। अमेरिका से मिलने वाली हर बड़ी रियायत के बदले भारत को भी स्पष्ट, बाध्यकारी और भविष्य के एकतरफा टैरिफ से सुरक्षित लाभ सुनिश्चित करना होगा।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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