Lilly Chen Success Story: अमेरिका के न्यूजर्सी में जन्मी लिली चेन की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। महज 16 साल की उम्र में गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद उन्होंने हाई स्कूल छोड़ दिया और बौद्ध भिक्षु बन गईं। करीब दो साल तक उन्होंने मठ में रहकर ध्यान, खेती और लोगों की बातें सुनने जैसी चीजें सीखीं। फिर एक वरिष्ठ भिक्षु की सलाह ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। वह अमेरिका लौटीं, कॉलेज में पढ़ाई की, खुद से कोडिंग सीखी और आगे चलकर Meta में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गईं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। नौकरी छोड़कर उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू किया, जो आज करोड़ों रुपये की कंपनी बन चुका है।
16 साल की उम्र में छोड़ दिया था हाई स्कूल
लिली चेन की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब वह सिर्फ 16 साल की थीं। उन्हें Graves’ Disease नाम की ऑटोइम्यून बीमारी का पता चला। बीमारी और उस समय परिवार की आर्थिक परिस्थितियों ने उनके जीवन पर गहरा असर डाला।
चेन के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें हर तरह की बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं आसानी से मिल सकें। वह सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा पर निर्भर थीं और उनका कहना था कि उन्हें प्रिवेंटिव हेल्थकेयर की पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पाती थी।
इसी दौरान उनकी मां, जो आध्यात्मिक रुझान रखती थीं, ने उन्हें बौद्ध धर्म और मठ की जिंदगी की ओर जाने का सुझाव दिया। लिली ने इस रास्ते को अपनाया और अमेरिका में दीक्षा लेने के बाद अपनी मां के साथ चीन के ग्रामीण इलाके में स्थित एक बौद्ध मठ में रहने चली गईं।
करीब दो साल तक रही भिक्षु
लिली चेन ने कुल मिलाकर करीब दो साल बौद्ध भिक्षु के रूप में बिताए। इसमें चीन के मठ में बिताया गया लगभग छह महीने का समय भी शामिल था।
मठ की जिंदगी आधुनिक दुनिया से बिल्कुल अलग थी। वहां बिजली जैसी सुविधाएं नहीं थीं। भिक्षु सुबह करीब 3 बजे उठकर ध्यान करते थे। इसके बाद खेती, सफाई, पानी लाने और मठ से जुड़े दूसरे काम किए जाते थे।
लेकिन इस अनुभव ने लिली को एक ऐसी सीख दी, जिसका असर आगे चलकर उनके बिजनेस पर भी दिखाई दिया।
मठ में कई लोग अपनी परेशानियां और व्यक्तिगत समस्याएं लेकर आते थे। वहां भिक्षुओं का काम हमेशा किसी समस्या का समाधान बताना नहीं होता था। कई बार वे सिर्फ लोगों की बातें सुनते थे।
लिली के मुताबिक, किशोर उम्र में हर दिन लोगों की परेशानियां सुनने से उन्होंने दूसरों को ध्यान से सुनने की कला सीखी। यही अनुभव बाद में उनके नेतृत्व और बिजनेस सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
एक भिक्षु ने पूछा- क्या तुम्हें सीखना पसंद है?
मठ में रहते हुए लिली अपना काफी समय पढ़ने में बिताती थीं। मठ के प्रमुख भिक्षु की नजर इस बात पर पड़ी। उन्होंने लिली से पूछा कि क्या उन्हें पढ़ना और नई चीजें सीखना पसंद है।
लिली ने उन्हें बताया कि अमेरिका में उन्हें सबसे ज्यादा पब्लिक लाइब्रेरी की कमी महसूस होती थी। इसके बाद उस भिक्षु ने उन्हें अमेरिका वापस जाकर पढ़ाई जारी रखने की सलाह दी।
उन्होंने लिली को समझाया कि यूनिवर्सिटी सिर्फ डिग्री हासिल करने की जगह नहीं है, बल्कि वहां जाकर उन्हें अपनी उम्र के लोगों से मिलने, नई चीजें सीखने और यह पता लगाने का मौका मिलेगा कि उन्हें वास्तव में किस क्षेत्र में रुचि है।
यही सलाह लिली चेन के जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गई।
अमेरिका वापस आना भी आसान नहीं था
हालांकि, अमेरिका वापस लौटने के बाद उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। उनके पास हाई स्कूल डिप्लोमा नहीं था और उन्हें कॉलेज में दाखिले की प्रक्रिया के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं थी।
शुरुआत में उनका विचार GED करने, फिर कम्युनिटी कॉलेज में दाखिला लेने और बाद में किसी चार वर्षीय कॉलेज में ट्रांसफर होने का था।
लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और तय कर रखा था।
एक दिन वह पब्लिक लाइब्रेरी में आयोजित कॉलेज फेयर में गईं। वहां उन्होंने एक टेबल पर ‘CC’ लिखा देखा। उन्हें लगा कि यह किसी कम्युनिटी कॉलेज का स्टॉल होगा। बाद में पता चला कि वह Colorado College का टेबल था।
वहां मौजूद एक महिला ने जब लिली की असामान्य जीवन यात्रा के बारे में सुना तो उन्हें ACT परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया।
ACT में हासिल किया 36 का स्कोर
लिली चेन ने ACT परीक्षा दी और 36 अंक हासिल किए। यह उस परीक्षा में संभव सबसे ऊंचा स्कोर था।
इसके बाद उन्हें Colorado College में Early Decision के तहत आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। लिली ने जब पूछा कि बिना हाई स्कूल डिप्लोमा के क्या वह आवेदन कर सकती हैं, तो उन्हें अपने टेस्ट स्कोर के साथ व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित एक Essay लिखने के लिए कहा गया।
उनकी कहानी और शानदार टेस्ट स्कोर ने रास्ता खोल दिया और उन्हें कॉलेज में दाखिला मिल गया।
इस तरह एक ऐसी लड़की, जिसने 16 साल की उम्र में हाई स्कूल छोड़ दिया था और कुछ समय बाद बौद्ध मठ में रह रही थी, अब अमेरिकी कॉलेज में पढ़ाई करने पहुंच चुकी थी।
कॉलेज में खुद सीखी Coding
कॉलेज के दौरान लिली चेन ने खुद से कोडिंग सीखना शुरू किया। टेक्नोलॉजी में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई और पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर अपना करियर शुरू किया।
आखिरकार उनकी नौकरी Meta में लगी, जहां उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया।
हालांकि, कॉर्पोरेट नौकरी में वह ज्यादा समय तक खुश नहीं रहीं। करीब एक साल बाद उन्हें महसूस हुआ कि वह कुछ ऐसा बनाना चाहती हैं, जिसका असर ज्यादा बड़े स्तर पर हो।
यहीं से उनके Entrepreneur बनने की कहानी शुरू हुई।
महामारी के दौरान दोस्तों के साथ शुरू हुआ आइडिया
कोविड-19 महामारी के दौरान लिली चेन ने अपने बचपन के तीन दोस्तों के साथ एक हैकाथॉन में हिस्सा लिया। इसी दौरान एक ऐसा प्रोजेक्ट तैयार हुआ, जिसने आगे चलकर कंपनी का रूप ले लिया।
2021 में इस प्रोजेक्ट को कंपनी के तौर पर स्थापित किया गया। शुरुआत में इसका नाम Contenda था, जिसे बाद में FSH Technologies के नाम से आगे बढ़ाया गया।
कंपनी का फोकस सरकारी टेक्नोलॉजी और सरकारी एजेंसियों की पुरानी और जटिल प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने पर है।
FSH शहरों, स्कूल डिस्ट्रिक्ट्स और सरकारी एजेंसियों के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करती है। कंपनी सिर्फ एक सॉफ्टवेयर बेचने के बजाय सरकारी संस्थानों की पूरी प्रक्रिया को समझकर समस्या का समाधान करने की कोशिश करती है।
‘तालाब बनो, मछली नहीं’ ने बदल दी सोच
लिली चेन की कंपनी की सोच पर उनके बौद्ध मठ के अनुभव का गहरा असर दिखाई देता है।
मठ में रहते हुए उनके जिम्मे कोइ मछलियों के तालाब की देखभाल का काम भी था। इसी दौरान जिस भिक्षु ने उन्हें कॉलेज जाने की सलाह दी थी, वह अक्सर उनसे एक बात कहते थे- ‘तालाब बनो, मछली नहीं।’
लिली ने इस बात को सिर्फ एक आध्यात्मिक सीख के तौर पर नहीं लिया। उन्होंने इसे समस्या को बड़े स्तर पर देखने का तरीका बनाया।
उनके मुताबिक, अगर सरकारी टेक्नोलॉजी को एक ‘मछली’ माना जाए तो सिर्फ सॉफ्टवेयर बनाना उस मछली को सुधारने जैसा है। लेकिन असली समस्या सिर्फ सॉफ्टवेयर में नहीं होती। उसके साथ सरकारी खरीद के नियम, पुरानी प्रक्रियाएं, कर्मचारियों की आदतें, बदलाव को लेकर विरोध और मैनेजमेंट जैसे कई दूसरे पहलू भी जुड़े होते हैं।
इसी वजह से FSH Technologies किसी एक समस्या के बजाय पूरे सिस्टम को देखने की कोशिश करती है।
Accenture जैसी बड़ी कंपनियों से मुकाबला
सरकारी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में FSH Technologies का मुकाबला बड़ी और स्थापित कंसल्टिंग कंपनियों से होता है। इनमें Accenture जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।
लिली चेन के मुताबिक, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट के लिए बोली लगाते समय उनका सामना कई बार Accenture से होता है। कुछ मामलों में उनकी कंपनी ने ऐसी बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़कर कॉन्ट्रैक्ट भी हासिल किए हैं।
यह छोटी अवधि में बनाई गई कंपनी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है, क्योंकि सरकारी टेक्नोलॉजी के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए कंपनियों को स्थापित खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।
FSH Technologies ने जुटाई करीब ₹239 करोड़ की फंडिंग
लिली चेन की कंपनी ने अब तक कुल 2.5 करोड़ डॉलर यानी करीब ₹239 करोड़ की फंडिंग जुटाई है।
कंपनी के हालिया फंडिंग राउंड में करीब 2 करोड़ डॉलर की Series A फंडिंग शामिल है। इस राउंड की अगुवाई लैची ग्रूम ने की। वह Figma, Notion, Ramp और Lattice जैसी टेक कंपनियों के शुरुआती निवेशकों में रह चुके हैं।
इससे पहले FSH Technologies ने करीब 50 लाख डॉलर का Seed Round भी जुटाया था। इस राउंड की अगुवाई Contrary और Acrew ने की थी। इसमें General Catalyst, Scribble और Basis Set Ventures जैसे निवेशकों ने भी भाग लिया था।
इस फंडिंग से कंपनी को सरकारी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपने कारोबार और प्रोडक्ट्स को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।
पारंपरिक Consulting कंपनियों से अलग है बिजनेस मॉडल
FSH Technologies का बिजनेस मॉडल भी पारंपरिक कंसल्टिंग कंपनियों से अलग बताया जाता है।
लिली चेन के मुताबिक, कंपनी कंसल्टिंग के घंटों के आधार पर ग्राहकों से पैसे नहीं लेती। इसके अलावा कंपनी के पास पारंपरिक मॉडल की तरह अलग-अलग Salespeople और Consultants की बड़ी टीम भी नहीं है।
उनकी कंपनी में कर्मचारियों को ‘Builder’ के तौर पर देखा जाता है। यानी टीम का उद्देश्य सिर्फ सलाह देना नहीं बल्कि समस्या को समझकर उसके लिए वास्तविक टेक्नोलॉजी समाधान तैयार करना है।
यही मॉडल कंपनी को सरकारी एजेंसियों की जटिल समस्याओं को सॉफ्टवेयर और टेक्नोलॉजी के जरिए हल करने में मदद करता है।
भिक्षु से Entrepreneur बनने की कहानी देती है बड़ी सीख
लिली चेन की कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि जिंदगी का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता।
16 साल की उम्र में बीमारी के कारण हाई स्कूल छोड़ना, फिर बौद्ध भिक्षु बनना, चीन के ग्रामीण मठ में सादगी भरी जिंदगी जीना, वहां लोगों की बातें सुनना, एक भिक्षु की सलाह पर अमेरिका लौटकर कॉलेज जाना, खुद से कोडिंग सीखना, Meta में नौकरी करना और आखिरकार अपनी कंपनी खड़ी करना—लिली के करियर में कई ऐसे मोड़ आए, जिनकी कल्पना शायद उन्होंने खुद भी नहीं की होगी।
मठ में मिली ‘तालाब बनो, मछली नहीं’ की सीख आज उनके बिजनेस विजन का हिस्सा बन चुकी है। किसी एक समस्या पर अटकने के बजाय पूरी व्यवस्था और उसके पीछे मौजूद कारणों को समझना ही उनकी कंपनी की रणनीति है।
आज FSH Technologies की करोड़ों रुपये की फंडिंग और सरकारी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा यह दिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे असामान्य शुरुआत भी एक असाधारण Entrepreneurial Journey की नींव बन सकती है।


