नई दिल्ली। देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह एक बार फिर कानूनी विवादों के कारण सुर्खियों में है। इस बार मामला किसी कारोबारी सौदे, अधिग्रहण या कंपनी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि करीब 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर से जुड़ा हुआ है। टाटा ट्रस्ट्स ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए आरोप लगाने वाले याचिकाकर्ता सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े और उनकी वकील कात्यायनी अग्रवाल को कानूनी नोटिस भेजा है।
नोटिस में दोनों से आरोप तुरंत वापस लेने की मांग की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि आरोप वापस नहीं लिए गए तो मानहानि, प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और मानसिक प्रताड़ना के लिए 1000 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की जाएगी। यह मामला न केवल टाटा ट्रस्ट्स बल्कि पूरे टाटा समूह की छवि और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा माना जा रहा है।
क्या है 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर का मामला?
विवाद की जड़ जनवरी 1989 में हुए एक शेयर ट्रांसफर से जुड़ी है। यह ट्रांसफर नवजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) से दिवंगत उद्योगपति नवल एच. टाटा के नाम 833 शेयरों के हस्तांतरण से संबंधित है।
समय के साथ इन शेयरों का स्वामित्व नवल टाटा के परिवार के पास पहुंचा। वर्तमान में इन शेयरों से जुड़ा हित दिवंगत रतन टाटा, जिमी टाटा और नोएल टाटा के परिवारों से संबंधित माना जाता है।
याचिकाकर्ता सुरेश पाटिलखेड़े ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष शिकायत दर्ज कर दावा किया कि यह शेयर ट्रांसफर नियमों के अनुरूप नहीं था और इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से दायर शिकायत में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार:
- एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट के शेयर किसी निजी व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं किए जा सकते थे।
- शेयर ट्रांसफर के लिए आवश्यक बोर्ड प्रस्ताव या वैध ट्रांसफर डीड उपलब्ध नहीं थी।
- शेयरों का हस्तांतरण कथित रूप से बिना किसी भुगतान के किया गया।
- महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया।
इन आरोपों के आधार पर पूरे लेन-देन की वैधता पर सवाल उठाया गया और जांच की मांग की गई।
टाटा ट्रस्ट्स ने आरोपों को बताया निराधार
टाटा ट्रस्ट्स ने सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि शेयर ट्रांसफर पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया था।
ट्रस्ट के मुताबिक नवल टाटा शेयर ट्रांसफर से लगभग एक वर्ष पहले ट्रस्ट से इस्तीफा दे चुके थे। इसलिए हितों के टकराव का सवाल नहीं उठता।
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में कहा कि इस लेन-देन को संबंधित संस्थाओं के बोर्ड की विधिवत मंजूरी प्राप्त थी। साथ ही शेयरों के बदले उचित प्रतिफल (Consideration) का भुगतान भी किया गया था।
नानी पालखीवाला का भी हुआ जिक्र
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बचाव में एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया है। ट्रस्ट्स का दावा है कि उस समय इस पूरी प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा देश के सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक और कर कानून विशेषज्ञों में से एक दिवंगत नानी पालखीवाला द्वारा की गई थी।
नानी पालखीवाला भारतीय कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जगत का एक बड़ा नाम रहे हैं। ऐसे में टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि यदि उस समय किसी प्रकार की कानूनी अनियमितता होती तो उसे मंजूरी नहीं मिल सकती थी।
पहले भी हो चुका है विवाद
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसी याचिकाकर्ता की एक अन्य शिकायत पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने 15 मई को टाटा ट्रस्ट्स के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया था।
उस आदेश में ट्रस्ट को नई बैठकें आयोजित करने और कुछ प्रशासनिक निर्णय लेने से अस्थायी रूप से रोका गया था। कमिश्नर इस बात की जांच कर रहे हैं कि कहीं ट्रस्ट ने महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के किसी प्रावधान का उल्लंघन तो नहीं किया।
हालांकि बाद में इस आदेश को लेकर कानूनी बहस तेज हो गई और मामला और अधिक चर्चा में आ गया।
8 जून की बैठक पर सबकी नजर
टाटा ट्रस्ट्स की अगली महत्वपूर्ण बैठक 8 जून को प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि इस बैठक में ट्रस्ट के प्रशासनिक और रणनीतिक मामलों पर चर्चा हो सकती है।
ऐसे समय में 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर विवाद का सामने आना और उसके बाद 1000 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग करना इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना देता है।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल टाटा ट्रस्ट्स तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारत के ट्रस्ट प्रबंधन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े व्यापक सवाल भी उठ सकते हैं।
‘सीरियल लिटिगेटर’ कहकर साधा निशाना
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने आधिकारिक बयान में सुरेश पाटिलखेड़े को “सीरियल लिटिगेटर” यानी आदतन मुकदमेबाज बताया है।
ट्रस्ट का आरोप है कि लगातार कानूनी शिकायतों और याचिकाओं के माध्यम से टाटा परिवार तथा टाटा ट्रस्ट्स की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। ट्रस्ट्स का कहना है कि इन आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है और उनका उद्देश्य केवल सार्वजनिक छवि को धूमिल करना है।
टाटा ट्रस्ट्स का महत्व क्यों है?
टाटा ट्रस्ट्स भारत के सबसे बड़े परोपकारी संगठनों में से एक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
टाटा संस में भी टाटा ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। यही कारण है कि ट्रस्ट से जुड़ा कोई भी विवाद निवेशकों, कॉर्पोरेट जगत और नियामक संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबकी निगाहें दो महत्वपूर्ण घटनाओं पर टिकी हैं। पहली, क्या याचिकाकर्ता अपने आरोप वापस लेते हैं या नहीं। दूसरी, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।
यदि मामला अदालत तक पहुंचता है तो यह भारत के कॉर्पोरेट और ट्रस्ट कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी केस बन सकता है। वहीं यदि दोनों पक्ष किसी समाधान पर पहुंचते हैं तो विवाद अपेक्षाकृत जल्दी समाप्त भी हो सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर को लेकर शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में टाटा समूह और कॉर्पोरेट जगत की सबसे चर्चित खबरों में शामिल रहने वाला है।


