भारत की सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में शामिल Tata Steel को ब्रिटेन में अपने सबसे महत्वपूर्ण ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट में नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कंपनी के 1.25 अरब पाउंड (करीब 15,838 करोड़ रुपये) के निवेश वाले पोर्ट टैलबोट प्रोजेक्ट की समयसीमा अब 6 से 8 महीने तक आगे खिसक सकती है। इसकी वजह तकनीकी नहीं बल्कि बिजली आपूर्ति से जुड़ी एक बड़ी बाधा है।
कंपनी को नए इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) संयंत्र के लिए आवश्यक हाई-वोल्टेज बिजली कनेक्शन समय पर नहीं मिल पा रहा है। यह प्रोजेक्ट टाटा स्टील की वैश्विक कार्बन उत्सर्जन घटाने की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है और ब्रिटेन सरकार भी इसमें भारी वित्तीय सहायता दे रही है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
टाटा स्टील ब्रिटेन के पोर्ट टैलबोट स्टील प्लांट में पुराने ब्लास्ट फर्नेस की जगह आधुनिक इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस लगाने का काम कर रही है। इस परियोजना का उद्देश्य कोयले आधारित स्टील उत्पादन को कम करना और कम कार्बन उत्सर्जन वाली स्टील निर्माण प्रक्रिया को अपनाना है।
कंपनी के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य वित्त अधिकारी कौशिक चटर्जी ने बताया कि ब्रिटेन के राष्ट्रीय बिजली ग्रिड ने आधिकारिक रूप से सूचित किया है कि हाई-वोल्टेज बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने वाली उसकी परियोजना निर्धारित समय से पीछे चल रही है। इसी कारण टाटा स्टील का नया संयंत्र समय पर शुरू नहीं हो पाएगा।
उन्होंने कहा कि कंपनी इस देरी को कम करने के लिए ब्रिटेन सरकार, नेशनल ग्रिड और इलेक्ट्रिसिटी सिस्टम ऑपरेटर (ESO) के साथ लगातार बातचीत कर रही है। हालांकि फिलहाल 6 से 8 महीने की देरी की संभावना काफी मजबूत दिखाई दे रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रोजेक्ट?
पोर्ट टैलबोट प्लांट केवल टाटा स्टील के लिए ही नहीं बल्कि ब्रिटेन के औद्योगिक भविष्य के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह संयंत्र ब्रिटेन के सबसे बड़े स्टील उत्पादन केंद्रों में शामिल है।
नया इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस सालाना 32 लाख टन स्टील उत्पादन क्षमता के साथ स्थापित किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस की तुलना में काफी कम कार्बन उत्सर्जन करता है और स्क्रैप स्टील के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देता है।
दुनियाभर की स्टील कंपनियां अब ग्रीन स्टील उत्पादन की ओर बढ़ रही हैं क्योंकि सरकारें और निवेशक कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में टाटा स्टील का यह निवेश कंपनी के दीर्घकालिक भविष्य के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ब्रिटेन सरकार भी कर रही है मदद
इस परियोजना में ब्रिटेन सरकार लगभग 50 करोड़ पाउंड की वित्तीय सहायता दे रही है। इसका उद्देश्य देश के स्टील उद्योग को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद पोर्ट टैलबोट संयंत्र से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 90 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। यह सालाना लगभग 50 लाख टन कार्बन उत्सर्जन कम करने के बराबर होगा।
यूरोप में तेजी से सख्त होते पर्यावरण नियमों को देखते हुए यह परियोजना टाटा स्टील के लिए भविष्य की प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में भी मदद कर सकती है।
निर्माण कार्य जारी, लेकिन बिजली सबसे बड़ी चुनौती
टाटा स्टील के अनुसार परियोजना स्थल पर कई महत्वपूर्ण चरण पूरे हो चुके हैं। पुराने ढांचों को हटाने का काम लगभग पूरा हो चुका है और नए संयंत्र के लिए आवश्यक उपकरणों का निर्माण एवं आपूर्ति भी जारी है।
हालांकि इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस को संचालित करने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। जब तक हाई-वोल्टेज बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं होगा, तब तक संयंत्र का व्यावसायिक संचालन शुरू नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि बिजली कनेक्शन में आई देरी पूरी परियोजना की समयसीमा को प्रभावित कर रही है।
आग की घटना ने भी बढ़ाई चिंता
पोर्ट टैलबोट प्रोजेक्ट हाल ही में एक अन्य कारण से भी चर्चा में आया था। 3 जून को परियोजना स्थल पर आग लगने की एक घटना हुई थी। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया कि सभी कर्मचारी सुरक्षित रहे और किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई।
कंपनी का कहना है कि इतने बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट में कई प्रकार की चुनौतियां आती रहती हैं और समयसीमा में बदलाव होना असामान्य नहीं है। इसके बावजूद परियोजना को सुरक्षित और जल्द पूरा करने के लिए सभी संबंधित एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
स्टॉक मार्केट के नजरिए से देखें तो यह खबर अल्पकालिक रूप से निवेशकों की चिंता बढ़ा सकती है। परियोजना में देरी का मतलब है कि कंपनी को ग्रीन स्टील उत्पादन से मिलने वाले संभावित लाभ के लिए अधिक समय इंतजार करना पड़ेगा।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता या रणनीतिक महत्व को प्रभावित नहीं करती। यदि बिजली कनेक्शन की समस्या अगले कुछ महीनों में सुलझ जाती है तो दीर्घकाल में यह निवेश टाटा स्टील के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
शुक्रवार को कंपनी का शेयर लगभग 2 प्रतिशत गिरकर 206.80 रुपये पर बंद हुआ। कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब 2.58 लाख करोड़ रुपये है।
आगे क्या होगा?
अब बाजार की नजर ब्रिटेन के राष्ट्रीय ग्रिड और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर रहेगी। यदि बिजली कनेक्शन का काम तेजी से पूरा होता है तो देरी सीमित रह सकती है। लेकिन यदि बुनियादी ढांचे की परियोजना और पीछे खिसकती है तो टाटा स्टील को अपनी समयसीमा दोबारा संशोधित करनी पड़ सकती है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पोर्ट टैलबोट का यह ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट टाटा स्टील की वैश्विक रणनीति का केंद्र बना रहेगा। कंपनी और ब्रिटेन सरकार दोनों इस निवेश को सफल बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं।


