नई दिल्ली: अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर असर और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसी बीच अमेरिका के कुछ सीनेटरों द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर 100% आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव चर्चा में है। पहली नजर में यह स्थिति भारत के लिए चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है, लेकिन यदि पिछले 50 वर्षों के इतिहास को देखें तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक विविध, मजबूत और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर आधारित हो चुकी है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर पहले जितना व्यापक नहीं रह गया है।
फिर बढ़ा पश्चिम एशिया में तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला।
युद्धविराम के बाद जहां ब्रेंट क्रूड करीब 72.6 डॉलर प्रति बैरल पर था, वहीं हाल के दिनों में इसकी कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई। इसी दौरान अमेरिकी सीनेट में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी सामने आया, जिससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।
इतिहास बताता है कि दुनिया इससे बड़े संकट झेल चुकी है
हालांकि वर्तमान स्थिति को लेकर घबराने की जरूरत इसलिए भी नहीं है क्योंकि दुनिया इससे कहीं बड़े तेल संकटों का सामना कर चुकी है।
1973-74 का अरब तेल संकट
1973 में अरब देशों द्वारा लगाए गए तेल प्रतिबंध के दौरान कच्चे तेल की कीमत करीब 2.7 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 10 डॉलर से ऊपर पहुंच गई थी। उस समय पूरी दुनिया में दोहरे अंक की महंगाई और आर्थिक मंदी देखने को मिली थी।
अमेरिका ने उस दौर में ‘प्रोजेक्ट इंडिपेंडेंस’ शुरू किया। इसका उद्देश्य मध्य-पूर्व के तेल पर निर्भरता खत्म करना था। सिंथेटिक ईंधन, शेल ऑयल, कोयला गैसीकरण, पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा जैसी कई तकनीकों पर अरबों डॉलर खर्च किए गए, लेकिन तत्काल कोई बड़ा विकल्प विकसित नहीं हो पाया।
1980 का ईरान-इराक युद्ध
1980 में ईरान-इराक युद्ध के दौरान तेल की कीमतें फिर बढ़कर करीब 30 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इसके बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था ने खुद को संभाल लिया और बाजार ने धीरे-धीरे संतुलन बना लिया।
जापान और भारत के अनुभव भी देते हैं सीख
1974 के संकट के बाद जापान ने दुनिया भर में तेल के नए स्रोत खोजने और वैकल्पिक ऊर्जा में निवेश की कोशिश की, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद 1990 तक जापान दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा।
भारत ने भी ईरान के रोस्तम और रक्ष तेल क्षेत्रों में हिस्सेदारी लेकर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में ईरान ने इन परिसंपत्तियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे विदेशों में तेल क्षेत्र खरीदने की रणनीति काफी हद तक असफल साबित हुई।
तेल महंगा हुआ, फिर भी भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती रही
1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से कर्ज लेना पड़ा था। इसके बावजूद उस दशक में भारत की औसत GDP वृद्धि दर करीब 5.3% रही, जो उस समय तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।
1990 में इराक द्वारा कुवैत पर कब्जे के बाद भी तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, लेकिन यह उछाल लंबे समय तक नहीं टिक सका।
इसके बाद 2003 से 2008 के बीच वैश्विक कमोडिटी बूम के दौरान ब्रेंट क्रूड 24 डॉलर से बढ़कर 144 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इसके बावजूद भारत ने कुछ वर्षों में करीब 10% आर्थिक वृद्धि दर्ज की और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी चीन की अगुवाई में मजबूत बनी रही।
आज का दौर पहले से अलग क्यों है?
ऊर्जा बाजार में पिछले पांच दशकों में बड़ा बदलाव आया है।
- 1975 में वैश्विक ऊर्जा खपत में तेल की हिस्सेदारी लगभग 46% थी।
- अब यह घटकर 30% से भी कम रह गई है।
- सौर और पवन ऊर्जा पहले की तुलना में काफी सस्ती हो चुकी हैं।
- दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है।
- नई बिजली परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान लगातार बढ़ रहा है।
यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं है।
IMF और RBI भी अर्थव्यवस्था को लेकर आश्वस्त
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार वर्ष 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 3% की दर से बढ़ सकती है, जबकि 2027 में यह 3.4% तक पहुंचने का अनुमान है।
वहीं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का अनुमान है कि भारत की GDP वृद्धि दर इस वर्ष 6.6% रह सकती है। यह पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी कम जरूर है, लेकिन भारत की दीर्घकालिक औसत आर्थिक वृद्धि दर 6.5% से अब भी बेहतर मानी जा रही है।
क्या 100% अमेरिकी टैरिफ वास्तव में बड़ा खतरा है?
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव अभी केवल अमेरिकी सीनेट में पेश किया गया मसौदा है।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का प्रस्ताव पहले भी लंबे समय तक बिना किसी ठोस प्रगति के पड़ा रहा है। इसलिए इसे तत्काल लागू होने वाला फैसला मानना उचित नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका में ऐसे किसी कानून को लागू करने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन और कई विधायी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
भविष्य में तेल की भूमिका खत्म नहीं होगी
हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन तेल की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।
विमानन, समुद्री परिवहन, पेट्रोकेमिकल उद्योग और भारी औद्योगिक क्षेत्रों में आने वाले वर्षों तक तेल की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी। इसलिए भारत सहित सभी देशों को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक तेल भंडार मजबूत करने की दिशा में काम जारी रखना होगा।
निष्कर्ष
करीब पांच दशक पहले आए पहले वैश्विक तेल संकट की तुलना में आज दुनिया कहीं अधिक तैयार है। ऊर्जा के नए विकल्प, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और मजबूत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं ने तेल पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर दिया है।
ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी या अमेरिकी टैरिफ प्रस्ताव जैसी घटनाएं निश्चित रूप से बाजार में अस्थायी उतार-चढ़ाव ला सकती हैं, लेकिन इतिहास यह बताता है कि केवल इन कारणों से भारत जैसी बड़ी और विविध अर्थव्यवस्था के विकास की रफ्तार थमने की संभावना बहुत कम है।


