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Reading: RBI ने NDF पाबंदियां क्यों हटाईं? डिप्टी गवर्नर T Rabi Sankar ने बताया पूरा कारण, रुपये पर क्या पड़ेगा असर
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RBI ने NDF पाबंदियां क्यों हटाईं? डिप्टी गवर्नर T Rabi Sankar ने बताया पूरा कारण, रुपये पर क्या पड़ेगा असर

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/26 at 9:33 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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7 Min Read
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RBI ने NDF curbs हटाए, जानिए T Rabi Sankar ने क्या कहा और इसका रुपये व बाजार पर क्या असर पड़ेगा।

Contents
क्या था पूरा मामला: NDF कर्ब्स क्यों लगाए गए थे?अब क्यों हटाई गईं पाबंदियां?क्या बदला है अब? (Latest Update)Original Insight: RBI की रणनीति क्या संकेत देती है?रुपये पर क्या पड़ेगा असर?RBI का बड़ा लक्ष्य: रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरणबॉन्ड मार्केट पर भी फोकसग्लोबल फैक्टर: वेस्ट एशिया संकट का असरक्या फिर से लग सकती हैं पाबंदियां?निष्कर्ष: संतुलन बनाए रखने की कोशिश

मुंबई — भारतीय रिजर्व बैंक यानी Reserve Bank of India (RBI) ने हाल ही में ऑफशोर नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) ट्रेडिंग पर लगाई गई पाबंदियों को आंशिक रूप से वापस ले लिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब रुपये में अस्थिरता (volatility) पहले के मुकाबले कम होती दिख रही है।

RBI के डिप्टी गवर्नर T Rabi Sankar ने साफ किया कि ये पाबंदियां स्थायी नहीं थीं, बल्कि केवल अस्थायी तौर पर बाजार में आई अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए लगाई गई थीं।


क्या था पूरा मामला: NDF कर्ब्स क्यों लगाए गए थे?

1 अप्रैल 2026 को RBI ने अचानक ऑफशोर NDF ट्रेडिंग पर कुछ सख्त कदम उठाए थे। उस समय रुपये के बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा था, जिससे वित्तीय स्थिरता पर असर पड़ सकता था।

NDF यानी Non-Deliverable Forward एक ऐसा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट होता है जिसमें वास्तविक मुद्रा का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि केवल अंतर (difference) का सेटलमेंट होता है। यह खासतौर पर विदेशी बाजारों में रुपये के भविष्य के मूल्य पर सट्टा लगाने या हेजिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

जब इस तरह के ऑफशोर बाजारों में ज्यादा सट्टा गतिविधि बढ़ जाती है, तो उसका असर घरेलू मुद्रा पर भी पड़ सकता है। यही वजह थी कि RBI को हस्तक्षेप करना पड़ा।


अब क्यों हटाई गईं पाबंदियां?

T Rabi Sankar के अनुसार, जब बाजार में अस्थिरता कम हो गई और स्थिति नियंत्रण में आ गई, तो इन अस्थायी उपायों को हटाना जरूरी था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि RBI का उद्देश्य किसी खास दिशा में रुपये को ले जाना नहीं था, बल्कि केवल excessive volatility को नियंत्रित करना था।

यानी यह कदम “direction control” के लिए नहीं बल्कि “stability management” के लिए उठाया गया था।


क्या बदला है अब? (Latest Update)

RBI के इस फैसले के बाद अब:

  • अधिकृत डीलर्स (Authorised Dealers) फिर से ग्राहकों को रुपये से जुड़े डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स ऑफर कर सकते हैं
  • बैंक पहले से कैंसिल किए गए कॉन्ट्रैक्ट्स को दोबारा बुक (rebook) कर सकते हैं
  • हालांकि, USD 100 मिलियन की ओपन पोजिशन लिमिट अभी भी लागू है

यह लिमिट इसलिए रखी गई है ताकि बाजार में अनावश्यक सट्टेबाजी को रोका जा सके और स्थिरता बनी रहे।


Original Insight: RBI की रणनीति क्या संकेत देती है?

यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि RBI ने पूरी तरह से पाबंदियां नहीं हटाईं, बल्कि उन्हें आंशिक रूप से वापस लिया है।

इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक अभी भी सतर्क है और वह बाजार की गतिविधियों पर नजर बनाए रखना चाहता है।

यह एक balanced approach है—जहां बाजार को खुलापन भी दिया जा रहा है और जोखिम को भी नियंत्रित रखा जा रहा है।


रुपये पर क्या पड़ेगा असर?

NDF बाजार में easing होने का सीधा असर रुपये की liquidity और price discovery पर पड़ सकता है।

जब विदेशी निवेशकों और ट्रेडर्स को ज्यादा flexibility मिलती है, तो बाजार में भागीदारी बढ़ती है, जिससे रुपये का मूल्य ज्यादा पारदर्शी तरीके से तय होता है।

हालांकि, अगर सट्टा गतिविधि फिर से बढ़ती है, तो अस्थिरता भी लौट सकती है। यही वजह है कि RBI ने USD 100 मिलियन की सीमा को बरकरार रखा है।


RBI का बड़ा लक्ष्य: रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण

T Rabi Sankar ने यह भी कहा कि RBI का दीर्घकालिक लक्ष्य डॉलर-रुपया बाजार को वैश्विक स्तर पर एकीकृत करना और रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण (internationalisation) है।

इस दिशा में NDF मार्केट का खुलापन एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है, क्योंकि इससे विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ती है।


बॉन्ड मार्केट पर भी फोकस

इस दौरान T Rabi Sankar ने भारत के गवर्नमेंट बॉन्ड मार्केट को लेकर भी अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत का बॉन्ड मार्केट दुनिया के सबसे ज्यादा liquid और transparent बाजारों में से एक है।

RBI लगातार इस दिशा में काम कर रहा है कि विदेशी निवेशकों के लिए निवेश प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, ताकि ज्यादा पूंजी भारत में आए।


ग्लोबल फैक्टर: वेस्ट एशिया संकट का असर

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए RBI पूरी तरह सतर्क है। खासतौर पर वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है।

अगर तेल की कीमतों में तेजी आती है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और रुपये पर पड़ सकता है।

Reserve Bank of India ने साफ किया है कि अगर भविष्य में बाजार में किसी तरह का तनाव आता है, तो वह फिर से हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकेगा।


क्या फिर से लग सकती हैं पाबंदियां?

इस सवाल के जवाब में T Rabi Sankar ने कहा कि RBI केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब “excessive और disruptive volatility” होती है।

यानी अगर बाजार में फिर से ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, तो ऐसे कदम दोबारा उठाए जा सकते हैं।


निष्कर्ष: संतुलन बनाए रखने की कोशिश

RBI का यह कदम यह दिखाता है कि वह बाजार को पूरी तरह खुला छोड़ने और पूरी तरह नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

एक तरफ वह बाजार को flexibility दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ जोखिम को भी सीमित कर रहा है।

Reserve Bank of India की यह रणनीति आने वाले समय में रुपये की स्थिरता और भारत के वित्तीय बाजारों के विकास में अहम भूमिका निभा सकती है।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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