Crude Oil Price Today: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल देखने को मिला है। 22 जुलाई को ब्रेंट क्रूड करीब 2.76% बढ़कर 93.54 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड 2.83% की तेजी के साथ 86.74 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता दिखा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर सिर्फ वैश्विक बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय शेयर बाजार, रुपये की मजबूती, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और आम लोगों के घरेलू बजट पर भी साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
क्यों बढ़ रही हैं क्रूड ऑयल की कीमतें?
क्रूड ऑयल में आई इस तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव है। दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ रही जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है।
तनाव का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर देखने को मिल रहा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले ऑयल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका के कारण वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है।
शेयर बाजार पर दिखा असर
महंगे क्रूड का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला।
- निफ्टी करीब 186 अंक (0.76%) टूट गया।
- सेंसेक्स में लगभग 700 अंकों की गिरावट दर्ज की गई।
- ऑटो, एविएशन, पेंट, केमिकल और तेल पर निर्भर कंपनियों के शेयरों पर सबसे ज्यादा दबाव देखा गया।
विश्लेषकों के अनुसार भारत जैसे आयात आधारित देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी बाजार की धारणा को कमजोर करती है।
डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा।
डॉलर के मुकाबले रुपया 11 पैसे टूटकर 96.36 के स्तर पर पहुंच गया। जब क्रूड महंगा होता है तो भारत को तेल आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।
कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।
पहले भी 120 डॉलर तक पहुंच चुका था ब्रेंट क्रूड
इस साल फरवरी के आखिर में अमेरिका-ईरान तनाव शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं और एक समय यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
बाद में दोनों देशों के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) की खबर आने पर कीमतों में राहत मिली थी, लेकिन अब एक बार फिर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है और तेल की कीमतें फिर चढ़ने लगी हैं।
भारत का क्रूड आयात बिल 60% बढ़ा
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जून तिमाही में भारत का क्रूड ऑयल आयात बिल पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 60% बढ़ गया है।
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सरकार पर सब्सिडी और वित्तीय प्रबंधन का दबाव भी बढ़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल और गैस फिर हो सकते हैं महंगे
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियां पहले भी कई बार ईंधन के दाम बढ़ा चुकी हैं।
वर्तमान में प्रमुख शहरों में ईंधन की कीमतें इस प्रकार हैं—
- दिल्ली: पेट्रोल ₹102.12 प्रति लीटर, डीजल ₹95.20 प्रति लीटर
- मुंबई: पेट्रोल ₹111.21 प्रति लीटर
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में फिर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
रोजमर्रा की चीजें भी हो सकती हैं महंगी
महंगा डीजल सिर्फ वाहन चलाने की लागत नहीं बढ़ाता, बल्कि पूरे सप्लाई चेन को प्रभावित करता है।
देश में अधिकांश माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है, जहां डीजल प्रमुख ईंधन है। ऐसे में ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने से फल, सब्जियां, दूध, अनाज, एफएमसीजी उत्पाद और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं।
पहले से ही कई खाद्य वस्तुओं में महंगाई देखने को मिल रही है। यदि क्रूड की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो खुदरा महंगाई (Retail Inflation) पर भी अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
महंगे कच्चे तेल का असर सीधे और परोक्ष दोनों रूपों में आम लोगों तक पहुंचता है।
- पेट्रोल और डीजल महंगे होने की संभावना बढ़ती है।
- एलपीजी और अन्य ईंधन की लागत बढ़ सकती है।
- ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
- महंगाई बढ़ने से परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो सकता है।
- शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव से निवेशकों की धारणा कमजोर पड़ सकती है।
- रुपये की कमजोरी से आयातित वस्तुएं और महंगी हो सकती हैं।
निष्कर्ष
कच्चे तेल की कीमतों में आई नई तेजी भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि देश अपनी अधिकांश तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। मध्य पूर्व में तनाव और वैश्विक सप्लाई की अनिश्चितता यदि लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई, रुपये की मजबूती और भारतीय अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है। ऐसे में निवेशकों, उद्योगों और आम उपभोक्ताओं की नजर अब अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और क्रूड ऑयल की अगली चाल पर बनी रहेगी।


