Islamic NATO: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुआ ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ तीनों देशों के सैन्य सहयोग को नई दिशा दे सकता है। इस गठजोड़ में करीब 14 लाख सक्रिय सैनिक, 3,400 से ज्यादा सैन्य विमान और 6,000 से अधिक टैंक शामिल हैं। हालांकि, इसे NATO जैसा पूर्ण सैन्य गठबंधन मानना अभी जल्दबाजी होगी।
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग को लेकर हुआ ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ इन दिनों चर्चा में है। अल जजीरा के एक विश्लेषण के मुताबिक, यह समझौता तीनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने की कोशिश है। यही वजह है कि कुछ विश्लेषकों की ओर से इसे उभरते हुए ‘इस्लामिक NATO’ के तौर पर देखा जा रहा है।
7 अगस्त को हुए इस समझौते के तहत तीनों देश अपनी रक्षा क्षमताओं और सैन्य सहयोग को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और सैन्य प्रमुखों के स्तर पर सहयोग के साथ-साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास की भी योजना है। भविष्य में यह साझेदारी रक्षा उत्पादन, सैन्य तकनीक और हथियार प्रणालियों में सहयोग तक पहुंच सकती है।
सबसे ज्यादा ध्यान इस बात ने खींचा है कि तीनों देशों की सैन्य क्षमताओं को एक साथ देखें तो आंकड़े काफी बड़े नजर आते हैं। उपलब्ध 2026 Global Firepower Index के आंकड़ों के आधार पर इनके पास मिलाकर लगभग 14 लाख सक्रिय सैनिक, 3,415 सैन्य विमान, 6,046 टैंक और 344 नौसैनिक संसाधन हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी सैन्य ताकत वास्तव में एक एकीकृत सैन्य शक्ति में बदल सकती है? और क्या यह गठजोड़ NATO की तरह किसी सदस्य देश पर हमले की स्थिति में सामूहिक सैन्य कार्रवाई कर पाएगा?
तीनों देशों की संयुक्त सैन्य ताकत कितनी बड़ी है?
अल जजीरा द्वारा Global Firepower Index के हवाले से दिए गए आंकड़े तीनों देशों की अलग-अलग सैन्य क्षमताओं को समझने में मदद करते हैं।
सक्रिय सैनिकों की संख्या में पाकिस्तान सबसे आगे है। उसके पास करीब 6.60 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी बताए गए हैं। इसके बाद तुर्की के पास लगभग 4.81 लाख और सऊदी अरब के पास करीब 2.47 लाख सक्रिय सैनिक हैं।
इस तरह तीनों देशों की संयुक्त सक्रिय सैन्य शक्ति करीब 13.88 लाख बैठती है, जिसे मोटे तौर पर 14 लाख कहा जा सकता है।
टैंकों के मामले में भी पाकिस्तान सबसे आगे है। उसके पास लगभग 2,677 टैंक बताए गए हैं। तुर्की के पास करीब 2,284 और सऊदी अरब के पास लगभग 1,085 टैंक हैं। तीनों को मिलाने पर यह संख्या 6,000 से ज्यादा हो जाती है।
हवाई ताकत की बात करें तो पाकिस्तान के पास करीब 1,397 सैन्य विमान हैं। तुर्की के पास लगभग 1,101 और सऊदी अरब के पास करीब 917 विमान हैं। तीनों की संयुक्त संख्या लगभग 3,415 सैन्य विमानों तक पहुंचती है।
नौसैनिक ताकत में तस्वीर कुछ अलग है। यहां तुर्की की स्थिति मजबूत है। उसके पास करीब 192 नेवल एसेट्स बताए गए हैं, जबकि पाकिस्तान के पास 120 और सऊदी अरब के पास 32 हैं। तीनों देशों के पास मिलाकर करीब 33 फ्रिगेट, 24 कार्वेट और 22 पनडुब्बियां हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों को जोड़ने का मतलब यह नहीं है कि ये सभी सैनिक, टैंक, विमान और नौसैनिक संसाधन एक ही कमांड के तहत तुरंत काम करने लगेंगे। किसी वास्तविक संयुक्त सैन्य शक्ति के लिए कमांड सिस्टम, लॉजिस्टिक्स, संचार, साझा प्रशिक्षण और राजनीतिक सहमति भी उतनी ही जरूरी होती है।
सऊदी अरब के पास पैसा, पाकिस्तान के पास बड़ी सेना
तीनों देशों की ताकत सिर्फ सैनिकों और हथियारों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। रक्षा बजट भी किसी देश की सैन्य क्षमता का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
अल जजीरा के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में इन तीनों देशों में सऊदी अरब का अनुमानित रक्षा खर्च सबसे ज्यादा करीब 63.9 अरब डॉलर है। तुर्की का रक्षा खर्च करीब 51.4 अरब डॉलर, जबकि पाकिस्तान का करीब 9.1 अरब डॉलर बताया गया है।
इससे तीनों देशों की भूमिकाओं में अंतर साफ नजर आता है। सऊदी अरब के पास बड़ा रक्षा बजट है और वह अत्याधुनिक हथियारों तथा सैन्य तकनीक पर भारी निवेश कर सकता है। तुर्की ने पिछले वर्षों में अपने घरेलू रक्षा उद्योग, ड्रोन और मिसाइल तकनीक में काफी विस्तार किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान के पास बड़ी पेशेवर सैन्य व्यवस्था, व्यापक सैन्य अनुभव और परमाणु क्षमता है।
यानी इस साझेदारी में तीनों देश अलग-अलग तरह की ताकत लेकर आते हैं।
सिक्योरिटी एनालिस्ट एंड्रियास क्रीग के मुताबिक, सऊदी अरब इस सहयोग में पूंजी, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राजनीतिक रूप से अलग-अलग पक्षों को साथ लाने की क्षमता दे सकता है।
तुर्की की ताकत उसके तेजी से विकसित होते रक्षा उद्योग में है। इसमें ड्रोन, मिसाइल, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, नौसैनिक प्रणालियां और NATO से जुड़ा सैन्य अनुभव शामिल है।
वहीं पाकिस्तान का सबसे बड़ा योगदान उसकी मैनपावर, पेशेवर सैन्य व्यवस्था, ऑपरेशनल अनुभव, रक्षा उत्पादन और परमाणु क्षमता हो सकता है।
सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्की से क्या फायदा होगा?
इस समझौते का सऊदी अरब के लिए रणनीतिक महत्व काफी बड़ा हो सकता है। रियाद लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसने अपनी विदेश और सुरक्षा नीति में विविधता लाने की कोशिश की है।
मध्य पूर्व में ईरान और उसके सहयोगियों से जुड़े संघर्षों तथा मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के बीच सऊदी अरब के लिए अतिरिक्त सुरक्षा साझेदारियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
तुर्की के पास विकसित हो रहा रक्षा उद्योग है। तुर्की के ड्रोन, मिसाइल और दूसरे सैन्य सिस्टम सऊदी अरब के लिए उपयोगी हो सकते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान एक बड़ा सैन्य ढांचा और परमाणु प्रतिरोध क्षमता लेकर आता है।
अमेरिकी रक्षा विभाग में अरब प्रायद्वीप मामलों के पूर्व निदेशक डेविड डेस रोशेस के अनुसार, यह समझौता सऊदी अरब को पश्चिमी देशों से हथियारों के निर्यात को लेकर पैदा होने वाली अनिश्चितताओं के बीच अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने में मदद कर सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बना रहा है। बल्कि वह अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अलग-अलग साझेदारों की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
क्या पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए युद्ध लड़ेगा?
यही इस समझौते से जुड़े सबसे बड़े सवालों में से एक है।
समझौते में सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान बताया गया है। इसका मूल विचार यह है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
सुनने में यह NATO के Article 5 जैसा लगता है, लेकिन दोनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।
NATO की सामूहिक रक्षा व्यवस्था के बावजूद हर सदस्य की प्रतिक्रिया की प्रकृति अलग हो सकती है, लेकिन उसकी संस्थागत संरचना दशकों में विकसित हुई है। पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की समझौते के मामले में अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किसी सदस्य पर हमला होने पर बाकी दोनों देश किस स्तर की सैन्य कार्रवाई करेंगे।
यानी ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ की राजनीतिक घोषणा और वास्तव में संयुक्त सैन्य अभियान चलाने की क्षमता दो अलग चीजें हैं।
पाकिस्तान के लिए यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो सकता है। पाकिस्तान के ईरान के साथ भी संबंध हैं और वह क्षेत्रीय संघर्षों में कई बार कूटनीतिक भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में अगर भविष्य में सऊदी अरब और ईरान के बीच कोई बड़ा सैन्य टकराव होता है, तो इस्लामाबाद के सामने कठिन रणनीतिक विकल्प हो सकते हैं।
इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी संभावित संघर्ष में पाकिस्तान निश्चित तौर पर सऊदी अरब की तरफ से युद्ध में उतरेगा।
तुर्की की भूमिका क्यों अहम है?
इस गठजोड़ में तुर्की की भूमिका केवल सैनिकों की संख्या तक सीमित नहीं है। देश ने पिछले वर्षों में अपने रक्षा उद्योग को काफी विकसित किया है।
तुर्की ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नौसैनिक प्रणालियों के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा चुका है। NATO का सदस्य होने के कारण उसके पास लंबे समय का सैन्य अनुभव और पश्चिमी सैन्य प्रणालियों के साथ काम करने की विशेषज्ञता भी है।
इस वजह से तुर्की इस संभावित सुरक्षा व्यवस्था में तकनीक और रक्षा उद्योग का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
सऊदी अरब के पास वित्तीय संसाधन हैं और पाकिस्तान के पास बड़ी सैन्य ताकत तथा परमाणु प्रतिरोध क्षमता। ऐसे में तुर्की दोनों के बीच तकनीकी और औद्योगिक पुल की भूमिका निभा सकता है।
क्या यह अमेरिका के सुरक्षा ढांचे के लिए चुनौती है?
यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों देश किसी न किसी रूप में अमेरिका से जुड़े हुए हैं।
पाकिस्तान के अमेरिका के साथ लंबे समय से सुरक्षा संबंध रहे हैं। सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों और सैन्य उपकरणों का बड़ा खरीदार है। वहीं तुर्की NATO का सदस्य है और उसके पास गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सेना है।
ऐसे में तीनों देशों का एक अलग सुरक्षा ढांचा बनाना पश्चिमी देशों के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, इसे सीधे अमेरिका विरोधी गठबंधन कहना सही नहीं होगा। तीनों देशों के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने-अपने सुरक्षा, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
असल बदलाव यह हो सकता है कि मध्य पूर्व और उसके आसपास के देश अपनी सुरक्षा के लिए एक से ज्यादा शक्ति केंद्रों पर निर्भर होने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या मिस्र भी इस गठजोड़ में शामिल हो सकता है?
भविष्य में इस सुरक्षा व्यवस्था के विस्तार की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र को इस व्यवस्था का संभावित ‘स्वाभाविक साझेदार’ बताया है। मिस्र के पास बड़ी सेना है और उसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से स्वेज नहर पर मिस्र का नियंत्रण उसे वैश्विक व्यापार और रणनीतिक परिवहन के लिहाज से अहम बनाता है।
अगर भविष्य में मिस्र भी इस तरह के सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है तो इस समूह की सैन्य और रणनीतिक क्षमता काफी बढ़ सकती है। लेकिन काहिरा को ऐसा फैसला लेने से पहले अमेरिका के साथ अपने संबंधों, मौजूदा सुरक्षा साझेदारियों और क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखना होगा।
क्या यह सच में ‘इस्लामिक NATO’ बन सकता है?
फिलहाल इसे NATO कहना शायद जल्दबाजी होगी।
NATO एक दशक नहीं बल्कि कई दशकों में विकसित हुआ संस्थागत सैन्य गठबंधन है। उसके पास संयुक्त कमांड संरचना, नियमित सैन्य अभ्यास, व्यापक खुफिया सहयोग, इंटरऑपरेबिलिटी और लंबे समय से विकसित सैन्य प्रक्रियाएं हैं।
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच नया समझौता अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है।
फिर भी इसकी अहमियत कम नहीं है। अगर तीनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ाते हैं, रक्षा उत्पादन में सहयोग करते हैं, खुफिया सूचनाएं साझा करते हैं और अपनी सेनाओं के बीच बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी विकसित करते हैं, तो आने वाले वर्षों में यह एक प्रभावशाली क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था बन सकती है।
इसकी सबसे बड़ी ताकत तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताओं का मेल है—सऊदी अरब की आर्थिक ताकत, तुर्की की रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की बड़ी सैन्य क्षमता तथा परमाणु प्रतिरोध।
भारत और एशिया के लिए इसका क्या मतलब?
इस नए सैन्य समीकरण का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रह सकता। पाकिस्तान के इस समूह में शामिल होने के कारण दक्षिण एशिया पर भी इसका रणनीतिक प्रभाव पड़ सकता है।
भारत के लिए खासतौर पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग किस दिशा में आगे बढ़ता है और सऊदी अरब इसमें किस स्तर तक शामिल होता है।
हालांकि, अभी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह गठजोड़ किसी एक देश के खिलाफ बनाया गया है। समझौते का घोषित फोकस सामूहिक सुरक्षा और तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना है।
आखिरकार, किसी भी सैन्य गठबंधन की असली ताकत केवल सैनिकों, टैंकों और विमानों की संख्या से तय नहीं होती। असली परीक्षा तब होती है जब संकट के समय राजनीतिक नेतृत्व एकमत हो, सेनाएं साथ काम कर सकें, लॉजिस्टिक्स तैयार हो और सदस्य देश वास्तव में एक-दूसरे की मदद करने के लिए तैयार हों।
यही वजह है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के इस नए रक्षा समझौते को अभी एक उभरती हुई रणनीतिक साझेदारी के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा। अगर आने वाले वर्षों में इसमें संयुक्त कमांड, नियमित सैन्य अभ्यास, साझा रक्षा उत्पादन और स्पष्ट सामूहिक सुरक्षा प्रोटोकॉल जुड़ते हैं, तभी इसे NATO जैसी मजबूत सैन्य व्यवस्था के करीब माना जा सकेगा।


