India Trade Strategy: भारत अपनी ट्रेड स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अब दक्षिण अफ्रीका जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत पूरी तरह से Free Trade Agreement (FTA) करने के बजाय Preferential Trade Agreement (PTA) को प्राथमिकता दे सकता है। सरकार का फोकस ऐसा व्यापार समझौता करने पर है, जिसमें पूरे बाजार को खोलने के बजाय चुनिंदा प्रोडक्ट्स और सेक्टर्स को ही सीमित रियायत दी जाए।
इस रणनीति का मकसद भारतीय बाजार को जरूरत से ज्यादा खोलने से बचाना और उन क्षेत्रों में ही व्यापारिक अवसर बढ़ाना है, जहां दोनों देशों को वास्तविक फायदा मिल सकता है। सरकार का मानना है कि विकासशील देशों के साथ व्यापक FTA करने में घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में PTA को अधिक संतुलित विकल्प माना जा रहा है।
दक्षिण अफ्रीका के साथ FTA की जगह PTA क्यों?
सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका अभी विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में उसके साथ व्यापक FTA करने पर भारत को कई क्षेत्रों में अपने बाजार को ज्यादा खोलना पड़ सकता है। सरकार को आशंका है कि इससे कुछ घरेलू उद्योगों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
इसके बजाय PTA के जरिए दोनों देश उन उत्पादों की पहचान कर सकते हैं, जिनमें एक-दूसरे को बेहतर बाजार पहुंच दी जा सकती है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका जिन उत्पादों में मजबूत स्थिति रखता है, उनमें भारत उसे सीमित टैरिफ रियायत दे सकता है। इसी तरह भारत भी अपने मजबूत या रणनीतिक उत्पादों के लिए दक्षिण अफ्रीकी बाजार में बेहतर पहुंच हासिल कर सकता है।
इस तरह समझौता दोनों देशों के लिए जरूरत के मुताबिक और नियंत्रित तरीके से बाजार खोलने पर आधारित होगा।
FTA और PTA में क्या अंतर है?
Free Trade Agreement यानी FTA में आमतौर पर दोनों देशों के बीच बड़ी संख्या में वस्तुओं और सेवाओं पर व्यापार बाधाओं और टैरिफ को कम या समाप्त करने की व्यवस्था होती है। इसका दायरा काफी व्यापक हो सकता है।
वहीं Preferential Trade Agreement यानी PTA ज्यादा सीमित होता है। इसमें दोनों देश चुनिंदा उत्पादों पर ही टैरिफ कम करने या व्यापार में विशेष रियायत देने पर सहमत होते हैं।
सरल शब्दों में समझें तो FTA में बाजार खोलने का दायरा बड़ा होता है, जबकि PTA में सरकार यह तय कर सकती है कि कौन से उत्पादों पर रियायत देनी है और किन पर घरेलू सुरक्षा बरकरार रखनी है।
मर्कोसुर के साथ भी PTA पर बातचीत
भारत केवल दक्षिण अफ्रीका के साथ ही इस मॉडल पर विचार नहीं कर रहा है। सरकार Mercosur के साथ भी PTA बातचीत को आगे बढ़ा रही है। मर्कोसुर दक्षिण अमेरिका का प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार समूह है, जिसमें ब्राजील समेत कई देश शामिल हैं।
भारत के लिए मर्कोसुर के साथ व्यापार संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दक्षिण अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों के लिए फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, इंजीनियरिंग सामान और अन्य उत्पादों के अवसर मौजूद हैं। PTA के जरिए भारत चुनिंदा क्षेत्रों में बाजार पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, जबकि संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों को व्यापक आयात प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सकता है।
मेक्सिको और केन्या के साथ भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं
सरकार मेक्सिको और केन्या के साथ संभावित PTA को लेकर भी बातचीत की संभावनाएं तलाश रही है। इसका संकेत है कि भारत हर देश के साथ एक जैसा व्यापार समझौता करने के बजाय देश-विशेष और सेक्टर-विशेष रणनीति अपनाना चाहता है।
इसका फायदा यह हो सकता है कि बातचीत के दौरान भारत अपनी जरूरत के मुताबिक प्राथमिकता वाले सेक्टर चुन सकेगा। साथ ही, संवेदनशील उद्योगों के लिए सुरक्षा उपायों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया जा सकता है।
इक्वाडोर के साथ FTA में दिलचस्पी
दूसरी ओर, इक्वाडोर ने भारत से संपर्क करके पूर्ण FTA में रुचि दिखाई है। इसका मतलब यह है कि भारत की रणनीति हर देश के लिए PTA तक सीमित नहीं होगी।
अगर किसी देश के साथ व्यापक व्यापार समझौता भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद दिखाई देता है और घरेलू उद्योगों के हित सुरक्षित रहते हैं, तो सरकार FTA के विकल्प पर भी आगे बढ़ सकती है।
यानी नई रणनीति को FTA के खिलाफ नीति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि भारत अब हर साझेदार देश के साथ अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू जरूरतों के आधार पर समझौते का मॉडल तय करना चाहता है।
चिली के साथ भी बातचीत की तैयारी
चिली को लेकर भी भारत बातचीत आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, कॉमर्स सेक्रेटरी अगस्त के अंत या अगले महीने चिली की यात्रा कर सकते हैं।
इस यात्रा का उद्देश्य यह देखना होगा कि दोनों देशों के बीच किस तरह का व्यापार समझौता आपसी फायदे वाला हो सकता है। अधिकारी ने संकेत दिया कि अगर भारत को अच्छा और संतुलित सौदा मिलता है, तो बातचीत को आगे बढ़ाया जाएगा।
यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसमें किसी भी व्यापार समझौते को केवल बाजार पहुंच बढ़ाने के नजरिए से नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग, निर्यात और घरेलू बाजार के संतुलन को ध्यान में रखकर देखा जा रहा है।
पिछली ट्रेड स्ट्रैटेजी से कितना अलग है मॉडल?
सरकार के वरिष्ठ अधिकारी ने पिछली यूपीए सरकार के दौरान हुए FTA वार्ताओं के तरीके की आलोचना करते हुए कहा कि उस समय स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत कई बार प्रभावी नहीं रही।
अधिकारी ने ASEAN समझौते का उदाहरण देते हुए दावा किया कि समझौते को अंतिम रूप देने से पहले उद्योग जगत के साथ पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। उनके मुताबिक, कारोबारियों से सुबह बातचीत किए जाने की बात कही गई थी, लेकिन उन्हें रात में संदेश मिला कि अगले दिन समझौते की साइनिंग सेरेमनी होने वाली है।
मौजूदा सरकार का कहना है कि अब इस तरह की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की जा रही है। व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने से पहले संबंधित मंत्रालयों, उद्योग संगठनों और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों से बातचीत पर जोर दिया जा रहा है।
‘पूरी सरकार और सभी स्टेकहोल्डर्स’ मॉडल पर जोर
सरकार अपने नए तरीके को ‘पूरी सरकार, सभी स्टेकहोल्डर्स’ मॉडल के रूप में पेश कर रही है। इसका मतलब है कि व्यापार समझौते केवल वाणिज्य मंत्रालय के स्तर पर तय नहीं किए जाएं, बल्कि उन सभी पक्षों को बातचीत में शामिल किया जाए जिन पर समझौते का सीधा असर पड़ सकता है।
इसमें संबंधित मंत्रालयों के अलावा उद्योग संगठन और निजी कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं। इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलती है कि किसी प्रस्तावित व्यापार समझौते से भारतीय उद्योग को कितना फायदा या नुकसान हो सकता है।
जहाज निर्माण और यूरिया मामले का उदाहरण
अधिकारी ने हाल में हुई दो बैठकों का भी उदाहरण दिया। इनमें एक बैठक भारत में जहाज निर्माण और जहाज तोड़ने की क्षमता बढ़ाने से जुड़ी थी, जबकि दूसरी बैठक यूरिया के गलत इस्तेमाल और उसके डायवर्जन को रोकने के मुद्दे पर हुई।
इन बैठकों में संबंधित मंत्रालयों, उद्योग संगठनों और निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक साथ लाया गया। उद्देश्य था कि समस्या को केवल सरकारी स्तर पर देखने के बजाय उद्योग के साथ मिलकर व्यावहारिक समाधान तैयार किया जाए।
सरकार इसी तरह की सोच को ट्रेड पॉलिसी में भी लागू करना चाहती है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत की बदलती ट्रेड स्ट्रैटेजी का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि आने वाले वर्षों में देश हर पार्टनर के साथ एक जैसा FTA मॉडल अपनाने के बजाय लक्षित व्यापार समझौतों पर ज्यादा जोर देगा।
PTA के जरिए भारत को तीन स्तरों पर फायदा मिल सकता है। पहला, उसे चुनिंदा बाजारों में अपने निर्यात के लिए बेहतर पहुंच मिल सकती है। दूसरा, संवेदनशील घरेलू उद्योगों को व्यापक आयात प्रतिस्पर्धा से बचाने की गुंजाइश बनी रहती है। तीसरा, सरकार देश और उत्पाद के हिसाब से व्यापार रियायतों को ज्यादा सावधानी से तय कर सकती है।
हालांकि, PTA की सीमा भी है। क्योंकि इसमें उत्पादों की संख्या और रियायतों का दायरा FTA की तुलना में कम हो सकता है, इसलिए निर्यातकों को उतना व्यापक बाजार लाभ नहीं मिलता जितना एक व्यापक FTA से मिल सकता है।
क्या भारत FTA से पीछे हट रहा है?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि भारत अब FTA नहीं करेगा। इक्वाडोर के साथ पूर्ण FTA में रुचि और चिली के साथ बातचीत की तैयारी बताती है कि सरकार जरूरत के मुताबिक अलग-अलग मॉडल पर विचार कर रही है।
असल बदलाव यह है कि भारत अब केवल इस आधार पर व्यापार समझौता करने के बजाय कि उससे बाजार पहुंच बढ़ेगी, यह देखना चाहता है कि समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था को वास्तविक और संतुलित लाभ कितना मिलेगा।
इस रणनीति में घरेलू उद्योग की सुरक्षा, निर्यात बढ़ाने की क्षमता, आयात प्रतिस्पर्धा और दूसरे देश के बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच जैसे मुद्दों को एक साथ देखा जाएगा।
निष्कर्ष
भारत की ट्रेड स्ट्रैटेजी में दिखाई दे रहा यह बदलाव आने वाले समय में देश की वैश्विक व्यापार नीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका, मर्कोसुर, मेक्सिको और केन्या जैसे देशों के साथ PTA पर विचार करना बताता है कि भारत चुनिंदा सेक्टर्स और उत्पादों के आधार पर बाजार खोलने की रणनीति अपना रहा है।
वहीं, जहां व्यापक समझौता भारत के हित में दिखाई देगा, वहां FTA का विकल्प खुला रहेगा। ऐसे में आने वाले समय में भारत की व्यापार नीति का फोकस केवल ज्यादा समझौते करने पर नहीं, बल्कि बेहतर और संतुलित समझौते करने पर रह सकता है।


