China Anti-Dumping Duty: भारत और चीन के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक और अहम घटनाक्रम सामने आया है। चीन ने भारतीय सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर पर लगने वाली एंटी-डंपिंग ड्यूटी को अगले पांच साल के लिए और बढ़ा दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब दोनों देशों के बीच व्यापार और बाजार पहुंच को लेकर कई मुद्दे चर्चा में हैं।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय (MOFCOM) ने गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को इसकी घोषणा की। नई अवधि 14 अगस्त 2026 से शुरू होगी और पांच साल तक जारी रहेगी। चीन का कहना है कि अगर मौजूदा एंटी-डंपिंग उपायों को खत्म किया जाता है तो भारत से आने वाले ऑप्टिकल फाइबर में डंपिंग फिर से शुरू हो सकती है, जिससे चीन के घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
चीन ने क्यों बढ़ाई एंटी-डंपिंग ड्यूटी?
यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। चीन ने पिछले साल इस मामले में सनसेट रिव्यू यानी एक्सपायरी रिव्यू शुरू किया था। इस समीक्षा का मकसद यह पता लगाना था कि अगर मौजूदा एंटी-डंपिंग ड्यूटी हटा दी जाए तो क्या भारत से आने वाले सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर की डंपिंग दोबारा शुरू हो सकती है और क्या इससे चीनी उद्योग को नुकसान हो सकता है।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक समीक्षा में यह निष्कर्ष निकला कि उपायों को समाप्त करने पर डंपिंग के जारी रहने या दोबारा शुरू होने की संभावना है। साथ ही इससे चीन के घरेलू सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर उद्योग को नुकसान पहुंच सकता है। इसी आधार पर शुल्क को अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखने का फैसला किया गया।
भारतीय कंपनियों पर कितना एंटी-डंपिंग टैक्स?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कंपनियों के लिए एंटी-डंपिंग ड्यूटी की दरों में बदलाव नहीं किया गया है। अलग-अलग भारतीय निर्यातकों पर 7.4% से 30.6% तक की ड्यूटी लागू रहेगी।
प्रमुख कंपनियों के लिए मौजूदा दरें इस प्रकार हैं:
| भारतीय कंपनी | एंटी-डंपिंग ड्यूटी |
|---|---|
| Sterlite Technologies | 7.4% |
| Birla Cable | 11.4% |
| Corning Technology India | 24.5% |
| Aksh Optifibre | 30.6% |
| Finolex Cables | 30.6% |
चीन के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, कुछ अन्य भारतीय कंपनियों पर भी 24.5% की दर लागू है। वहीं जिन कंपनियों पर अलग दर निर्धारित है, उनके लिए संबंधित कंपनी-विशिष्ट शुल्क जारी रहेगा।
पहली बार कब लगी थी ड्यूटी?
चीन ने भारतीय सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर पर पहली बार अगस्त 2014 में एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई थी। उस समय इसे पांच साल के लिए लागू किया गया था और शुल्क की दर 7.4% से 30.6% के बीच निर्धारित की गई थी।
इसके बाद अगस्त 2020 में चीन ने समीक्षा के बाद इन उपायों को अगले पांच साल के लिए बढ़ा दिया। अब 2026 में एक बार फिर समीक्षा के बाद इसे पांच साल के लिए जारी रखने का फैसला हुआ है। यानी भारतीय ऑप्टिकल फाइबर निर्यातकों को चीन के बाजार में इस शुल्क का सामना लंबे समय तक करना पड़ेगा।
2025 में फिर शुरू हुई थी समीक्षा
चीन के घरेलू ऑप्टिकल फाइबर उद्योग की ओर से 5 जून 2025 को एंटी-डंपिंग उपायों की अवधि खत्म होने से पहले समीक्षा के लिए आवेदन किया गया था। इसके बाद चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने 14 अगस्त 2025 से इस मामले में एक्सपायरी रिव्यू शुरू किया।
इस समीक्षा में चीन ने यह जांचा कि मौजूदा ड्यूटी हटाने पर भारतीय सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर की डंपिंग जारी रहने या दोबारा शुरू होने की कितनी संभावना है और इससे चीनी उद्योग को नुकसान हो सकता है या नहीं। एक साल की समीक्षा पूरी होने के बाद अब शुल्क जारी रखने का फैसला किया गया है।
सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर क्या होता है?
सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर दूरसंचार क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद है। इसमें प्रकाश के जरिए बड़ी मात्रा में डेटा को लंबी दूरी तक भेजा जाता है। यही वजह है कि इसका इस्तेमाल टेलीकॉम नेटवर्क, लंबी दूरी के संचार नेटवर्क, मेट्रो नेटवर्क और फाइबर-टू-द-होम (FTTH) जैसी सेवाओं में किया जाता है।
भारत में भी ऑप्टिकल फाइबर का उत्पादन करने वाली कई कंपनियां हैं। देश में 5G नेटवर्क, ब्रॉडबैंड और फाइबर कनेक्टिविटी के विस्तार के साथ इस क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
एंटी-डंपिंग ड्यूटी क्या होती है?
एंटी-डंपिंग ड्यूटी एक अतिरिक्त आयात शुल्क है, जिसे कोई देश तब लगा सकता है जब उसे लगता है कि विदेशी कंपनियां किसी उत्पाद को अपने घरेलू बाजार की कीमत या उत्पादन लागत की तुलना में बहुत कम कीमत पर दूसरे देश में बेच रही हैं।
इसे सामान्य आयात शुल्क से अलग समझना जरूरी है। इसका उद्देश्य घरेलू उद्योग को ऐसी आयातित वस्तुओं से बचाना होता है, जिनकी कीमतों को अनुचित रूप से कम माना जाता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी विदेशी उत्पाद की कम कीमत के कारण घरेलू निर्माता प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगते हैं और उनके कारोबार पर दबाव बढ़ता है, तो सरकार एंटी-डंपिंग जांच कर सकती है। जांच में डंपिंग और घरेलू उद्योग को नुकसान के पर्याप्त सबूत मिलने पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
भारत के निर्यातकों पर क्या असर पड़ेगा?
चीन का यह फैसला भारतीय ऑप्टिकल फाइबर निर्यातकों के लिए चुनौती बढ़ाने वाला है। 7.4% से 30.6% तक की ड्यूटी के कारण भारतीय कंपनियों के उत्पादों की चीन के बाजार में अंतिम कीमत बढ़ सकती है। इससे उन्हें चीनी कंपनियों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा करने में मुश्किल हो सकती है।
हालांकि असर हर कंपनी पर एक जैसा नहीं होगा, क्योंकि शुल्क की दर कंपनी के अनुसार अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, Sterlite Technologies पर 7.4% की दर है, जबकि Aksh Optifibre और Finolex Cables पर 30.6% की दर लागू है।
भारत-चीन व्यापार के लिए क्या है इसका मतलब?
चीन का यह फैसला दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में मौजूद चुनौतियों को भी दिखाता है। भारत और चीन एक-दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार हैं, लेकिन कई उत्पादों में बाजार पहुंच, आयात और घरेलू उद्योग की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सामने आते रहे हैं।
ऑप्टिकल फाइबर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्पाद में एंटी-डंपिंग ड्यूटी का लंबे समय तक जारी रहना भारतीय कंपनियों के लिए चीन में कारोबार बढ़ाने की राह को कठिन बना सकता है। दूसरी ओर, चीन का तर्क है कि इससे उसके घरेलू उद्योग को संभावित नुकसान से सुरक्षा मिलेगी।
चीन का फैसला क्यों अहम है?
भारत में डिजिटल कनेक्टिविटी, 5G, ब्रॉडबैंड और डेटा नेटवर्क का विस्तार तेजी से हो रहा है। ऐसे में ऑप्टिकल फाइबर की मांग का महत्व बढ़ रहा है। भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू मांग के साथ-साथ विदेशी बाजारों में निर्यात के अवसर भी महत्वपूर्ण हैं।
चीन द्वारा शुल्क को पांच साल और बढ़ाने का मतलब है कि भारतीय कंपनियों को वहां के बाजार में पहले से मौजूद व्यापारिक बाधा का सामना लंबे समय तक करना होगा। ऐसे में कंपनियों के लिए दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात बढ़ाना और अपनी लागत व प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
चीन ने भारतीय सिंगल-मोड ऑप्टिकल फाइबर पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी हटाने के बजाय इसे 14 अगस्त 2026 से अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखने का फैसला किया है। शुल्क की मौजूदा दरें 7.4% से 30.6% के बीच बनी रहेंगी।
चीन का कहना है कि ड्यूटी हटाने से भारत से डंपिंग फिर शुरू हो सकती है और उसके घरेलू ऑप्टिकल फाइबर उद्योग को नुकसान पहुंच सकता है। भारतीय कंपनियों के लिए इसका सीधा मतलब है कि चीन के बाजार में लागत और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौती अभी कम होने वाली नहीं है।


