Kalanamak Rice: अपनी खास खुशबू, स्वाद और पोषण संबंधी खूबियों के लिए मशहूर कालानमक चावल अब सिर्फ उत्तर प्रदेश की पहचान नहीं रह गया है। इसकी बढ़ती मांग और बेहतर कीमत ने किसानों के लिए कमाई का एक नया रास्ता खोल दिया है। खास बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में कालानमक धान की खेती का क्षेत्रफल, किसानों की संख्या और उत्पादन—तीनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
कालानमक चावल की कीमत में भी बड़ा उछाल देखने को मिला है। साल 2018 में जहां इसकी बिक्री कीमत करीब ₹40 प्रति किलोग्राम थी, वहीं 2026 में यह बढ़कर ₹150 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। यानी करीब आठ वर्षों में इसके भाव में ढाई गुना से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। बेहतर कीमत का सीधा फायदा इसकी खेती करने वाले किसानों को मिला है।
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर समेत कालानमक चावल उत्पादक इलाकों में किसानों का इस पारंपरिक धान की ओर रुझान बढ़ा है। सरकार की ओर से उत्पादन बढ़ाने, नई किस्में विकसित करने, प्रोसेसिंग सुविधाएं तैयार करने और विदेशों में इसकी पहचान बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
कालानमक चावल की खेती करने वाले किसानों की संख्या में बड़ा इजाफा

कालानमक चावल की बढ़ती कीमत ने किसानों की दिलचस्पी को काफी बढ़ाया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में कालानमक चावल की खेती और किसानों को मिलने वाले लाभ से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में 2018 में करीब 2,915 किसान कालानमक धान की खेती करते थे। लेकिन इसकी मांग और कीमत बढ़ने के साथ खेती करने वाले किसानों की संख्या में भी तेज वृद्धि हुई।
साल 2024 तक यह संख्या बढ़कर करीब 23,000 किसानों तक पहुंच गई। यानी कुछ ही वर्षों में कालानमक की खेती से जुड़ने वाले किसानों की संख्या कई गुना बढ़ गई।
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि पारंपरिक फसल होने के बावजूद अगर किसानों को बेहतर बाजार और उचित कीमत मिले तो किसी खास कृषि उत्पाद को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा सकता है।
2018 से 2026 के बीच ₹40 से ₹150 हुआ भाव
कालानमक चावल की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रीमियम कीमत है। सामान्य चावल की तुलना में इसकी बाजार कीमत अधिक रहती है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, 2018 में कालानमक चावल का बिक्री मूल्य करीब ₹40 प्रति किलो था।
वहीं, 2026 में इसका बिक्री मूल्य करीब ₹150 प्रति किलो तक पहुंच गया है।
इस कीमत वृद्धि का फायदा सिर्फ व्यापारियों या प्रोसेसिंग से जुड़े कारोबार को ही नहीं मिला, बल्कि इसकी खेती करने वाले किसानों की आय और मुनाफे में भी सुधार हुआ है। सरकारी जानकारी के मुताबिक, सामान्य चावल की खेती की तुलना में कालानमक की खेती से किसानों को मिलने वाला लाभ तीन गुना से अधिक बढ़ा है।
हालांकि, वास्तविक किसान आय लागत, उत्पादकता, गुणवत्ता, बिक्री के तरीके और बाजार भाव के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
सिद्धार्थनगर में 5 गुना से ज्यादा बढ़ा उत्पादन
कालानमक चावल की बढ़ती मांग के साथ इसके उत्पादन में भी तेजी आई है। सिद्धार्थनगर को कालानमक चावल के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में गिना जाता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2018 से 2025 के बीच सिद्धार्थनगर में कालानमक चावल का उत्पादन पांच गुना से अधिक बढ़ा है। इसका एक बड़ा कारण खेती के क्षेत्रफल में विस्तार के साथ-साथ नई और अधिक उत्पादक किस्मों को अपनाया जाना भी है।
नई किस्मों की वजह से किसानों को कम अवधि में अधिक उत्पादन हासिल करने में मदद मिल रही है। इससे प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ने के साथ किसानों की संभावित आय में भी सुधार हुआ है।
किसानों को सरकार से मिल रही वित्तीय और तकनीकी मदद
कालानमक चावल को सिर्फ खेत से बाजार तक पहुंचाने के बजाय इसकी पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर भी सरकार का जोर है। इसके लिए केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से किसानों, एफपीओ और सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को विभिन्न स्तरों पर सहायता दी जा रही है।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) और उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला एक उत्पाद (ODOP) मार्जिन मनी योजना के तहत कालानमक चावल से जुड़ी प्रोसेसिंग और मिलिंग यूनिट स्थापित करने के लिए सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
इन योजनाओं के तहत पात्र व्यक्तिगत सूक्ष्म इकाइयों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को क्रेडिट-लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी के रूप में 35 फीसदी तक, अधिकतम ₹10 लाख की सहायता का प्रावधान है।
इस तरह किसानों और स्थानीय उद्यमियों के लिए सिर्फ कच्चा धान बेचने के बजाय उसकी मिलिंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के जरिए ज्यादा मूल्य हासिल करने का अवसर पैदा हो रहा है।
सिद्धार्थनगर में बनाया गया कॉमन फैसिलिटी सेंटर
कालानमक चावल की खेती करने वाले किसानों को बेहतर प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की सुविधा देने के लिए सिद्धार्थनगर में ODOP योजना के तहत कॉमन फैसिलिटी सेंटर स्थापित किया गया है।
इसका उद्देश्य स्थानीय किसानों और उद्यमियों को आधुनिक प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इससे उत्पाद की गुणवत्ता सुधारने और उसे बड़े बाजारों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
सरकार कालानमक चावल के प्रचार-प्रसार के लिए कालानमक महोत्सव जैसे आयोजनों का भी इस्तेमाल कर रही है। ऐसे आयोजनों के जरिए किसानों, खरीदारों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं को इस पारंपरिक चावल से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
कालानमक की 6 नई उन्नत किस्में हुईं विकसित
कालानमक चावल की पारंपरिक पहचान को बनाए रखते हुए इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक स्तर पर भी काम किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली पारंपरिक कालानमक किस्मों के संरक्षण के साथ नई किस्मों के विकास पर काम कर रही है।
अब तक कालानमक की छह नई और उन्नत किस्में जारी और अधिसूचित की गई हैं। इनमें शामिल हैं:
- कालानमक KN3
- बौना कालानमक 101
- बौना कालानमक 102
- कालानमक किरण
- पूसा नरेंद्र कालानमक 1
- पूसा सीआरडी कालानमक 2
इनमें खास तौर पर बौनी और अधिक उपज देने वाली किस्मों पर जोर दिया गया है। इनका उद्देश्य पारंपरिक किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादन हासिल करना और किसानों की उत्पादकता बढ़ाना है।
नई किस्मों से उत्पादकता करीब दोगुनी
नई उन्नत किस्मों का सबसे बड़ा फायदा इनकी बेहतर उत्पादकता है। सरकारी जानकारी के मुताबिक, पारंपरिक कालानमक किस्मों की औसत उपज करीब 2.5 टन प्रति हेक्टेयर रहती है।
वहीं, नई उन्नत किस्मों में औसत उत्पादकता करीब 4.5 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।
यानी उन्नत किस्मों के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में काफी सुधार की संभावना है। ज्यादा उत्पादन और बेहतर बाजार कीमत दोनों मिलकर किसानों की कुल कमाई बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
5 साल में किसानों को बांटे गए 389.6 क्विंटल गुणवत्तापूर्ण बीज
कालानमक की उन्नत किस्मों को किसानों तक पहुंचाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 से 2025-26 के बीच पांच वर्षों में कुल 389.6 क्विंटल गुणवत्तापूर्ण कालानमक बीज का उत्पादन किया गया और किसानों को वितरित किया गया।
इसके अलावा हर साल करीब 15 से 20 क्विंटल ब्रीडर बीज का उत्पादन किया जा रहा है। गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता बढ़ने से किसानों के लिए नई किस्मों को अपनाना आसान हो सकता है।
‘बुद्ध राइस’ के नाम से विदेशों में बनाई जा रही पहचान
कालानमक चावल की कहानी अब सिर्फ घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। सरकार और संबंधित संस्थाएं इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी एक प्रीमियम उत्पाद के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं।
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के माध्यम से कालानमक चावल के निर्यात को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्षेत्रीय किसान उत्पादक संगठनों को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जोड़ने और निर्यात शिपमेंट की सुविधा उपलब्ध कराने पर काम किया जा रहा है।
सिंगापुर और नेपाल जैसे देशों तक कालानमक चावल की निर्यात शिपमेंट पहुंचाई जा रही है।
जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजार पर नजर
कालानमक चावल को विदेशों में ‘Buddha Rice’ यानी ‘बुद्ध राइस’ के नाम से ब्रांडिंग करने की रणनीति भी अपनाई जा रही है।
इसके पीछे खास वजह है कि जापान, थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर और म्यांमार जैसे देशों में बौद्ध संस्कृति से जुड़े उपभोक्ता बाजार मौजूद हैं। ऐसे बाजारों में कालानमक चावल को एक विशेष और प्रीमियम भारतीय चावल के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ती है तो इसका फायदा किसानों से लेकर एफपीओ, मिलिंग यूनिट, पैकेजिंग कारोबार और निर्यातकों तक पूरी कृषि वैल्यू चेन को मिल सकता है।
किसानों के लिए क्यों खास बन रहा है कालानमक चावल?
कालानमक चावल किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि इसमें सामान्य धान की तुलना में कई अतिरिक्त अवसर दिखाई दे रहे हैं। इसकी खास सुगंध और अलग स्वाद के कारण इसे प्रीमियम चावल के तौर पर बाजार में बेचा जा सकता है।
इसके अलावा इसकी GI पहचान, सरकारी ब्रांडिंग, बेहतर किस्मों का विकास, प्रोसेसिंग सुविधाएं और निर्यात की संभावनाएं इसे सामान्य धान से अलग बाजार प्रदान करती हैं।
हालांकि किसानों के लिए वास्तविक लाभ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उन्हें फसल की कितनी कीमत मिलती है, उत्पादन लागत कितनी है और वे सीधे बाजार, एफपीओ या प्रोसेसर को कितना उत्पाद बेच पाते हैं।
कालानमक चावल की कहानी बदल रही है किसानों की तकदीर
एक समय सीमित क्षेत्रों और पारंपरिक खेती तक सिमटा कालानमक चावल अब उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उत्पाद के रूप में उभर रहा है। 2018 में ₹40 प्रति किलो से 2026 में ₹150 प्रति किलो तक पहुंची बिक्री कीमत, किसानों की बढ़ती संख्या और सिद्धार्थनगर में उत्पादन में पांच गुना से अधिक वृद्धि इस बदलाव को दिखाती है।
नई किस्मों से उत्पादकता बढ़ाने, सरकारी योजनाओं से प्रोसेसिंग सुविधाएं विकसित करने और ‘बुद्ध राइस’ के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बनाने की कोशिशें अगर सफल रहती हैं, तो आने वाले वर्षों में कालानमक चावल किसानों के लिए और भी बड़ा कमाई का जरिया बन सकता है।
यानी कालानमक चावल अब सिर्फ एक पारंपरिक धान की किस्म नहीं, बल्कि किसान की आय, स्थानीय रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि निर्यात से जुड़ा एक संभावित प्रीमियम एग्री-प्रोडक्ट बनता जा रहा है।


