नई दिल्ली: दुनिया के चीनी बाजार में आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। कभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा भारत अब अगले 2-3 साल तक वैश्विक निर्यात बाजार से लगभग बाहर रह सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह एल नीनो के कारण गन्ने की फसल पर पड़ने वाला असर और इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के बढ़ते इस्तेमाल को माना जा रहा है। ऐसे में वैश्विक चीनी सप्लाई पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी तेजी आ सकती है।
हाईलाइट्स
- भारत अगले 2-3 साल तक चीनी निर्यात में बड़ी भूमिका नहीं निभा पाएगा।
- एल नीनो और कमजोर मानसून से गन्ने के उत्पादन पर खतरा।
- इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ने से चीनी उत्पादन के लिए कम गन्ना उपलब्ध।
- घरेलू मांग उत्पादन से अधिक रहने की संभावना।
- 2027-28 तक भारत को चीनी आयात करने की नौबत आ सकती है।
भारत के निर्यात में आई बड़ी गिरावट
भारत पिछले कुछ वर्षों तक हर साल औसतन 6.8 मिलियन टन चीनी का निर्यात करता था, लेकिन अब यह आंकड़ा घटकर करीब 8 लाख टन रह गया है। घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने और उत्पादन घटने की आशंका के चलते सरकार पहले ही चीनी निर्यात पर सख्त नियंत्रण लागू कर चुकी है।
एल नीनो ने बढ़ाई चिंता
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार एल नीनो के प्रभाव से भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है। इसका सीधा असर गन्ने की खेती पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण बुवाई प्रभावित हो सकती है और फसल की पैदावार भी घट सकती है। यदि उत्पादन कम हुआ तो घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता और सीमित हो जाएगी।
इथेनॉल मिशन बना दूसरा बड़ा कारण
सरकार पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की नीति पर तेजी से काम कर रही है। इसके चलते गन्ने का बड़ा हिस्सा अब चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध कच्चे माल में कमी आ रही है और बाजार में सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है।
मांग ज्यादा, उत्पादन कम
अनुमानों के मुताबिक देश का चीनी उत्पादन करीब 27.9 मिलियन टन रह सकता है, जबकि घरेलू खपत लगभग 28.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यानी उत्पादन से ज्यादा खपत होने की स्थिति बन सकती है, जिससे स्टॉक लगातार घटने का खतरा रहेगा।
आयात की नौबत भी आ सकती है
यदि उत्पादन और खपत के बीच यही अंतर बना रहा तो 2027-28 तक भारत को चीनी आयात करना पड़ सकता है। ऐसा पिछले एक दशक में पहली बार हो सकता है। फिलहाल सरकार घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए 2026 तक चीनी निर्यात पर रोक बनाए हुए है।
वैश्विक बाजार पर क्या होगा असर?
भारत के निर्यात से पीछे हटने का असर एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व के उन देशों पर पड़ेगा जो भारतीय चीनी पर निर्भर हैं। सप्लाई कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं और कई देशों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं।
आगे की तस्वीर
एल नीनो का मौसमीय जोखिम और इथेनॉल की बढ़ती मांग मिलकर भारत के चीनी उद्योग की दिशा बदल रहे हैं। यदि मौसम सामान्य नहीं रहा और इथेनॉल कार्यक्रम इसी गति से आगे बढ़ा, तो भारत की प्राथमिकता घरेलू जरूरतें पूरी करना होगी। इसका असर केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक चीनी व्यापार और कीमतों पर भी लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।


