भारत सरकार घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को नई गति देने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार ने ऐसे करीब 100 रणनीतिक उत्पादों की पहचान की है, जिनका वर्तमान में लगभग 51 अरब डॉलर (करीब ₹4.91 लाख करोड़) का आयात किया जाता है। इन उत्पादों का उत्पादन भारत में बढ़ाकर न केवल आयात पर निर्भरता कम करने की योजना है, बल्कि देश को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में व्यवधान और चीन पर अत्यधिक निर्भरता जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं।
12 महीनों में 775 अरब डॉलर का आयात
मार्च 2026 तक के 12 महीनों में भारत ने कुल 775 अरब डॉलर का सामान आयात किया। सरकार के आंतरिक आकलन के अनुसार, इनमें से लगभग 398 अरब डॉलर के आयात को भविष्य में घरेलू उत्पादन के जरिए प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
इसी आकलन के आधार पर सरकार ने शुरुआती चरण में लगभग 51 अरब डॉलर के आयात वाले 100 उत्पादों को प्राथमिकता सूची में शामिल किया है, जिन पर तेजी से काम किया जाएगा।
किन सेक्टरों पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस?
सरकार की योजना केवल एक या दो उद्योगों तक सीमित नहीं है। जिन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है, उनमें शामिल हैं—
- फुटवियर और फुटवियर कंपोनेंट
- टेक्सटाइल एवं तकनीकी वस्त्र
- इलेक्ट्रिक वाहन (EV)
- सोलर पैनल और सोलर सेल
- मशीनरी एवं औद्योगिक उपकरण
- इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपोनेंट्स
- रिन्यूएबल एनर्जी उपकरण
इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाकर भारत अपनी औद्योगिक क्षमता मजबूत करना चाहता है।
क्यों जरूरी है यह Manufacturing Push?
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सप्लाई चेन कई बार प्रभावित हुई है। महामारी, रूस-यूक्रेन संघर्ष और अन्य भू-राजनीतिक घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में आर्थिक जोखिम पैदा कर सकती है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन पर बढ़ती आयात निर्भरता है। इसलिए सरकार अब ऐसी रणनीति बना रही है जिससे जरूरी औद्योगिक उत्पादों का निर्माण देश के भीतर ही हो सके।
चीन से आयात लगातार बढ़ा
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर का आयात किया। चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना हुआ है।
इन आयातों में शामिल हैं—
- औद्योगिक मशीनरी
- इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स
- सोलर उपकरण
- केमिकल्स
- मैन्युफैक्चरिंग इनपुट
यही कारण है कि सरकार अब घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने पर जोर दे रही है।
फुटवियर सेक्टर का उदाहरण
सरकार के अध्ययन में पाया गया कि फुटवियर सोल मोल्ड जैसे उत्पादों का भारत में निर्माण होने में लगभग दो सप्ताह लग जाते हैं, जबकि चीन में यही काम 3 से 5 दिनों में पूरा हो जाता है।
पिछले वर्ष भारत ने ऐसे उत्पादों का लगभग 483 मिलियन डॉलर का आयात किया था।
सरकार का मानना है कि यदि उत्पादन प्रक्रिया तेज और लागत प्रतिस्पर्धी बनाई जाए तो इन उत्पादों का निर्माण भारत में आसानी से किया जा सकता है।
सोलर सेक्टर में भी बड़ा अवसर
रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भारत हर साल लगभग 3 अरब डॉलर मूल्य के सोलर फोटोवोल्टिक (PV) सेल आयात करता है।
कम कीमत वाले चीनी उत्पादों के कारण घरेलू कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में कठिनाई होती है। सरकार अब ऐसी नीतियां तैयार कर रही है जिससे भारत में सोलर सेल निर्माण क्षमता बढ़े और आयात पर निर्भरता कम हो।
विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी की तैयारी
सरकार केवल सब्सिडी देने तक सीमित नहीं रहना चाहती। योजना के तहत विदेशी तकनीक और निवेश को भी आकर्षित किया जाएगा।
इसके लिए सरकार—
- उत्पादन प्रोत्साहन (Incentives) दे सकती है।
- संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) को बढ़ावा दे सकती है।
- तकनीकी सहयोग को आसान बना सकती है।
- विदेशी निवेशकों के लिए नीति समर्थन बढ़ा सकती है।
इस दिशा में ताइवान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और इटली की कंपनियों के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है।
Make in India और PLI को मिलेगी नई ताकत
भारत सरकार पहले से ही Make in India और Production Linked Incentive (PLI) जैसी योजनाएं चला रही है।
इन योजनाओं के कारण—
- मोबाइल फोन निर्माण में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ी है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है।
- कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में निवेश बढ़ाया है।
हालांकि, कुल आयात निर्भरता में अभी भी अपेक्षित कमी नहीं आई है। नई रणनीति का उद्देश्य इसी कमी को दूर करना है।
सरकारी कंपनियों की भी होगी भागीदारी
सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) को भी इस अभियान में शामिल करने की तैयारी कर रही है। सरकारी उपक्रम घरेलू निर्माण बढ़ाने, स्थानीय सप्लायर विकसित करने और नई उत्पादन इकाइयों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या होगा फायदा?
यदि यह योजना सफल रहती है तो इसके कई बड़े आर्थिक लाभ हो सकते हैं।
- आयात बिल में कमी आएगी।
- व्यापार घाटा घट सकता है।
- घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी।
- लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
- विदेशी निवेश आकर्षित होगा।
- भारत वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत स्थान बना सकेगा।
- चीन पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी।
आगे क्या?
सरकार फिलहाल उन 100 रणनीतिक उत्पादों पर फोकस कर रही है जिनका आयात सबसे अधिक है और जिन्हें भारत में प्रतिस्पर्धी लागत पर बनाया जा सकता है। आने वाले महीनों में इन उत्पादों के लिए नई प्रोत्साहन योजनाएं, निवेश नीति और उत्पादन रणनीति सामने आ सकती है।
यदि यह पहल सफल होती है तो भारत केवल आयात घटाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में भी बड़ा कदम बढ़ाएगा।


