नई दिल्ली। पिछले कुछ महीनों से रिकॉर्ड ऊंचाई पर कारोबार कर रहे सोने और चांदी के दामों में अचानक आई तेज गिरावट ने निवेशकों और ज्वेलरी खरीदने वालों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सराफा बाजार में बुधवार को सोना 1,850 रुपये प्रति 10 ग्राम तक सस्ता हो गया, जबकि चांदी में 1,500 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट दर्ज की गई। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है, निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सोने-चांदी के दाम क्यों गिर रहे हैं और क्या यह खरीदारी का सही मौका है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गिरावट केवल एक वजह से नहीं बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता, अमेरिका-ईरान संबंधों में बदलते संकेत, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भारत सरकार द्वारा चांदी आयात नियमों में की गई सख्ती जैसे कारण बाजार को प्रभावित कर रहे हैं।
दिल्ली में कितना सस्ता हुआ सोना और चांदी?
अखिल भारतीय सर्राफा संघ के ताजा आंकड़ों के अनुसार 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाला सोना 1,850 रुपये की गिरावट के साथ 1,59,600 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इससे एक दिन पहले इसका भाव 1,61,450 रुपये प्रति 10 ग्राम था।
वहीं चांदी की कीमत 1,500 रुपये घटकर 2,69,500 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई। पिछले कारोबारी सत्र में चांदी 2,71,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी।
प्रमुख धातुओं के ताजा भाव
| धातु | पिछला भाव | वर्तमान भाव | गिरावट |
|---|---|---|---|
| सोना (99.9%) | ₹1,61,450 | ₹1,59,600 | ₹1,850 |
| चांदी | ₹2,71,000 | ₹2,69,500 | ₹1,500 |
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि दोनों कीमती धातुओं में बिकवाली का दबाव बढ़ा है।
अमेरिकी ब्याज दरें क्यों बनीं सबसे बड़ी वजह?
कमोडिटी बाजार के जानकारों के अनुसार फिलहाल सबसे बड़ा दबाव अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति से आ रहा है। जब निवेशकों को लगता है कि अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, तब सोने जैसे गैर-ब्याज देने वाले निवेश साधनों की मांग कमजोर पड़ जाती है।
लेमन मार्केट्स के रिसर्च एनालिस्ट गौरव गर्ग के मुताबिक महंगाई के जोखिम अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। यदि महंगाई ऊंची बनी रहती है तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करने से बच सकता है। ऐसे माहौल में निवेशक सोने और चांदी से पैसा निकालकर अन्य एसेट क्लास में निवेश करने लगते हैं।
यही कारण है कि हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना और चांदी दबाव में दिखाई दिए हैं।
मिडिल ईस्ट तनाव का क्या असर पड़ रहा है?
आमतौर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर सोने की मांग सुरक्षित निवेश के रूप में बढ़ जाती है। लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम और संभावित वार्ता को लेकर लगातार विरोधाभासी खबरें सामने आ रही हैं। निवेशकों को यह स्पष्ट संकेत नहीं मिल पा रहा कि तनाव बढ़ेगा या कम होगा। इस अनिश्चितता ने बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है।
मिराए एसेट शेयरखान के जिंस प्रमुख प्रवीण सिंह का कहना है कि जब तक अमेरिका-ईरान संबंधों को लेकर स्पष्टता नहीं आती, तब तक सोने में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। निवेशक फिलहाल बड़े दांव लगाने से बच रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों ने क्यों बढ़ाई चिंता?
ऑगमोंट की रिसर्च हेड रेनिशा चैनानी के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल लगभग 98 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।
तेल महंगा होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। यदि महंगाई बढ़ती है तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची बनाए रख सकते हैं। यही वजह है कि तेल बाजार में तेजी का असर अप्रत्यक्ष रूप से सोने और चांदी की कीमतों पर भी पड़ रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो वैश्विक महंगाई फिर से चिंता का विषय बन सकती है।
भारत सरकार के चांदी आयात नियमों का क्या प्रभाव है?
हाल ही में केंद्र सरकार ने उच्च शुद्धता वाली चांदी के कुछ उत्पादों के आयात पर नियम सख्त किए हैं। अब कुछ श्रेणियों में आने वाली चांदी के आयात के लिए पूर्व मंजूरी आवश्यक होगी।
सरकार का उद्देश्य बढ़ते आयात को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है। भारत दुनिया के सबसे बड़े चांदी उपभोक्ताओं में शामिल है। ऐसे में आयात नियमों में बदलाव का असर घरेलू बाजार की धारणा पर पड़ना स्वाभाविक है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसका दीर्घकालिक प्रभाव मांग और आपूर्ति की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगा।
अंतरराष्ट्रीय बाजार से क्या संकेत मिल रहे हैं?
वैश्विक बाजार में भी कमजोरी देखने को मिली। हाजिर सोना 0.54 प्रतिशत फिसलकर 4,463 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गया। वहीं चांदी में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
कॉमेक्स सिल्वर फ्यूचर्स में भी कमजोरी देखने को मिली, जिससे संकेत मिलता है कि वैश्विक निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिकी रोजगार आंकड़े और नॉन-फार्म पेरोल डेटा बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
क्या यह खरीदारी का सही मौका है?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। विशेषज्ञों की राय में मौजूदा गिरावट को घबराहट की बजाय अवसर के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन निवेशकों को चरणबद्ध निवेश रणनीति अपनानी चाहिए।
यदि कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए सोना खरीदना चाहता है तो एकमुश्त निवेश के बजाय किस्तों में खरीदारी करना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे कीमतों में और गिरावट आने की स्थिति में औसत लागत कम रखने में मदद मिलती है।
चांदी के मामले में भी कई विशेषज्ञ लंबी अवधि के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और औद्योगिक उपयोग में बढ़ती मांग आने वाले वर्षों में चांदी को समर्थन दे सकती है।
आगे किन बातों पर रहेगी बाजार की नजर?
आने वाले दिनों में निवेशकों की निगाहें मुख्य रूप से पांच प्रमुख कारकों पर रहेंगी:
- अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल आंकड़े
- फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति
- अमेरिका-ईरान संबंधों की दिशा
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
- भारत में चांदी आयात नीति का प्रभाव
इन सभी कारकों के आधार पर सोने और चांदी की अगली चाल तय हो सकती है।
निष्कर्ष
सोने और चांदी की कीमतों में आई ताजा गिरावट के पीछे अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता, पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव, तेल की बढ़ती कीमतें और भारत के आयात नियमों में बदलाव जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। हालांकि अल्पकालिक दबाव बना हुआ है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह गिरावट अवसर भी साबित हो सकती है। बाजार विशेषज्ञ फिलहाल जल्दबाजी से बचने और चरणबद्ध निवेश रणनीति अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
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