Gold Investment: सोने की कीमतों में हालिया तेजी ने निवेशकों का ध्यान एक बार फिर इस पीली धातु की ओर खींचा है। हालांकि, सोने में लगातार तेजी के बाद शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव और प्रॉफिट बुकिंग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद कई जानकारों का मानना है कि सोने की लंबी अवधि की कहानी अभी मजबूत बनी हुई है। बढ़ता सरकारी कर्ज, कमजोर होती करेंसी, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और सोने की सीमित सप्लाई जैसे कई फैक्टर इसके पक्ष में काम कर सकते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए सोने को केवल कीमत बढ़ने पर मुनाफा कमाने वाले एसेट के तौर पर देखना जरूरी नहीं है। इसे पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन और जोखिम से बचाव यानी हेज के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
बढ़ता सरकारी कर्ज सोने के लिए क्यों है पॉजिटिव?
दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सरकारी कर्ज और राजकोषीय घाटा सोने के लॉन्ग टर्म आउटलुक को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं। जब किसी देश का सरकारी कर्ज लगातार बढ़ता है, तो लंबे समय में उसकी बॉन्ड यील्ड, ब्याज लागत और करेंसी पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकारों के सामने बढ़ते खर्च और कर्ज की सर्विसिंग का बोझ बढ़ने पर आर्थिक नीतियों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे माहौल में निवेशक अक्सर ऐसे एसेट की तलाश करते हैं, जिसकी वैल्यू किसी एक सरकार, कंपनी या करेंसी से सीधे जुड़ी न हो।
सोना इसी वजह से निवेशकों के लिए आकर्षक माना जाता है। अगर भविष्य में वैश्विक स्तर पर कर्ज का बोझ और वित्तीय जोखिम बढ़ता है, तो सोने की मांग को सपोर्ट मिल सकता है।
इसके अलावा, अगर किसी अर्थव्यवस्था में मनी सप्लाई तेजी से बढ़ती है या करेंसी की क्रय शक्ति पर दबाव आता है, तो सोने की कीमतों को फायदा मिल सकता है। यही वजह है कि महंगाई और करेंसी से जुड़े जोखिमों के खिलाफ भी सोने को एक संभावित हेज माना जाता है।
केंद्रीय बैंक क्यों खरीद रहे हैं सोना?
सोने की मौजूदा तेजी की कहानी में केंद्रीय बैंकों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो गई है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक पिछले कुछ वर्षों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।
केंद्रीय बैंकों के लिए सोना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी दूसरे देश की देनदारी यानी liability नहीं है। इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के समय सोना रिजर्व पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करने में मदद कर सकता है।
चीन समेत कई देशों की तरफ से सोने की खरीदारी को इसी व्यापक ट्रेंड के तौर पर देखा जा रहा है। अगर केंद्रीय बैंकों की खरीदारी लंबे समय तक जारी रहती है, तो इससे सोने की वैश्विक मांग को आधार मिल सकता है।
यही वजह है कि सोने की कीमतों का आकलन करते समय केवल ज्वेलरी डिमांड या निवेशकों की खरीदारी देखना पर्याप्त नहीं है। केंद्रीय बैंकों की रणनीतिक खरीदारी भी लॉन्ग टर्म सपोर्ट का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुकी है।
सोने की सप्लाई अचानक बढ़ाना आसान नहीं
सोने के पक्ष में काम करने वाला एक और बड़ा फैक्टर इसकी सीमित सप्लाई है। किसी कमोडिटी की कीमत पर मांग और सप्लाई का सीधा असर होता है। अगर मांग तेजी से बढ़ती है लेकिन उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाता, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है।
सोने के मामले में नई खदान शुरू करना आसान या तेज प्रक्रिया नहीं है। किसी नए प्रोजेक्ट को खोज, अनुमति, निवेश, निर्माण और उत्पादन तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं।
इसके कारण सोने की कीमत बढ़ने पर भी माइनिंग कंपनियां रातोंरात उत्पादन नहीं बढ़ा सकतीं। वैश्विक स्तर पर सोने का माइन आउटपुट भी आम तौर पर सीमित गति से बढ़ता है।
यानी अगर भविष्य में निवेश मांग या केंद्रीय बैंकों की खरीदारी में बड़ा इजाफा होता है, तो सप्लाई तुरंत उसके अनुरूप बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। लंबे समय में यह स्थिति सोने की कीमत के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है।
कमजोर रुपया भारतीय निवेशकों के लिए क्यों मायने रखता है?
भारतीय निवेशकों के लिए सोने की कीमत को समझने में सिर्फ अंतरराष्ट्रीय गोल्ड रेट देखना पर्याप्त नहीं है। भारत में सोने की कीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ रुपये और डॉलर की विनिमय दर का भी असर पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत आम तौर पर डॉलर में तय होती है। ऐसे में अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत में आयात किए जाने वाले सोने की लागत बढ़ सकती है। इसका असर घरेलू बाजार में सोने की कीमत पर पड़ सकता है।
यानी अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमत स्थिर भी रहे, लेकिन रुपया कमजोर हो जाए, तो भारतीय बाजार में सोना अपेक्षाकृत महंगा हो सकता है।
इसी वजह से भारतीय निवेशकों के लिए सोना एक तरह से करेंसी रिस्क के खिलाफ भी सुरक्षा प्रदान कर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कमजोर रुपया हमेशा सोने की कीमत को बढ़ाएगा। टैक्स, आयात शुल्क, घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमत जैसे कई दूसरे फैक्टर भी महत्वपूर्ण हैं।
क्या सोना पोर्टफोलियो इंश्योरेंस की तरह काम कर सकता है?
जानकारों के मुताबिक, निवेशकों को सोने में निवेश करते समय केवल यह अनुमान लगाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि अगले कुछ महीनों में कीमत कितनी बढ़ेगी। इसके बजाय सोने को पोर्टफोलियो के एक हिस्से के तौर पर देखना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
इक्विटी, डेट और दूसरे एसेट्स में अलग-अलग तरह के जोखिम होते हैं। आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई, करेंसी में कमजोरी या वैश्विक तनाव के समय अलग-अलग एसेट क्लास का प्रदर्शन अलग हो सकता है।
सोने को पोर्टफोलियो में शामिल करने का उद्देश्य इसी जोखिम को कुछ हद तक संतुलित करना हो सकता है। हालांकि, सोना भी जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं है। इसकी कीमतों में तेज गिरावट और लंबे समय तक उतार-चढ़ाव दोनों देखने को मिल सकते हैं।
इसलिए केवल तेजी देखकर एकमुश्त बड़ी रकम सोने में लगाना हर निवेशक के लिए सही रणनीति नहीं मानी जा सकती। निवेशक को अपनी जोखिम क्षमता, निवेश अवधि और पूरे पोर्टफोलियो को ध्यान में रखकर फैसला करना चाहिए।
सोने की कीमत में कितनी तेजी आई?
घरेलू बाजार में हालिया तेजी का असर सोने की कीमतों पर भी देखने को मिला है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के बताए आंकड़ों के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का भाव इस सप्ताह 2,742 रुपये बढ़कर 1,52,363 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया, जबकि इससे पहले यह 1,49,621 रुपये प्रति 10 ग्राम था।
इसी तरह 22 कैरेट सोने की कीमत बढ़कर 1,39,565 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई, जबकि पहले यह 1,37,053 रुपये थी।
वहीं 18 कैरेट सोने का भाव बढ़कर 1,14,272 रुपये प्रति 10 ग्राम पहुंच गया, जो पहले 1,12,216 रुपये प्रति 10 ग्राम था।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि अलग-अलग कैरेट के सोने में भी हालिया अवधि में अच्छी तेजी देखने को मिली है। हालांकि, स्थानीय बाजार में ज्वेलरी की कीमत इससे अलग हो सकती है क्योंकि मेकिंग चार्ज, GST और अन्य लागत भी अंतिम कीमत को प्रभावित करती हैं।
क्या अभी सोना खरीदना चाहिए?
सोने में निवेश का फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कीमत रिकॉर्ड स्तर के करीब है या तेजी में है। अगर किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा बहुत कम है, तो वह अपनी एसेट एलोकेशन और जोखिम क्षमता के आधार पर धीरे-धीरे एक्सपोजर बढ़ाने पर विचार कर सकता है।
वहीं, जिन निवेशकों के पास पहले से सोने में बड़ा निवेश है, उन्हें सिर्फ तेजी देखकर अपना एक्सपोजर बढ़ाने के बजाय पूरे पोर्टफोलियो का संतुलन देखना चाहिए।
शॉर्ट टर्म में सोने की कीमतों में करेक्शन संभव है। डॉलर, अमेरिकी ब्याज दरें, बॉन्ड यील्ड, केंद्रीय बैंकों की नीतियां, भू-राजनीतिक घटनाएं और निवेशकों की प्रॉफिट बुकिंग सोने की कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।
निष्कर्ष
सोने में लंबी अवधि की तेजी के पीछे केवल एक कारण नहीं है। बढ़ता सरकारी कर्ज, संभावित करेंसी कमजोरी, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और सीमित सप्लाई जैसे कई फैक्टर मिलकर इसके लॉन्ग टर्म आउटलुक को मजबूत बना सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सोने की कीमत लगातार एकतरफा बढ़ती रहेगी। शॉर्ट टर्म में इसमें तेज उतार-चढ़ाव और करेक्शन देखने को मिल सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए बेहतर रणनीति यह हो सकती है कि सोने को पूरे पोर्टफोलियो का विकल्प बनाने के बजाय डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो के एक हिस्से और हेज के रूप में देखा जाए। निवेश का अंतिम फैसला अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिम क्षमता और निवेश लक्ष्य के आधार पर करना चाहिए।


