नई दिल्ली: भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में धान, गेहूं और गन्ने के साथ-साथ मूंगफली भी एक बेहद महत्वपूर्ण तिलहन फसल है। देश में खाद्य तेल की जरूरत पूरी करने के अलावा मूंगफली का बड़ा हिस्सा विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। लेकिन इस साल El Nino (अलनीनो) और कमजोर मानसून की आशंकाओं ने किसानों के साथ-साथ निर्यातकों की भी चिंता बढ़ा दी है। यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो मूंगफली की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर भारत के निर्यात कारोबार पर देखने को मिलेगा।
हालांकि राहत की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय मूंगफली की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। खासकर एशिया के कई देशों में भारतीय पीनट्स की गुणवत्ता और स्वाद की वजह से इसकी अच्छी खपत होती है।
हाईलाइट्स
- अलनीनो और कमजोर मानसून से मूंगफली उत्पादन प्रभावित होने की आशंका।
- वित्त वर्ष 2025 में भारत ने करीब 7.46 लाख मीट्रिक टन मूंगफली का निर्यात किया।
- भारतीय मूंगफली का निर्यात मूल्य लगभग 795 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा।
- इंडोनेशिया सबसे बड़ा खरीदार, जबकि वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया और थाईलैंड भी प्रमुख बाजार।
- उत्पादन घटने पर घरेलू कीमतों और निर्यात दोनों पर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है मूंगफली?
मूंगफली भारत की प्रमुख तिलहन फसलों में शामिल है। इसका उपयोग खाद्य तेल, स्नैक्स, मिठाइयों, नमकीन, पीनट बटर और पशु आहार तक में किया जाता है। यही वजह है कि इसकी घरेलू मांग के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अच्छी हिस्सेदारी है।
भारत की जलवायु और मिट्टी मूंगफली की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है, जिससे यहां उच्च गुणवत्ता वाली मूंगफली का उत्पादन होता है। यही कारण है कि भारतीय मूंगफली को कई देशों में प्राथमिकता दी जाती है।
कितना हुआ मूंगफली का निर्यात?
APEDA के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत ने 7,46,303.19 मीट्रिक टन मूंगफली का निर्यात किया। इस निर्यात का कुल मूल्य लगभग 794.97 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा।
यह आंकड़ा बताता है कि मूंगफली केवल कृषि उत्पाद नहीं बल्कि भारत के कृषि निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। यदि उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका असर विदेशी बाजारों में भारत की हिस्सेदारी पर भी पड़ सकता है।
इन 5 देशों में भारतीय मूंगफली की सबसे ज्यादा मांग
भारतीय मूंगफली की सबसे अधिक मांग एशियाई देशों में देखने को मिलती है। वित्त वर्ष 2025 में सबसे बड़े खरीदार देशों की सूची में शामिल हैं—
- इंडोनेशिया
- वियतनाम
- फिलीपींस
- मलेशिया
- थाईलैंड
इनमें इंडोनेशिया सबसे बड़ा आयातक रहा, जिसने वर्ष 2025 के दौरान लगभग 2.77 लाख टन भारतीय मूंगफली खरीदी। इसके अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी भारतीय मूंगफली की लगातार मजबूत मांग बनी हुई है।
किन राज्यों में होती है सबसे ज्यादा खेती?
भारत के कई राज्यों में मूंगफली की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं—
- गुजरात
- राजस्थान
- मध्य प्रदेश
- तमिलनाडु
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
- महाराष्ट्र
- तेलंगाना
- उत्तर प्रदेश
- पश्चिम बंगाल
इनमें गुजरात देश का सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक राज्य माना जाता है और राष्ट्रीय उत्पादन में इसकी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रहती है।
El Nino क्यों बढ़ा रहा चिंता?
मूंगफली की फसल को शुरुआती चरण में पर्याप्त नमी और समय पर बारिश की जरूरत होती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार यदि El Nino प्रभाव के कारण मानसून कमजोर रहता है, तो कई समस्याएं सामने आ सकती हैं।
- बुवाई का रकबा घट सकता है।
- पौधों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
- फूल और फलियां बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है।
- उत्पादन में गिरावट आने की आशंका बढ़ सकती है।
- किसानों की आय और निर्यात दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार कम वर्षा रहने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है और बाजार में मूंगफली की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल सकती है।
घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है असर
यदि उत्पादन घटता है तो पहले घरेलू मांग को प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसी स्थिति में निर्यात योग्य स्टॉक कम हो सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को वैकल्पिक बाजार तलाशने पड़ सकते हैं, जबकि भारत में मूंगफली और खाद्य तेल की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है।
हालांकि यदि मानसून बाद के महीनों में सामान्य हो जाता है तो नुकसान की भरपाई कुछ हद तक संभव है। इसलिए किसानों और निर्यातकों की नजर अब मानसून की प्रगति और मौसम विभाग के अगले पूर्वानुमानों पर टिकी हुई है।
निष्कर्ष
भारत वैश्विक मूंगफली व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इंडोनेशिया समेत कई देशों में भारतीय मूंगफली की मजबूत मांग बनी हुई है। लेकिन El Nino और कमजोर मानसून की वजह से इस साल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका निर्यात क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकती है। यदि मौसम अनुकूल नहीं रहा तो इसका असर किसानों की आय, घरेलू बाजार और विदेशी व्यापार—तीनों पर देखने को मिल सकता है।


