नई दिल्ली: भारत में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि भरोसे, परंपरा और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। हर शादी-ब्याह, त्योहार और शुभ अवसर पर सोना खरीदने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन यही आदत अब देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती भी बन गई है। अनुमान है कि भारतीय घरों और मंदिरों में हजारों टन सोना तिजोरियों और लॉकरों में बंद पड़ा है, जिसकी कीमत 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है। यदि सरकार इस निष्क्रिय संपत्ति के छोटे से हिस्से को भी आर्थिक गतिविधियों में शामिल कराने में सफल हो जाती है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार घाटे और बैंकिंग सिस्टम पर बेहद बड़ा हो सकता है।
भारत के पास है दुनिया का सबसे बड़ा निजी गोल्ड स्टॉक
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में हर साल भारी मात्रा में सोने का आयात किया जाता है क्योंकि घरेलू उत्पादन बेहद सीमित है।
विभिन्न उद्योग रिपोर्टों और वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुमानों के अनुसार—
- भारतीय घरों और मंदिरों के पास लगभग 25,000 टन सोना मौजूद है।
- कुछ उद्योग अनुमानों में यह आंकड़ा 30,000 टन तक बताया गया है।
- जबकि कुछ अध्ययन इसे 50,000 टन तक मानते हैं।
सोने की कीमतों में पिछले दो वर्षों की तेज बढ़ोतरी के बाद इस संपत्ति का मूल्य भी तेजी से बढ़ा है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के मुताबिक जनवरी 2026 तक भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की कीमत 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकती है। मॉर्गन स्टेनली ने इसका अनुमान 3.8 ट्रिलियन डॉलर और यूबीएस ने लगभग 4.5 ट्रिलियन डॉलर लगाया है।
सरकार क्यों हुई सक्रिय?
भारत हर साल अरबों डॉलर खर्च करके सोने का आयात करता है। इसके बाद खरीदा गया अधिकांश सोना घरों की तिजोरियों में बंद हो जाता है और आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा नहीं बन पाता।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सोने का आयात 24% बढ़कर रिकॉर्ड 71.9 अरब डॉलर पहुंच गया। हालांकि आयात की मात्रा घटकर 721 टन रही, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण कुल आयात बिल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
इससे कई आर्थिक चुनौतियां पैदा होती हैं—
- विदेशी मुद्रा (डॉलर) पर दबाव बढ़ता है।
- रुपये पर दबाव आता है।
- व्यापार घाटा बढ़ता है।
- चालू खाते का संतुलन प्रभावित होता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी हाल ही में कहा कि पेट्रोलियम और सोना मिलकर भारत के व्यापार घाटे के आधे से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं।
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को नए रूप में लाने की तैयारी
सरकार अब गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) को नए स्वरूप में फिर से शुरू करने पर विचार कर रही है।
इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि ज्वेलर्स को भी इस योजना में शामिल किया जाए।
पिछले अनुभव बताते हैं कि लोग बैंकों की तुलना में अपने भरोसेमंद ज्वेलर्स के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं। इसलिए सरकार का मानना है कि ज्वेलर्स की भागीदारी से लोगों का भरोसा बढ़ सकता है और ज्यादा सोना औपचारिक अर्थव्यवस्था में आ सकता है।
पिछली स्कीम क्यों रही असफल?
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी। इसका उद्देश्य था कि लोग अपना निष्क्रिय सोना बैंकों में जमा करें और उस पर ब्याज कमाएं।
लेकिन योजना अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी।
नवंबर 2024 तक—
- केवल लगभग 31 टन सोना जमा हो पाया।
- करीब 5,700 जमाकर्ताओं ने ही इसमें भाग लिया।
इसकी प्रमुख वजहें थीं—
- लोग पुश्तैनी गहने जमा करने से हिचकिचाते थे।
- शुद्धता जांच के लिए गहनों को पिघलाने की प्रक्रिया पसंद नहीं आई।
- ब्याज दर आकर्षक नहीं थी।
- प्रक्रिया जटिल मानी गई।
इसी कारण सरकार ने 2025 में योजना के कुछ हिस्से बंद भी कर दिए थे।
इस बार क्या होगा अलग?
नई योजना के तहत ज्वेलर्स केवल सोना बेचने तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि—
- ग्राहकों से सोना स्वीकार करेंगे।
- जांच और मूल्यांकन करेंगे।
- अधिकृत रिफाइनरों तक सोना पहुंचाएंगे।
- बैंकिंग सिस्टम से जोड़ने में मदद करेंगे।
बदले में उन्हें सेवा शुल्क मिलने की संभावना है।
इससे ज्वेलरी उद्योग को भी आयातित बुलियन पर निर्भरता कम करने, कच्चा माल सस्ते में उपलब्ध कराने और फाइनेंसिंग लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
घरेलू सोने से बनेगा नया आर्थिक चक्र
इंडस्ट्री का सुझाव है कि जमा किए गए सोने को—
- रिफाइन किया जाए।
- इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीदों में बदला जाए।
- गोल्ड मेटल लोन के जरिए ज्वेलर्स तक पहुंचाया जाए।
यदि यह व्यवस्था सफल होती है तो देश के भीतर मौजूद सोना ही घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा पूरा कर सकता है और नए आयात की जरूरत कम हो सकती है।
गोल्ड लोन ने दिखाया नया रास्ता
जहां गोल्ड डिपॉजिट स्कीम ज्यादा सफल नहीं हुई, वहीं गोल्ड लोन तेजी से लोकप्रिय हुआ है।
वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक—
- मुथूट फाइनेंस
- मणप्पुरम फाइनेंस
- IIFL फाइनेंस
के पास कुल मिलाकर 334 टन सोना गिरवी रखा गया था।
यह कई देशों के केंद्रीय बैंकों के गोल्ड रिजर्व से भी अधिक है।
इससे यह संकेत मिलता है कि लोग अपने सोने का आर्थिक उपयोग करने को तैयार हैं, लेकिन वे उसकी मालिकाना हक छोड़ना नहीं चाहते।
संस्कृति सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में सोना केवल निवेश नहीं बल्कि—
- पारिवारिक विरासत,
- सामाजिक प्रतिष्ठा,
- सुरक्षा,
- भावनात्मक संपत्ति
का प्रतीक भी है।
यही वजह है कि लोग जरूरत पड़ने पर गहने गिरवी रख देते हैं, लेकिन स्थायी रूप से जमा करने में अभी भी झिझकते हैं।
अगर सिर्फ 2% सोना भी अर्थव्यवस्था में आया…
उद्योग संगठन एसोचैम का अनुमान है कि यदि हर साल भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का केवल 2% हिस्सा भी वित्तीय परिसंपत्तियों में लगाया जाए तो 2047 तक भारत की GDP में लगभग 7.5 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त योगदान मिल सकता है।
इससे—
- व्यापार घाटा घट सकता है।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- बैंकों को अधिक पूंजी मिलेगी।
- ज्वेलरी उद्योग को घरेलू कच्चा माल मिलेगा।
- अर्थव्यवस्था की मजबूती बढ़ेगी।
अर्थशास्त्रियों की क्या है चिंता?
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब परिवार अपनी बचत का बड़ा हिस्सा सोने जैसे भौतिक एसेट में लगाते हैं, तब वही पैसा बैंकिंग सिस्टम, शेयर बाजार और उद्योगों तक नहीं पहुंच पाता।
इसका असर निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास पर भी पड़ता है। इसलिए सरकार की कोशिश केवल सोने का आयात कम करना नहीं है, बल्कि पहले से मौजूद विशाल गोल्ड स्टॉक को उत्पादक पूंजी में बदलना है।
निष्कर्ष
भारत आज एक अनोखे विरोधाभास के साथ खड़ा है। एक तरफ देश दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में शामिल है, तो दूसरी तरफ भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास दुनिया का सबसे बड़ा निजी गोल्ड स्टॉक मौजूद है। यदि सरकार ज्वेलर्स की भागीदारी और नई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम के जरिए इस “सोए हुए बाहुबली” के छोटे से हिस्से को भी औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल करने में सफल हो जाती है, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत, व्यापार घाटे में कमी, बैंकिंग प्रणाली को नई पूंजी और आर्थिक विकास को नई गति मिल सकती है।


