नई दिल्ली: भारत में खाने के तेल की कीमतों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। एक ओर सरकार तिलहन उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर खाद्य तेलों का आयात बिल नए रिकॉर्ड की ओर बढ़ रहा है। चालू तेल वर्ष 2025-26 (नवंबर 2025 से अक्टूबर 2026) के पहले आठ महीनों में ही भारत का खाद्य तेल आयात बिल 20 प्रतिशत से अधिक बढ़कर ₹1.19 लाख करोड़ पहुंच चुका है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) का अनुमान है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो तेल वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
Highlights
- 8 महीनों में खाद्य तेल आयात बिल 20% बढ़कर ₹1.19 लाख करोड़ पहुंचा।
- तेल वर्ष के अंत तक ₹1.75 लाख करोड़ का रिकॉर्ड आयात बिल होने का अनुमान।
- कमजोर रुपया, वैश्विक आपूर्ति संकट और मानसून की अनिश्चितता से बढ़ा दबाव।
- इंडोनेशिया के बायोडीजल कार्यक्रम से पाम ऑयल की उपलब्धता प्रभावित।
- घरेलू उत्पादन बढ़ाने की चुनौती के बीच आयात पर निर्भरता बरकरार।
तेजी से बढ़ रहा है खाद्य तेल आयात बिल
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातक देशों में शामिल है। देश की जरूरतों का बड़ा हिस्सा पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल के आयात से पूरा किया जाता है। घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले काफी कम होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
चालू तेल वर्ष के नवंबर से जून तक भारत ने 104 लाख टन से अधिक खाद्य तेल का आयात किया है। इस दौरान आयात बिल ₹99,000 करोड़ से बढ़कर ₹1.19 लाख करोड़ हो गया। यानी महज आठ महीनों में करीब ₹20,000 करोड़ की अतिरिक्त लागत जुड़ गई।
साल के अंत तक ₹1.75 लाख करोड़ पहुंच सकता है बिल
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने अपने मासिक पत्र में कहा कि भारत खाद्य तेल क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। उनके अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए चालू तेल वर्ष के अंत तक देश का खाद्य तेल आयात बिल ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
पिछले तेल वर्ष में यह बिल करीब ₹1.61 लाख करोड़ था। यदि अनुमान सही साबित होता है तो यह अब तक का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयात बिल होगा।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं खाने के तेल के दाम?
खाद्य तेल की कीमतों में तेजी के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं।
1. कमजोर होता रुपया
भारतीय रुपये में डॉलर के मुकाबले कमजोरी आने से आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। चूंकि खाद्य तेल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है, इसलिए आयात लागत बढ़ने का असर सीधे बाजार कीमतों पर पड़ता है।
2. मानसून की अनिश्चितता
इस वर्ष सामान्य से कम मानसून की आशंका और कई तिलहन उत्पादक राज्यों में बुवाई में देरी ने घरेलू उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यदि उत्पादन अपेक्षा से कम रहता है तो आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
3. वैश्विक आपूर्ति में कमी
दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल उत्पादक देशों में शामिल इंडोनेशिया अपने बायोडीजल कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है। इसके चलते पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा खाद्य उपयोग की बजाय ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे वैश्विक बाजार में उपलब्धता कम हुई है और कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
4. भू-राजनीतिक तनाव
दुनिया के कई हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण समुद्री माल ढुलाई, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ गई है। इन अतिरिक्त खर्चों का असर भी आयातित खाद्य तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
किन तेलों का सबसे ज्यादा आयात करता है भारत?
भारत मुख्य रूप से इन खाद्य तेलों का आयात करता है:
- पाम ऑयल
- सोयाबीन ऑयल
- सूरजमुखी तेल
इनमें पाम ऑयल की हिस्सेदारी सबसे अधिक रहती है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है।
सरकार के सामने क्या है चुनौती?
केंद्र सरकार दलहन-तिलहन आत्मनिर्भरता मिशन के जरिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। लक्ष्य है कि किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और उचित समर्थन मूल्य देकर तिलहन उत्पादन बढ़ाया जाए ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगा। इसलिए वैश्विक बाजार में कीमतों और आपूर्ति की स्थिति का असर भारतीय बाजार पर बना रहेगा।
आम उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल महंगा बना रहता है और रुपया कमजोर रहता है, तो आने वाले महीनों में सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी और पाम ऑयल सहित कई खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसका सीधा असर घरों के मासिक रसोई बजट पर पड़ेगा, खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर।
निष्कर्ष
भारत का खाद्य तेल आयात बिल लगातार बढ़ना इस बात का संकेत है कि देश अभी भी खाद्य तेलों के मामले में आयात पर काफी निर्भर है। कमजोर रुपया, वैश्विक आपूर्ति में कमी, मानसून की अनिश्चितता और बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत जैसे कारकों ने आयात खर्च को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। यदि घरेलू उत्पादन में तेजी नहीं आती और वैश्विक हालात नहीं सुधरते, तो वर्ष के अंत तक ₹1.75 लाख करोड़ का आयात बिल देश के लिए नई चुनौती बन सकता है।


