India FDI Policy: भारत को चीन से आने वाले विदेशी निवेश यानी FDI को लेकर अपनी मौजूदा नीति पर दोबारा विचार करना चाहिए। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री राजीव कुमार का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना भारत को चीनी पूंजी के लिए ज्यादा व्यावहारिक और निवेश-अनुकूल रवैया अपनाना चाहिए। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन देशों के साथ चीन के संबंध बेहद खराब रहे हैं, उन्हीं देशों से उसे बड़े पैमाने पर निवेश मिला है।
राजीव कुमार ने यह बात ‘द कोर’ के लिए गोविंदराज एथिराज के साथ बातचीत में कही। उन्होंने भारत में Apple के विस्तार और चीनी वेंडर्स को देश में लाने की अनुमति से जुड़ा अपना अनुभव भी साझा किया। उनके मुताबिक, भारत अगर विदेशी कंपनियों को आकर्षित करना चाहता है तो उसे सिर्फ नियम बनाने वाली सरकार के बजाय निवेशकों की मदद करने वाले साझेदार की भूमिका निभानी होगी।
Apple के भारत आने का बताया उदाहरण
राजीव कुमार के मुताबिक, भारत में Apple के विस्तार से जुड़ी बातचीत करीब 2018 में शुरू हुई थी। उस समय जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जापानी कंपनियों को चीन से बाहर अपने कारोबार का विस्तार करने में मदद के लिए करीब 2 अरब डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी।
कुमार ने बताया कि उस दौरान Standard Chartered Bank, जो चीन में Apple का प्रमुख बैंकर था, के माध्यम से उनसे संपर्क हुआ। इसके बाद दिल्ली में Apple की टीम के साथ बैठक हुई और कंपनी ने भारत में अपना कारोबार बढ़ाने के लिए जरूरी सुविधाओं के बारे में चर्चा की।
उनके अनुसार, Apple की प्रमुख मांगों में से एक यह थी कि उसे शुरुआत में अपने चीनी वेंडर्स को भारत लाने की अनुमति दी जाए। इस प्रस्ताव को लेकर कुछ विरोध हुआ, लेकिन अंततः सरकार ने इसे मंजूरी दे दी।
कुमार का कहना है कि इसी तरह Apple ने भारत में अपना सप्लाई नेटवर्क और कारोबार विकसित करना शुरू किया।
विदेशी कंपनियों को खुद टारगेट करे भारत
राजीव कुमार ने कहा कि भारत को बड़े विदेशी निवेशकों के मामले में इसी तरह सक्रिय रणनीति अपनानी चाहिए। सिर्फ निवेश प्रस्ताव आने का इंतजार करने के बजाय सरकार को संभावित कंपनियों की पहचान करके उनसे सीधे संपर्क करना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि PLI यानी Production Linked Incentive से जुड़े प्रत्येक सेक्टर में दो-तीन या चार बड़ी वैश्विक कंपनियों को लक्ष्य बनाया जा सकता है। संबंधित मंत्रालय में किसी अधिकारी को इन कंपनियों से संपर्क और निवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
उनका मानना है कि सरकार को कंपनियों से यह पूछना चाहिए कि भारत में निवेश करने के लिए उन्हें किन सुविधाओं और मंजूरियों की जरूरत है और उन समस्याओं को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।
निवेशकों को सरकारी दफ्तर में महसूस हो ‘स्वागत’
राजीव कुमार के अनुसार, ज्यादा FDI हासिल करने के लिए भारत को अपनी प्रशासनिक सोच में भी बदलाव करना होगा। सरकार की भूमिका केवल रेगुलेशन और प्रतिबंध तय करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब कोई भारतीय या विदेशी कारोबारी किसी सरकारी कार्यालय में अपना काम कराने जाए तो उसे ऐसा महसूस होना चाहिए कि सरकार उसके निवेश का स्वागत कर रही है।
उनके मुताबिक, अधिकारियों को संभावित ‘एंकर इन्वेस्टर्स’ यानी बड़े प्रमुख निवेशकों की पहचान करके खुद उनके पास जाना चाहिए। कंपनियों के सरकार से संपर्क करने की प्रतीक्षा करने के बजाय सरकार को पहल करनी चाहिए।
चीन से FDI पर भी बदलना होगा नजरिया?
राजीव कुमार ने चीन से आने वाले निवेश को लेकर भारत के मौजूदा दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है और इस मामले में किसी तरह की ढिलाई नहीं होनी चाहिए, लेकिन हर चीनी निवेश को केवल सुरक्षा जोखिम के नजरिये से देखना भी उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अवसरों के बीच संतुलन बनाना होगा।
कुमार के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में चीन को लेकर सुरक्षा जोखिम की धारणा इतनी मजबूत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा सामने आते ही आर्थिक पहलू पीछे चला जाता है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि इसका मतलब सुरक्षा से समझौता करना बिल्कुल नहीं है।
चीन के दुश्मन देशों से ही मिला बड़ा निवेश
राजीव कुमार ने चीन के अनुभव का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को इस मामले में उससे सीखने की जरूरत है।
उन्होंने दावा किया कि चीन में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश ऐसे देशों से भी आया, जिनके साथ उसका इतिहास संघर्ष और युद्ध का रहा है। उन्होंने जापान और अमेरिका का उदाहरण दिया।
कुमार के मुताबिक, भारत और चीन के बीच बड़ा सैन्य संघर्ष भी अब छह दशक से ज्यादा पुराना हो चुका है। ऐसे में उनका मानना है कि भारत को अपने आर्थिक दृष्टिकोण में बदलाव पर विचार करना चाहिए।
चीन के पास है बड़ी मात्रा में अतिरिक्त पूंजी
राजीव कुमार ने चीन की अर्थव्यवस्था में मौजूद अतिरिक्त पूंजी को भारत के लिए एक संभावित अवसर बताया। उनके अनुसार, चीन से करीब 250 अरब डॉलर का FDI बाहर जाने की संभावना है और चीन इसके लिए तैयार है।
उन्होंने तर्क दिया कि चीन की घरेलू मांग अकेले उसकी आर्थिक विकास दर को पर्याप्त गति देने में सक्षम नहीं हो सकती। ऐसे में चीन को अपने उत्पादों के लिए नए बाजारों की आवश्यकता है।
भारत दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। इसलिए कुमार के अनुसार, चीन की पूंजी और उत्पादों के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाजार बन सकता है। इससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा मिल सकता है।
Great Wall Motor का मामला भी बताया
राजीव कुमार ने चीनी ऑटोमोबाइल कंपनी Great Wall Motor का उदाहरण भी दिया। कंपनी ने भारत में निवेश करने में रुचि दिखाई थी और फोर्ड के भारत से बाहर निकलने के बाद महाराष्ट्र स्थित उसके प्लांट को खरीदने में भी दिलचस्पी दिखाई थी।
कुमार के अनुसार, जब Great Wall Motor भारत में अपना कारोबार स्थापित करने की कोशिश कर रही थी, तब कंपनी के प्रतिनिधियों ने उनसे कई बार मुलाकात की थी।
हालांकि, उनके मुताबिक कंपनी को अपने कॉर्पोरेट अधिकारियों के लिए वीजा हासिल करने में परेशानी हुई और आखिरकार कंपनी ने भारत में निवेश की अपनी योजना छोड़ दी।
कुमार ने सवाल उठाया कि अगर कोई कंपनी भारत में निवेश करना चाहती है और यहां रोजगार तथा उत्पादन बढ़ाने में योगदान दे सकती है, तो उसे निवेश करने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए।
भारत के लिए क्या है बड़ा सबक?
राजीव कुमार की पूरी दलील का केंद्र यही है कि भारत को विदेशी निवेश के लिए ‘इंतजार करने’ के बजाय ‘निवेशकों तक पहुंचने’ की रणनीति अपनानी चाहिए।
भारत के लिए इसका मतलब केवल चीन से निवेश आकर्षित करना नहीं है। बल्कि अमेरिका, जापान, यूरोप और अन्य बड़े वैश्विक निवेशकों को भी सेक्टर के हिसाब से टारगेट करके भारत में मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन और रोजगार के अवसर बढ़ाने की कोशिश करना है।
खासकर PLI जैसी योजनाओं के तहत सरकार अगर कंपनियों की जरूरतों को समझकर उन्हें तेजी से मंजूरी और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराती है, तो भारत ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी और मजबूत कर सकता है।
हालांकि, चीन से निवेश के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़े जोखिमों का आकलन जरूरी रहेगा। ऐसे में चुनौती यह है कि भारत आर्थिक अवसरों का फायदा उठाए, लेकिन सुरक्षा हितों से समझौता किए बिना।


