LNG संकट के बीच फिर बढ़ा कोयले का महत्व
नई दिल्ली। एक समय था जब कोयले को प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन यानी ‘डर्टी फ्यूल’ कहा जाता था और उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था। लेकिन बदलते वैश्विक हालात और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियों ने एक बार फिर कोयले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं और एलएनजी (Liquefied Natural Gas) की उपलब्धता पर दबाव के बीच भारत के कई उद्योग फिर से कोयले की ओर रुख कर रहे हैं।
हाल के महीनों में एलएनजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आयात संबंधी अनिश्चितताओं ने स्टील, सीमेंट, उर्वरक और रसायन उद्योगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में कोल गैसीफिकेशन यानी कोयला गैसीकरण तकनीक भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है। सरकार भी इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है।
क्या है कोल गैसीफिकेशन तकनीक?
कोल गैसीफिकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे उच्च तापमान और नियंत्रित ऑक्सीजन वातावरण में परिवर्तित करके गैस बनाई जाती है। इस प्रक्रिया से सिंथेसिस गैस (Syngas) तैयार होती है, जिसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य उपयोगी गैसें होती हैं।
इस गैस का उपयोग कई औद्योगिक गतिविधियों में किया जा सकता है। इससे बिजली उत्पादन, स्टील निर्माण, उर्वरक उत्पादन, मेथनॉल निर्माण और रसायन उद्योगों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक कोयला दहन की तुलना में गैसीफिकेशन तकनीक अधिक कुशल और नियंत्रित ऊर्जा उत्पादन का विकल्प प्रदान करती है।
LNG संकट ने बदला उद्योगों का नजरिया
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयातित तेल और प्राकृतिक गैस से पूरा करता है। एलएनजी की आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर उद्योगों की उत्पादन लागत पर पड़ता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद कई उद्योगों ने एलएनजी पर निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। विशेष रूप से वे सेक्टर जहां तुरंत पूर्ण विद्युतीकरण संभव नहीं है, वहां कोयला गैसीफिकेशन को व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है।
ये बड़ी कंपनियां बढ़ा रही हैं कोयले का इस्तेमाल
जिंदल स्टील
स्टील क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जिंदल स्टील ने अपने उत्पादन संयंत्रों में सिंथेसिस गैस के उपयोग को बढ़ाना शुरू किया है। कंपनी का मानना है कि एलएनजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए घरेलू संसाधनों का उपयोग आवश्यक है।
अल्ट्राटेक सीमेंट
देश की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनियों में शामिल अल्ट्राटेक अपने ऊर्जा मिश्रण में घरेलू कोयले की हिस्सेदारी बढ़ा रही है। कंपनी लंबे समय से वैकल्पिक ईंधन और ऊर्जा दक्षता पर काम कर रही है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा
महिंद्रा एंड महिंद्रा अपने औद्योगिक संचालन में जीवाश्म ईंधन आधारित प्रक्रियाओं के विकल्प तलाश रही है। कंपनी ऊर्जा सुरक्षा और लागत नियंत्रण के लिए विभिन्न तकनीकी समाधानों पर काम कर रही है।
सरकार की ₹37,500 करोड़ की बड़ी योजना
भारत सरकार ने कोल गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना शुरू की है। इस योजना का उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं है बल्कि आयात पर निर्भरता कम करना भी है।
सरकार के अनुसार भारत हर वर्ष एलएनजी, अमोनिया, मेथनॉल, उर्वरक और अन्य औद्योगिक कच्चे माल के आयात पर लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है। यदि इन उत्पादों का एक हिस्सा घरेलू कोयले से तैयार किया जाए तो विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत हो सकती है।
योजना के तहत निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे रोजगार सृजन, घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
भारत के पास कितना कोयला भंडार है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देशों में शामिल है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
- लगभग 401 अरब टन कोयले का भंडार
- करीब 47 अरब टन लिग्नाइट का भंडार
- दुनिया के शीर्ष कोयला उत्पादक देशों में भारत की गिनती
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा था कि मौजूदा अनुमान के अनुसार भारत के पास उपलब्ध कोयला भंडार लगभग 200 वर्षों तक देश की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता रखता है।
यही वजह है कि सरकार कोयले को केवल बिजली उत्पादन के साधन के रूप में नहीं बल्कि औद्योगिक कच्चे माल और रणनीतिक ऊर्जा संसाधन के रूप में भी देख रही है।
₹28,000 करोड़ की विदेशी मुद्रा बचत
कोयला गैसीफिकेशन कार्यक्रम से अब तक सरकार को उल्लेखनीय सफलता मिली है। कोयला मंत्रालय के अनुसार आयातित तेल, अमोनिया और मेथनॉल पर निर्भरता कम होने से करीब 28,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत हो चुकी है।
यह आंकड़ा बताता है कि यदि गैसीफिकेशन परियोजनाओं का विस्तार होता है तो आने वाले वर्षों में यह बचत और अधिक बढ़ सकती है। इससे चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।
पहले चरण में जुटा ₹85,000 करोड़ का निवेश
कोयला मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए पहले चरण को उद्योग जगत से अच्छा समर्थन मिला है। मंत्रालय के अनुसार 2023-24 में शुरू हुई योजना के तहत लगभग 85,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया गया है।
इन परियोजनाओं के जरिए हर वर्ष लगभग 23 मिलियन टन कोयले का उपयोग गैसीफिकेशन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में किया जा सकेगा। सरकार अब दूसरे चरण की तैयारी कर रही है और जुलाई में नई बोली प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज जारी होने की संभावना है।
क्या कोयला फिर बनेगा भारत की ऊर्जा रणनीति का आधार?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए कोयला और नवीकरणीय ऊर्जा एक-दूसरे के विकल्प नहीं बल्कि पूरक बन सकते हैं। सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार जारी रहेगा, लेकिन भारी उद्योगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला गैसीफिकेशन जैसी तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रह सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत का लक्ष्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। ऐसे में घरेलू संसाधनों का अधिकतम उपयोग रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निष्कर्ष
एक समय जिस कोयले को प्रदूषण का प्रतीक माना जाता था, वही आज भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता दिख रहा है। एलएनजी संकट, बढ़ती आयात लागत और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच कोल गैसीफिकेशन देश के लिए नया अवसर लेकर आया है। सरकार की 37,500 करोड़ रुपये की योजना, 85,000 करोड़ रुपये का निवेश और 28,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में भारत की औद्योगिक ऊर्जा व्यवस्था में कोयले की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।


