FIDC on Revolving Credit: फाइनेंशियल इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (FIDC) ने NBFCs की ओर से दी जाने वाली रिवॉल्विंग क्रेडिट सुविधा पर रोक लगाने के प्रस्ताव का विरोध किया है। संगठन ने इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को चिट्ठी लिखकर प्रस्ताव पर दोबारा विचार करने की मांग की है। FIDC का कहना है कि इस सुविधा पर पाबंदी लगने से खासकर छोटे कारोबार और MSME सेक्टर के कर्जदारों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
FIDC ने अपनी आपत्ति में कहा है कि NBFCs के ओवरड्राफ्ट जैसे प्रोडक्ट को क्रेडिट कार्ड की रिवॉल्विंग क्रेडिट सुविधा के समान नहीं माना जाना चाहिए। संगठन के मुताबिक, अगर Re-Draw की सुविधा खत्म होती है तो ग्राहकों को अपनी जरूरत से ज्यादा रकम पहले ही उधार लेनी पड़ सकती है। इससे उनके ऊपर कर्ज का बोझ और ब्याज लागत दोनों बढ़ सकते हैं।
क्या है रिवॉल्विंग क्रेडिट?
रिवॉल्विंग क्रेडिट एक तरह की क्रेडिट लाइन होती है, जिसमें बैंक या वित्तीय संस्था ग्राहक के लिए एक निश्चित लिमिट तय करती है। ग्राहक अपनी जरूरत के मुताबिक इस लिमिट में से पूरी या आंशिक रकम इस्तेमाल कर सकता है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ग्राहक जितनी राशि इस्तेमाल करता है, आमतौर पर ब्याज भी उसी इस्तेमाल की गई रकम पर लगाया जाता है। जब ग्राहक इस्तेमाल की गई रकम का भुगतान कर देता है तो उपलब्ध क्रेडिट लिमिट फिर बढ़ जाती है और वह रकम दोबारा इस्तेमाल की जा सकती है।
यही वजह है कि इसे रिवॉल्विंग क्रेडिट कहा जाता है। इसमें हर बार रकम की जरूरत पड़ने पर नया लोन लेने के लिए अलग से आवेदन करने की जरूरत नहीं होती।
क्रेडिट कार्ड रिवॉल्विंग क्रेडिट का सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है। हालांकि, कारोबार और अन्य जरूरतों के लिए भी बैंक और NBFCs अलग-अलग तरह की क्रेडिट लाइन उपलब्ध करा सकते हैं।
रिवॉल्विंग क्रेडिट की क्या हैं खासियतें?
रिवॉल्विंग क्रेडिट को सामान्य टर्म लोन से अलग बनाने वाली कई विशेषताएं हैं।
- तय क्रेडिट लिमिट: बैंक या लेंडर पहले से एक अधिकतम सीमा तय करता है।
- जरूरत के हिसाब से पैसा: ग्राहक पूरी लिमिट या उसका कुछ हिस्सा ही इस्तेमाल कर सकता है।
- इस्तेमाल की रकम पर ब्याज: आमतौर पर ब्याज इस्तेमाल की गई राशि के आधार पर लगता है।
- दोबारा इस्तेमाल की सुविधा: चुकाई गई रकम को फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है।
- बार-बार नया आवेदन नहीं: उपलब्ध लिमिट के भीतर दोबारा पैसा लेने के लिए हर बार नया लोन आवेदन नहीं करना पड़ता।
- फ्लोटिंग ब्याज दर: कई मामलों में ब्याज दर बदलती रहने वाली यानी फ्लोटिंग हो सकती है।
हालांकि, समय पर भुगतान नहीं करने पर ग्राहक को अतिरिक्त ब्याज, शुल्क या अन्य चार्ज का सामना करना पड़ सकता है।
₹5 लाख की क्रेडिट लिमिट से समझिए
मान लीजिए किसी कारोबारी को ₹5 लाख की रिवॉल्विंग क्रेडिट लिमिट मिली है। उसने इसमें से ₹2 लाख का इस्तेमाल किया।
ऐसी स्थिति में सामान्य तौर पर ब्याज इस्तेमाल की गई ₹2 लाख की रकम पर लगेगा, न कि पूरी ₹5 लाख की लिमिट पर। अब अगर कारोबारी ₹1 लाख वापस चुका देता है तो उसके लिए दोबारा उपलब्ध क्रेडिट करीब ₹4 लाख हो सकती है।
यानी भुगतान के बाद उपलब्ध लिमिट फिर बढ़ जाती है और ग्राहक जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल कर सकता है।
RBI के प्रस्ताव से क्या बदल सकता है?
RBI की ओर से प्रस्तावित बदलावों को लेकर NBFC सेक्टर में चिंता है। प्रस्ताव पर 28 अगस्त 2026 तक सुझाव मांगे गए थे। इसमें NBFCs की ओर से दी जाने वाली कुछ रिवॉल्विंग क्रेडिट सुविधाओं के इस्तेमाल और Re-Draw पर रोक लगाने का प्रस्ताव चर्चा में है।
अगर प्रस्तावित नियम लागू होते हैं तो कुछ कर्जदारों को मौजूदा रिवॉल्विंग व्यवस्था की जगह तय रीपेमेंट शेड्यूल वाले टर्म लोन की ओर जाना पड़ सकता है।
इसका मतलब यह होगा कि ग्राहक जरूरत पड़ने पर उपलब्ध क्रेडिट लिमिट से रकम निकालने और भुगतान के बाद उसी लिमिट को फिर से इस्तेमाल करने की सुविधा से वंचित हो सकते हैं।
FIDC ने क्यों जताई आपत्ति?
FIDC का कहना है कि NBFCs के ओवरड्राफ्ट और अन्य रिवॉल्विंग क्रेडिट प्रोडक्ट को क्रेडिट कार्ड की रिवॉल्विंग फैसिलिटी के समान मानना उचित नहीं है।
संगठन के मुताबिक, Re-Draw की सुविधा पर रोक लगने से ग्राहक अपनी भविष्य की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पहले ही ज्यादा रकम उधार लेने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे कर्ज की कुल लागत बढ़ सकती है।
FIDC ने RBI के सामने कुछ प्रमुख चिंताएं रखी हैं:
- जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने की मजबूरी: Re-Draw उपलब्ध नहीं होने पर ग्राहक भविष्य की जरूरत के लिए पहले ही ज्यादा पैसा ले सकता है।
- ब्याज का बोझ बढ़ सकता है: ज्यादा रकम पहले लेने पर इस्तेमाल से पहले भी कर्ज का बोझ बढ़ सकता है।
- MSME पर असर: छोटे कारोबारों को अचानक पैदा होने वाली नकदी की जरूरत पूरी करने में परेशानी हो सकती है।
- लोन लेने की लागत बढ़ सकती है: हर जरूरत के लिए अलग टर्म लोन लेने पर प्रोसेसिंग और अन्य लागत बढ़ सकती है।
- साहूकारों पर निर्भरता का खतरा: FIDC का मानना है कि अगर NBFCs के ऐसे प्रोडक्ट बंद होते हैं तो कुछ MSME अनौपचारिक कर्जदाताओं या साहूकारों की ओर जा सकते हैं।
MSME के लिए क्यों अहम है रिवॉल्विंग क्रेडिट?
छोटे कारोबार में कैश फ्लो हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कई बार कारोबारियों को कुछ दिनों या कुछ हफ्तों के लिए अचानक अतिरिक्त रकम की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में पूरी क्रेडिट लिमिट एक साथ इस्तेमाल करने के बजाय जरूरत के मुताबिक रकम निकालना उनके लिए सुविधाजनक होता है।
यही कारण है कि FIDC का मानना है कि रिवॉल्विंग क्रेडिट को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय इसके इस्तेमाल और जोखिम को ध्यान में रखते हुए नियम बनाए जाने चाहिए।
टर्म लोन और रिवॉल्विंग क्रेडिट में अंतर
टर्म लोन में ग्राहक को एक निश्चित रकम दी जाती है और उसे तय अवधि में निर्धारित शेड्यूल के अनुसार चुकाना होता है। दूसरी तरफ, रिवॉल्विंग क्रेडिट में एक लिमिट उपलब्ध रहती है और ग्राहक जरूरत के मुताबिक रकम का इस्तेमाल कर सकता है।
इसलिए दोनों उत्पादों का इस्तेमाल अलग-अलग जरूरतों के लिए किया जाता है। टर्म लोन आमतौर पर किसी बड़े और निश्चित खर्च के लिए उपयोगी हो सकता है, जबकि रिवॉल्विंग क्रेडिट कारोबार की बदलती वर्किंग कैपिटल जरूरतों में अधिक लचीलापन देता है।
अब RBI के फैसले पर नजर
FIDC ने RBI से रिवॉल्विंग क्रेडिट पर रोक के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। संगठन की दलील है कि NBFCs के ओवरड्राफ्ट और अन्य क्रेडिट प्रोडक्ट को क्रेडिट कार्ड की रिवॉल्विंग सुविधा से अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।
अब RBI की ओर से मिले सुझावों और प्रस्ताव पर आगे क्या फैसला लिया जाता है, इस पर NBFCs, MSMEs और कर्ज लेने वाले ग्राहकों की नजर रहेगी। अंतिम नियम लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रिवॉल्विंग क्रेडिट और Re-Draw सुविधा को लेकर ग्राहकों और NBFCs के लिए व्यवस्था किस तरह बदलेगी।


