Supreme Court on EPFO ITR Data: क्या किसी प्राइवेट कंपनी के पास आपका PAN और UAN होने भर से आपकी नौकरी, EPFO या इनकम टैक्स से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पहुंच सकती है? इस सवाल ने अब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा है। कोर्ट ने EPFO और ITR से जुड़े व्यक्तिगत डेटा तक कथित निजी पहुंच को चिंताजनक बताया है और केंद्र सरकार से इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर विचार करने को कहा है।
मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया कि एक कमर्शियल टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में EPFO/UAN रिकॉर्ड और PAN से जुड़े वित्तीय डेटा को निजी वेरिफिकेशन कंपनियों द्वारा एक्सेस, रिट्रीव और प्रोसेस किए जाने की आशंका है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने किसी खास प्राइवेट कंपनी द्वारा गैरकानूनी तरीके से डेटा एक्सेस करने की पुष्टि नहीं की है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने 24 अगस्त 2026 को मामले पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि सरकारी एजेंसियों के पास कानून के तहत जमा की गई व्यक्तिगत जानकारी का निजी संस्थाओं द्वारा संभावित इस्तेमाल चिंता का विषय है। अदालत ने केंद्र को इस समस्या से निपटने के लिए डोमेन एक्सपर्ट्स की मदद से प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने पर विचार करने को कहा।
LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने केंद्र और संबंधित अधिकारियों से याचिकाकर्ता की विस्तृत शिकायतों पर विचार कर जरूरी कदम उठाने को कहा और व्यापक निर्णय के लिए करीब चार महीने की अवधि को प्राथमिकता देने की बात कही।
आखिर विवाद किस बात को लेकर है?
याचिका में दावा किया गया कि कुछ निजी वेरिफिकेशन सर्विसेज ऐसी सेवाओं का विज्ञापन कर रही हैं, जिनके नाम में ‘EPFO Passbook API’, ‘Form 26AS API’ और ‘Income Tax Return API’ जैसे शब्द शामिल हैं।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि यदि सरकारी सिस्टम में मौजूद इतनी संवेदनशील जानकारी किसी निजी वेरिफिकेशन प्रक्रिया में उपलब्ध हो रही है, तो उसे हासिल करने का तरीका क्या है? क्या इसके लिए संबंधित व्यक्ति की स्पष्ट अनुमति ली जाती है? और क्या डेटा का इस्तेमाल केवल तय उद्देश्य के लिए किया जा रहा है?
क्या सिर्फ PAN और UAN से आपका पूरा रिकॉर्ड मिल सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
अदालत ने यह नहीं कहा है कि किसी प्राइवेट कंपनी को सिर्फ PAN या UAN पता होने से किसी व्यक्ति के ITR, EPFO रिकॉर्ड या पूरी नौकरी की हिस्ट्री तक स्वतः और unrestricted access मिल जाता है। न ही कोर्ट ने किसी कंपनी को ऐसा डेटा इस्तेमाल करने की सामान्य अनुमति दी है।
असल चिंता यह है कि निजी वेरिफिकेशन सिस्टम में सरकारी रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी किस तकनीकी या अन्य माध्यम से पहुंच रही है और उसके लिए पर्याप्त कानूनी आधार, सहमति और सुरक्षा उपाय मौजूद हैं या नहीं।
ITR और EPFO डेटा इतना संवेदनशील क्यों है?
ITR में व्यक्ति की आय और टैक्स से जुड़ी महत्वपूर्ण वित्तीय जानकारी होती है। इसके अलावा Form 26AS और AIS में TDS/TCS, कुछ वित्तीय लेनदेन और अन्य टैक्स संबंधी जानकारी शामिल हो सकती है। आयकर विभाग के अनुसार AIS में SFT जानकारी, टैक्स भुगतान, डिमांड/रिफंड और अन्य संबंधित सूचनाएं भी उपलब्ध हो सकती हैं।
वहीं EPFO/UAN रिकॉर्ड किसी कर्मचारी के प्रोविडेंट फंड खाते और रोजगार से जुड़ी जानकारी से संबंधित होते हैं। UAN अलग-अलग नौकरियों से जुड़े PF खातों को लिंक करने में मदद करता है, इसलिए इससे किसी व्यक्ति की रोजगार संबंधी जानकारी का पता चल सकता है।
यही वजह है कि इन रिकॉर्ड तक अनधिकृत या जरूरत से ज्यादा पहुंच व्यक्ति की प्राइवेसी के लिए गंभीर चिंता पैदा कर सकती है।
प्राइवेट कंपनियां इस तरह का डेटा क्यों वेरिफाई करना चाहती हैं?
कई कंपनियां भर्ती के दौरान background verification करती हैं। इसका उद्देश्य उम्मीदवार द्वारा दी गई नौकरी, अनुभव और अन्य जानकारी की पुष्टि करना हो सकता है।
लेकिन इस मामले में सवाल सामान्य वेरिफिकेशन पर नहीं है। सवाल यह है कि किसी उम्मीदवार की जानकारी सत्यापित करने के लिए निजी कंपनी को सरकारी सिस्टम में जमा की गई कितनी जानकारी तक पहुंच मिलनी चाहिए।
मिसाल के तौर पर, किसी व्यक्ति ने पहले किसी कंपनी में काम किया था या नहीं, यह जानना एक बात है। वहीं उसकी टैक्स या PF से जुड़ी विस्तृत जानकारी तक पहुंच दूसरी और कहीं अधिक संवेदनशील बात हो सकती है।
याचिकाकर्ता ने क्या दावा किया?
याचिका में आरोप लगाया गया कि निजी वेरिफिकेशन प्रक्रिया में PAN और UAN जैसी पहचान संबंधी जानकारी देने पर रोजगार से जुड़ी जानकारी प्राप्त होने का दावा सामने आया। याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी प्रक्रिया में OTP, स्पष्ट सहमति या दिखाई देने वाली authorization-based identity verification जैसी व्यवस्था मौजूद थी या नहीं।
हालांकि, ये याचिकाकर्ता द्वारा अदालत के सामने लगाए गए आरोप हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया है। यही इस मामले को समझने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के रुख का आम लोगों पर क्या मतलब है?
इस मामले से फिलहाल तीन बड़े सवाल सामने आते हैं—
- सरकारी डेटाबेस में मौजूद व्यक्तिगत जानकारी तक निजी कंपनियों की पहुंच कितनी हो सकती है?
- डेटा एक्सेस करने से पहले व्यक्ति की स्पष्ट सहमति और पहचान सत्यापन कैसे होना चाहिए?
- अगर किसी निजी संस्था को सीमित जानकारी मिलती है, तो उसका इस्तेमाल और व्यावसायिक प्रोसेसिंग किस सीमा तक हो सकती है?
इन सवालों का जवाब सरकार और संबंधित एजेंसियों की आगे की जांच और कार्रवाई से स्पष्ट हो सकता है।
क्या आपका ITR या EPFO रिकॉर्ड अभी से असुरक्षित मान लिया जाए?
नहीं। इस मामले को यह कहकर समझना गलत होगा कि अब सभी प्राइवेट कंपनियां किसी भी व्यक्ति का ITR या EPFO रिकॉर्ड आसानी से देख सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने किसी खास कंपनी के खिलाफ यह निष्कर्ष नहीं दिया कि उसने अवैध रूप से सरकारी डेटाबेस से डेटा चुराया या हासिल किया है। कोर्ट की चिंता संभावित डेटा एक्सेस और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर है और उसने सरकार से इस मामले की जांच तथा जरूरी सुरक्षा उपायों पर विचार करने को कहा है।
आगे क्या होगा?
अब केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को यह देखना होगा कि निजी वेरिफिकेशन सिस्टम में EPFO/UAN और PAN से जुड़ी जानकारी किस तरह इस्तेमाल हो रही है। साथ ही यह भी जांचना होगा कि मौजूदा तकनीकी और कानूनी सुरक्षा पर्याप्त हैं या उनमें बदलाव की जरूरत है।
अगर जांच में किसी सिस्टम की कमजोरी, अनधिकृत एक्सेस या अपर्याप्त consent mechanism सामने आता है, तो सरकार अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू कर सकती है।
फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को ‘प्राइवेट कंपनियां आपका ITR देख सकती हैं’ के रूप में न समझें। अदालत ने ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया है। मामला इस बात की जांच और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा है कि नागरिकों द्वारा सरकार को दिए गए संवेदनशील रोजगार और वित्तीय डेटा का निजी व्यावसायिक इस्तेमाल कहीं बिना पर्याप्त कानूनी आधार और सुरक्षा के तो नहीं हो रहा।


