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सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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Reading: म्यूचुअल फंड में Direct या Regular Plan? जानिए किसमें निवेश करना आपके लिए ज्यादा फायदेमंद है
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म्यूचुअल फंड में Direct या Regular Plan? जानिए किसमें निवेश करना आपके लिए ज्यादा फायदेमंद है

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/25 at 9:01 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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11 Min Read
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Direct vs Regular Mutual Fund: म्यूचुअल फंड की लगभग हर स्कीम में निवेशकों को Direct और Regular Plan का विकल्प मिलता है। दोनों प्लान एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम में निवेश करते हैं, लेकिन इनके खर्च, निवेश प्रक्रिया और लंबी अवधि के रिटर्न में अंतर होता है। Direct Plan में निवेशक सीधे म्यूचुअल फंड कंपनी से निवेश करता है, जबकि Regular Plan में वह म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट के जरिए निवेश करता है। यही अंतर लंबे समय में आपके निवेश की वैल्यू पर असर डाल सकता है।

Contents
Direct Plan में बढ़ रही निवेशकों की दिलचस्पीDirect और Regular Plan में क्या अंतर है?Direct Plan का Expense Ratio कम क्यों होता है?Expense Ratio का रिटर्न पर क्या असर पड़ता है?मार्च 2026 में Direct Plan का AUM कितना था?किस निवेशक के लिए Direct Plan बेहतर हो सकता है?Regular Plan किसके लिए उपयोगी हो सकता है?Direct या Regular Plan चुनने से पहले इन बातों का रखें ध्याननिष्कर्ष

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल होता है कि Direct Plan चुनना बेहतर है या Regular Plan? पहली नजर में दोनों विकल्प लगभग एक जैसे लग सकते हैं, क्योंकि दोनों एक ही स्कीम के तहत निवेश करते हैं। लेकिन इनके बीच सबसे बड़ा अंतर लागत यानी Expense Ratio का होता है।

Direct Plan में डिस्ट्रीब्यूटर शामिल नहीं होता, इसलिए इसमें डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन का खर्च नहीं जुड़ता। दूसरी ओर, Regular Plan में निवेशक को डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए मिलने वाली सेवाओं के बदले अप्रत्यक्ष रूप से लागत चुकानी पड़ती है। इसी वजह से Direct Plan का Expense Ratio आमतौर पर Regular Plan की तुलना में कम होता है।

Direct Plan में बढ़ रही निवेशकों की दिलचस्पी

म्यूचुअल फंड निवेशकों के बीच Direct Plan की लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। क्रिसिल इंटेलिजेंस ने एंफी (AMFI) के डेटा का विश्लेषण किया है, जिससे रिटेल निवेशकों के बीच Direct Plan की बढ़ती हिस्सेदारी का पता चलता है।

आंकड़ों के मुताबिक, रिटेल निवेशकों के म्यूचुअल फंड एसेट्स में Direct Plan की हिस्सेदारी मार्च 2021 में 21.4 फीसदी थी। मार्च 2026 तक यह बढ़कर 36.7 फीसदी हो गई। यानी पांच साल की अवधि में Direct Plan की हिस्सेदारी में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है।

आसान भाषा में समझें तो मार्च 2021 में रिटेल म्यूचुअल फंड निवेश का करीब पांचवां हिस्सा Direct Plan के जरिए था। मार्च 2026 तक यह बढ़कर लगभग हर तीन में से एक निवेश तक पहुंच गया। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक अब म्यूचुअल फंड की लागत और अपने निवेश पर पड़ने वाले खर्च को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक हो रहे हैं।

Direct और Regular Plan में क्या अंतर है?

म्यूचुअल फंड की किसी स्कीम का Direct और Regular Plan मूल रूप से एक ही फंड स्कीम और एक ही पोर्टफोलियो में निवेश कर सकता है। दोनों में निवेश का उद्देश्य भी समान होता है। मुख्य अंतर यह है कि निवेशक फंड हाउस तक कैसे पहुंचता है।

Direct Plan: इसमें निवेशक बिना किसी म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट के सीधे म्यूचुअल फंड कंपनी के माध्यम से निवेश करता है।

Regular Plan: इसमें निवेशक म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर, एजेंट या अन्य मध्यस्थ के जरिए निवेश करता है। डिस्ट्रीब्यूटर निवेशक को स्कीम चुनने, निवेश प्रक्रिया और अन्य संबंधित सेवाओं में मदद कर सकता है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि Direct और Regular Plan पूरी तरह अलग फंड हैं। आमतौर पर दोनों एक ही स्कीम के अलग-अलग प्लान होते हैं, लेकिन उनकी लागत अलग होती है।

Direct Plan का Expense Ratio कम क्यों होता है?

दोनों प्लान के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर Expense Ratio का है। Expense Ratio वह खर्च है जिसे म्यूचुअल फंड स्कीम को चलाने और मैनेज करने के लिए फंड के एसेट्स से लिया जाता है।

Direct Plan में डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता। इसलिए डिस्ट्रीब्यूटर को दिए जाने वाले कमीशन से जुड़ी लागत इसमें नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप Direct Plan का Expense Ratio आमतौर पर Regular Plan से कम रहता है।

Regular Plan में डिस्ट्रीब्यूटर की भूमिका होती है। निवेशक को स्कीम की जानकारी देने और निवेश प्रक्रिया में मदद करने के बदले डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़ी लागत फंड के खर्च में शामिल होती है। इसी वजह से Regular Plan का Expense Ratio अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है।

Expense Ratio का रिटर्न पर क्या असर पड़ता है?

यह अंतर छोटी अवधि में बहुत बड़ा नजर नहीं आता, लेकिन लंबी अवधि में इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि म्यूचुअल फंड निवेश में मिलने वाला रिटर्न दोबारा निवेश होने पर कंपाउंडिंग का फायदा देता है।

अगर दो प्लान एक ही पोर्टफोलियो में निवेश कर रहे हैं, लेकिन एक प्लान का खर्च लगातार कम है, तो कम खर्च वाले प्लान में निवेश की नेट वैल्यू लंबे समय में ज्यादा हो सकती है।

यही कारण है कि एक ही स्कीम के Direct और Regular Plan के NAV में अंतर दिखाई दे सकता है। Direct Plan का कम Expense Ratio लंबे समय में निवेशक के लिए अतिरिक्त रिटर्न का कारण बन सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि Direct Plan का रिटर्न हर परिस्थिति में निश्चित रूप से ज्यादा ही होगा; फंड के प्रदर्शन, खर्च और अन्य कारकों का असर भी पड़ता है।

मार्च 2026 में Direct Plan का AUM कितना था?

क्रिसिल इंटेलिजेंस के विश्लेषण के मुताबिक, मार्च 2026 में Direct Plan का AUM करीब 33.28 लाख करोड़ रुपये था। यह म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के कुल एसेट्स का लगभग 45.1 फीसदी था।

मार्च 2021 में Direct Plan की कुल एसेट्स में हिस्सेदारी करीब 43.4 फीसदी थी। इस तरह पांच साल की अवधि में कुल म्यूचुअल फंड एसेट्स में Direct Plan की हिस्सेदारी भी बढ़ी है।

दूसरी ओर, Regular Plan की कुल एसेट्स में हिस्सेदारी इस अवधि में 56.6 फीसदी से घटकर 54.9 फीसदी हो गई। हालांकि, Regular Plan अभी भी म्यूचुअल फंड निवेश का एक बड़ा हिस्सा है।

मार्च 2026 में Regular Plan के जरिए निवेशित एसेट्स का आंकड़ा करीब 40.46 लाख करोड़ रुपये था। इससे साफ है कि Direct Plan तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन Regular Plan का इस्तेमाल करने वाले निवेशकों की संख्या और इसमें मौजूद एसेट्स अभी भी काफी बड़े हैं।

किस निवेशक के लिए Direct Plan बेहतर हो सकता है?

Direct Plan उन निवेशकों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है जो खुद रिसर्च कर सकते हैं और अपने म्यूचुअल फंड निवेश से जुड़े फैसले स्वतंत्र रूप से लेना चाहते हैं।

अगर आपको म्यूचुअल फंड की कैटेगरी, रिस्क, Expense Ratio, फंड का प्रदर्शन और अपने वित्तीय लक्ष्य समझ में आते हैं, तो Direct Plan की कम लागत आपके लिए फायदेमंद हो सकती है।

खासकर लंबी अवधि के निवेश में खर्च का अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है। निवेश की अवधि जितनी लंबी होती है, लागत में छोटा अंतर भी कंपाउंडिंग के कारण अंतिम कॉर्पस पर असर डाल सकता है।

Regular Plan किसके लिए उपयोगी हो सकता है?

हर निवेशक के लिए Direct Plan जरूरी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति म्यूचुअल फंड की स्कीम चुनने, पोर्टफोलियो की समीक्षा करने या अपने वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार निवेश तय करने में विशेषज्ञ की मदद चाहता है, तो Regular Plan उसके लिए सुविधाजनक हो सकता है।

Regular Plan में डिस्ट्रीब्यूटर निवेशक को स्कीम से जुड़ी जानकारी और निवेश प्रक्रिया में सहायता दे सकता है। नए निवेशकों या उन लोगों के लिए यह सुविधा महत्वपूर्ण हो सकती है जो खुद लगातार फंड की निगरानी नहीं करना चाहते।

इसलिए केवल कम Expense Ratio देखकर यह तय नहीं करना चाहिए कि Direct Plan ही हर निवेशक के लिए सबसे अच्छा है। निवेशक को यह देखना चाहिए कि उसे सलाह और सहायता की कितनी जरूरत है।

Direct या Regular Plan चुनने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले सिर्फ Direct और Regular का नाम देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। निवेशक को अपनी जोखिम क्षमता, निवेश अवधि और वित्तीय लक्ष्य को भी ध्यान में रखना चाहिए।

अगर आप खुद निवेश संबंधी फैसले लेने में सक्षम हैं और जरूरी रिसर्च कर सकते हैं, तो Direct Plan की कम लागत आपके लिए आकर्षक हो सकती है। वहीं, अगर आपको निवेश के फैसलों में पेशेवर सहायता की जरूरत है, तो Regular Plan की सुविधा आपके लिए ज्यादा उपयोगी हो सकती है।

सबसे जरूरी बात यह है कि Direct Plan का कम Expense Ratio एक फायदा है, लेकिन सही म्यूचुअल फंड स्कीम का चयन, जोखिम और निवेश का लक्ष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। निवेश करने से पहले फंड के दस्तावेजों और खर्चों की जानकारी जरूर पढ़ें और जरूरत पड़ने पर SEBI-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार से सलाह लें।

निष्कर्ष

Direct और Regular दोनों प्लान का अपना महत्व है। Direct Plan में डिस्ट्रीब्यूटर की लागत नहीं होने के कारण Expense Ratio कम रहता है और इसी वजह से लंबी अवधि में इसका रिटर्न Regular Plan की तुलना में बेहतर हो सकता है। दूसरी तरफ, Regular Plan निवेशकों को डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध कराता है।

पिछले कुछ वर्षों में Direct Plan की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि निवेशक अब लागत और रिटर्न के बीच के संबंध को ज्यादा गंभीरता से समझ रहे हैं। हालांकि, आपके लिए कौन सा विकल्प बेहतर है, इसका फैसला आपकी जानकारी, निवेश अनुभव, वित्तीय लक्ष्य और सलाह की जरूरत पर निर्भर करता है।

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TAGGED: Direct Plan, Direct Plan Benefits, Direct vs Regular Mutual Fund, Mutual Fund Direct Plan, Mutual Fund Regular Plan, Regular Plan, Regular Plan Benefits
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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