Chinese Investment in India: भारत और चीन के रिश्तों में गलवान के बाद आई तल्खी अब धीरे-धीरे कम होती दिख रही है। एक तरफ NSA अजीत डोभाल चीन के दौरे पर हैं, जहां सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बातचीत हो रही है। दूसरी ओर, भारत में चीन से जुड़े निवेश का प्रवाह भी दोबारा बढ़ता नजर आ रहा है। सितंबर में संभावित BRICS सम्मेलन के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे की चर्चाओं के बीच यह घटनाक्रम दोनों देशों के रिश्तों में बदलते रुख का संकेत माना जा रहा है।
नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच संबंधों में पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही दूरी अब धीरे-धीरे कम होती दिखाई दे रही है। इसका असर केवल कूटनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक रिश्तों में भी बदलाव नजर आने लगा है।
नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) अजीत डोभाल चीन के दौरे पर हैं। बीजिंग में उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत हो रही है। इस दौरान सीमा विवाद के साथ-साथ सितंबर में भारत में होने वाले BRICS सम्मेलन से जुड़े मुद्दे भी अहम हैं। इस सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि उनके दौरे की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
इसी बीच भारत में चीन से जुड़े निवेश की वापसी ने भी ध्यान खींचा है। गलवान विवाद के बाद विदेशी निवेश के नियमों में सख्ती किए जाने के बाद अब नियमों में सीमित ढील दी गई है। इसके बाद संशोधित व्यवस्था के तहत 50 करोड़ डॉलर से अधिक यानी करीब 4,900 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 के बाद भारत-चीन के आर्थिक रिश्तों में निवेश का रास्ता काफी मुश्किल हो गया था।
डोभाल की बीजिंग यात्रा क्यों है खास?
अजीत डोभाल की चीन यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दोनों देशों के बीच संवाद फिर से तेज हुआ है। स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव मैकेनिज्म के तहत डोभाल और वांग यी के बीच बातचीत का मुख्य मुद्दा सीमा विवाद है।
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि चीन के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता जरूरी है। दूसरी तरफ, दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय में उच्चस्तरीय बातचीत बढ़ी है।
यह यात्रा सितंबर में भारत में होने वाले BRICS सम्मेलन से पहले हो रही है। यदि शी जिनपिंग इसमें हिस्सा लेने के लिए भारत आते हैं, तो यह 2020 के बाद दोनों देशों के संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम होगा।
इसलिए डोभाल की बीजिंग यात्रा को सिर्फ सीमा वार्ता तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे भारत-चीन संबंधों को धीरे-धीरे स्थिर करने की व्यापक कोशिश भी दिखाई देती है।
2020 के बाद कैसे बदले थे निवेश के नियम?
गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा बदलाव आया था। भारत ने सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से जुड़े नियमों को सख्त किया।
सरकार ने Press Note 3 के जरिए उन देशों से आने वाले निवेश को सरकारी मंजूरी के दायरे में ला दिया, जिनकी भारत के साथ जमीनी सीमा लगती है।
इसका सबसे बड़ा असर चीन से आने वाले निवेश पर पड़ा।
चीनी कंपनियों और चीन से जुड़े निवेशकों के कई प्रस्ताव मंजूरी प्रक्रिया में अटक गए। सिर्फ बड़े निवेश ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसे फंड और निवेश भी प्रभावित हुए जिनमें चीनी हिस्सेदारी काफी कम थी।
वेंचर कैपिटल निवेश, फॉलो-ऑन फंडिंग और माइनॉरिटी हिस्सेदारी से जुड़े कई मामलों में भी देरी की शिकायत सामने आती रही।
अब नियमों में क्या बदलाव हुआ?
भारत ने इस साल मई में निवेश नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया। नए फ्रेमवर्क के तहत ऐसे निवेशकों को कुछ परिस्थितियों में ऑटोमैटिक रूट की सुविधा दी गई, जिनकी चीन या अन्य भूमि सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों में 10% तक गैर-नियंत्रित हिस्सेदारी है।
इस बदलाव का उद्देश्य उन ग्लोबल निवेश फंड्स के लिए नियमों को आसान बनाना था जिनका चीन में सीमित एक्सपोजर है, लेकिन उन्हें सिर्फ उस हिस्सेदारी की वजह से लंबी मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक संशोधित व्यवस्था के तहत करीब 4,900 करोड़ रुपये से अधिक के 29 निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं।
इन निवेशों से जुड़े प्रमुख सेक्टरों में शामिल हैं:
- इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- मैन्युफैक्चरिंग
- फार्मास्यूटिकल्स
- डेटा सेंटर
- सूचना एवं संचार सेवाएं
- ट्रांसपोर्ट
दिलचस्प बात यह है कि यह पैसा सीधे चीन से आने के बजाय अमेरिका, मॉरिशस, सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे देशों में स्थित कंपनियों और निवेश संस्थाओं के जरिए आया है।
भारत ने पूरी तरह दरवाजे क्यों नहीं खोले?
यह बदलाव चीन के प्रति भारत की नीति में पूर्ण यू-टर्न नहीं है। सरकार ने निवेश के लिए रास्ता कुछ आसान जरूर किया है, लेकिन सुरक्षा से जुड़े नियम अभी भी लागू हैं।
चीन में सीधे रजिस्टर्ड कंपनियों को कई मामलों में सरकारी मंजूरी की जरूरत बनी हुई है। वहीं रणनीतिक और संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश की अलग से जांच की जा सकती है।
भारत का मौजूदा तरीका चुनिंदा आर्थिक सहयोग और सख्त सुरक्षा निगरानी के बीच संतुलन बनाने का है।
यानी सरकार यह स्वीकार करती दिख रही है कि हर चीनी कनेक्शन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए समान जोखिम नहीं होता। किसी अंतरराष्ट्रीय फंड में चीन की छोटी हिस्सेदारी होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि उस फंड का नियंत्रण चीन के पास है।
मैन्युफैक्चरिंग में चीन की भूमिका क्यों अहम है?
भारत तेजी से अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना चाहता है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी, सोलर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में चीन का सप्लायर नेटवर्क और टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम काफी मजबूत है।
यही वजह है कि भारतीय कंपनियों के लिए चीन से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो सकता है।
इंडस्ट्री की तरफ से लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि यदि चीन से जुड़ी हर तरह की हिस्सेदारी पर रोक लगाई जाती है, तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और ग्लोबल सप्लाई चेन में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए अब एक ऐसा मॉडल उभरता दिख रहा है जिसमें चीन की तकनीक, विशेषज्ञता और सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन कंपनी का नियंत्रण भारतीय हाथों में रहे।
Vivo-Dixon और JSW-MG मॉडल से समझिए रणनीति
भारत में चीनी कंपनियों के साथ सहयोग का एक नया मॉडल देखने को मिल रहा है। इसमें भारतीय कंपनी को बहुमत हिस्सेदारी और नियंत्रण में रखा जाता है, जबकि चीनी कंपनी टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता या सप्लाई चेन के स्तर पर सहयोग करती है।
Vivo-Dixon से जुड़ा जॉइंट वेंचर इस तरह की रणनीति का उदाहरण है, जहां भारतीय कंपनी की बहुमत हिस्सेदारी को प्राथमिकता दी गई।
इसी तरह डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में चीन से जुड़ी कंपनियों के साथ साझेदारी के कुछ अन्य मॉडल भी सामने आए हैं।
ऑटोमोबाइल सेक्टर में JSW-MG जैसी साझेदारी भी इसी व्यापक सोच को दिखाती है। इसका उद्देश्य चीनी कंपनियों की तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं का इस्तेमाल करना है, लेकिन रणनीतिक नियंत्रण को भारतीय पक्ष के हाथों में बनाए रखना है।
कूटनीति के साथ अर्थव्यवस्था भी क्यों सुधर रही है?
भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव को 2024 में रूस के कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद तेज हुई कूटनीतिक बातचीत के संदर्भ में देखा जा सकता है।
इसके बाद दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच संपर्क बढ़ा। सीधी उड़ानों की बहाली, सीमा से जुड़े व्यापार में सुधार और उच्चस्तरीय बैठकों ने भी दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता खोला है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वांग यी के बीच बातचीत में राजनीतिक मुद्दों के अलावा व्यापार, मार्केट एक्सेस और सप्लाई चेन जैसे आर्थिक विषय भी चर्चा में रहे हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत-चीन के सभी विवाद खत्म हो गए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा अभी भी बड़ा मुद्दा है। भारत को चीन से जुड़े बाजार पहुंच, सप्लाई चेन पर निर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित चिंताएं भी हैं।
सीमा विवाद भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
लेकिन दोनों देशों के बीच बातचीत का फोकस जरूर बदला है।
जहां 2020 के बाद चीन के साथ चर्चा मुख्य रूप से सीमा तनाव, ऐप बैन और निवेश प्रतिबंधों के इर्द-गिर्द थी, वहीं अब बातचीत में मैन्युफैक्चरिंग, निवेश, व्यापार, सप्लाई चेन और कूटनीतिक संपर्क भी शामिल हो रहे हैं।
क्या शी जिनपिंग का भारत दौरा बड़ा संकेत होगा?
यदि शी जिनपिंग सितंबर में BRICS सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आते हैं, तो यह भारत-चीन संबंधों के लिए एक अहम राजनीतिक संकेत हो सकता है।
खासकर इसलिए क्योंकि यह दौरा ऐसे समय में होगा जब 2020 के बाद सख्त किए गए निवेश नियमों में सीमित ढील दी गई है और चीन से जुड़े निवेश का कुछ हिस्सा भारत की अर्थव्यवस्था में वापस आना शुरू हुआ है।
हालांकि करीब 50 करोड़ डॉलर का निवेश भारत की कुल विदेशी निवेश जरूरतों के मुकाबले बहुत बड़ा आंकड़ा नहीं है, लेकिन इसकी अहमियत रकम से ज्यादा दिशा में बदलाव में है।
यह दिखाता है कि भारत चीन के साथ संबंधों में न तो पूरी तरह पुरानी व्यवस्था की ओर लौट रहा है और न ही आर्थिक संबंधों को पूरी तरह बंद रखना चाहता है।
डोभाल का दौरा और चीनी निवेश क्या एक ही कहानी के हिस्से हैं?
कुल मिलाकर देखा जाए तो अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा और चीन से जुड़े निवेश की वापसी को पूरी तरह अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखना मुश्किल है।
राजनयिक स्तर पर बातचीत बढ़ रही है, सीमा पर स्थिरता की कोशिश जारी है और BRICS जैसे मंच पर दोनों देशों के नेताओं की संभावित मुलाकात की तैयारी हो रही है। दूसरी तरफ, निवेश नियमों में सीमित ढील के बाद आर्थिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे बढ़ रही हैं।
भारत का मौजूदा रुख साफ तौर पर सावधानी के साथ आर्थिक जुड़ाव का दिखाई देता है।
आने वाले समय में इस रिश्ते की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि LAC पर शांति कितनी स्थायी रहती है, व्यापार असंतुलन को लेकर दोनों देश क्या कदम उठाते हैं और रणनीतिक क्षेत्रों में भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं को किस तरह संतुलित करता है।
अगर यह संतुलन बना रहा, तो गलवान के बाद पूरी तरह ठंडे पड़े भारत-चीन आर्थिक रिश्तों में धीरे-धीरे और सुधार देखने को मिल सकता है। फिलहाल 50 करोड़ डॉलर से अधिक का नया निवेश इसी बदलते समीकरण का शुरुआती संकेत जरूर है।


