Sugar Price Hike: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों के साथ-साथ राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे गन्ने की फसल पर Red Rot बीमारी और Al Niño की परिस्थितियों के असर को प्रमुख कारण बताया है। वहीं, विपक्ष ने सरकार की चीनी नीति, गन्ना किसानों के भुगतान और Ethanol उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए हैं।
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई को चीनी की खुदरा कीमत ₹48.18 प्रति किलो थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। यानी करीब एक महीने में चीनी ₹7.52 प्रति किलो यानी लगभग 15.6% महंगी हो गई।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़ रहे हैं और सरकार जिस Red Rot बीमारी का जिक्र कर रही है, वह गन्ने की फसल को कितना नुकसान पहुंचा सकती है?
एक महीने में ₹7.52 प्रति किलो महंगी हुई चीनी
चीनी की खुदरा कीमत में पिछले एक महीने के दौरान उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। 20 जुलाई को जहां एक किलो चीनी की औसत खुदरा कीमत ₹48.18 थी, वहीं 20 अगस्त को यह ₹55.70 प्रति किलो पहुंच गई।
इस तरह कीमत में ₹7.52 प्रति किलो का इजाफा हुआ। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह करीब 15.6 फीसदी की बढ़ोतरी है। चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीज के दाम बढ़ने का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है।
खासकर त्योहारों के मौसम से पहले कीमतों में यह तेजी सरकार के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि इस दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ सकती है।
सरकार ने चीनी महंगी होने की क्या वजह बताई?
केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के मुताबिक, देश में चीनी उत्पादन पर गन्ने की फसल में आई कमी का असर पड़ा है। इसके पीछे Red Rot बीमारी और Al Niño जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया गया है।
सरकार का कहना है कि प्रतिकूल मौसम और फसल संबंधी समस्याओं का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसका असर गन्ने और आगे चलकर चीनी के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
सरकार के अनुसार, देश में सालाना चीनी की जरूरत करीब 280 लाख टन है और फिलहाल 20-25 लाख टन से अधिक का अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध है।
त्योहारों से पहले सरकार ने उठाया कदम
त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए सरकार घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता बनाए रखने पर जोर दे रही है।
इसी दिशा में Raw Sugar यानी कच्ची चीनी के अस्थायी आयात का फैसला किया गया है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों पर बढ़ते दबाव को कम करना है।
सरकार की कोशिश है कि त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की कमी न हो और मांग बढ़ने के बावजूद कीमतों में तेज उछाल को नियंत्रित किया जा सके।
विपक्ष ने गन्ना किसानों के भुगतान पर उठाए सवाल
चीनी की कीमतों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
कांग्रेस महासचिव और सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि गन्ना किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिलने से किसान गन्ने की खेती के प्रति हतोत्साहित हो सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब भारत पहले चीनी का निर्यात करता था, तो अब चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
विपक्ष की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि गन्ना किसानों को उनकी फसल का भुगतान समय पर नहीं मिलता, तो अगले सीजन में वे गन्ने की खेती के लिए कैसे प्रोत्साहित होंगे।
Ethanol उत्पादन को लेकर भी विवाद
चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच Ethanol उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल का मुद्दा भी चर्चा में है।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने चीनी के साथ-साथ रोजमर्रा की कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि गन्ने का एक हिस्सा Ethanol उत्पादन की ओर मोड़े जाने से क्या चीनी की उपलब्धता प्रभावित नहीं होती?
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने भी गन्ने के Ethanol उत्पादन में इस्तेमाल को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं।
विपक्ष का तर्क है कि यदि चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध गन्ने का एक हिस्सा ईंधन बनाने में इस्तेमाल होता है, तो इससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
सरकार ने Ethanol को जिम्मेदार मानने से किया इनकार
विपक्ष के आरोपों पर केंद्र सरकार का कहना है कि मौजूदा चीनी कीमतों में तेजी को केवल Ethanol उत्पादन के लिए गन्ने के डायवर्जन से जोड़ना सही नहीं है।
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, चीनी से Ethanol की ओर डायवर्ट होने वाली मात्रा का हिस्सा 2022-23 में करीब 12% था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9% रह गया।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारत में Ethanol उत्पादन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है। इसलिए सरकार का कहना है कि गन्ने के Ethanol डायवर्जन को चीनी की मौजूदा महंगाई का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता।
क्या है Red Rot बीमारी?
अब सबसे अहम सवाल कि आखिर Red Rot क्या है?
Red Rot गन्ने की एक गंभीर फफूंदजनित बीमारी है। इसे गन्ने की प्रमुख बीमारियों में शामिल किया जाता है। यह बीमारी गन्ने के पौधे के तने को प्रभावित करती है और गंभीर स्थिति में फसल की पैदावार के साथ-साथ चीनी की रिकवरी पर भी असर पड़ सकता है।
इस बीमारी का नाम गन्ने के अंदर दिखाई देने वाले लाल या लाल-भूरे रंग के धब्बों और सड़न से जुड़ा है। संक्रमित गन्ने के तने को काटने पर अंदर लाल रंग के हिस्से दिखाई दे सकते हैं। कई मामलों में इन लाल हिस्सों के बीच सफेद धारियां भी नजर आ सकती हैं।
Red Rot से गन्ने की फसल को कैसे नुकसान होता है?
Red Rot का असर धीरे-धीरे गन्ने के पौधे की सेहत और उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। इसके प्रमुख प्रभाव इस तरह समझे जा सकते हैं:
- गन्ने के पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं।
- पत्तियां पीली होकर सूख सकती हैं।
- तने के अंदर के ऊतक सड़ने लगते हैं।
- संक्रमित गन्ने का वजन कम हो सकता है।
- गन्ने की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- चीनी की रिकवरी कम हो सकती है।
- बड़े स्तर पर संक्रमण होने पर कुल गन्ना उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
यानी अगर किसी प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्र में बीमारी बड़े पैमाने पर फैलती है, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। गन्ने की उपलब्धता कम होने पर चीनी मिलों के उत्पादन और अंततः बाजार में चीनी की आपूर्ति पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
Red Rot फैलती कैसे है?
Red Rot संक्रमित बीज-गन्ने यानी सेट, संक्रमित मिट्टी और खेत में मौजूद संक्रमित पौधों के अवशेषों के जरिए फैल सकती है।
खेत में अधिक नमी और बीमारी के अनुकूल मौसम की परिस्थितियां इसके प्रसार में मदद कर सकती हैं। यही वजह है कि गन्ने की खेती में रोगग्रस्त पौधों की पहचान, स्वस्थ रोपण सामग्री का इस्तेमाल और खेत की निगरानी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
Al Niño का चीनी उत्पादन से क्या संबंध है?
सरकार ने Red Rot के साथ Al Niño परिस्थितियों को भी कृषि उत्पादन पर असर डालने वाला कारण बताया है।
Al Niño के दौरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य मौसम पैटर्न में बदलाव हो सकता है। इसका असर बारिश, तापमान और कृषि परिस्थितियों पर पड़ सकता है। गन्ना जैसी फसल के लिए पानी और मौसम की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। इसलिए प्रतिकूल मौसम उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि चीनी की कीमत केवल किसी एक बीमारी या मौसम की घटना से तय नहीं होती। उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक, मांग, सरकारी नीतियां, आयात-निर्यात और वैश्विक बाजार जैसे कई कारक मिलकर कीमत को प्रभावित करते हैं।
अब चीनी की कीमतों पर क्या होगा असर?
फिलहाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती त्योहारों से पहले बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है। एक तरफ गन्ने की फसल पर बीमारी और मौसम के असर से उत्पादन को लेकर चिंता है, तो दूसरी तरफ विपक्ष किसानों के भुगतान और Ethanol नीति पर सवाल उठा रहा है।
सरकार का कहना है कि देश में जरूरत के मुकाबले पर्याप्त चीनी स्टॉक मौजूद है और बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। Raw Sugar के अस्थायी आयात का फैसला भी इसी दिशा में देखा जा रहा है।
हालांकि आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार पर्याप्त स्टॉक होने की बात कह रही है, तो एक महीने में चीनी ₹48.18 से बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो कैसे पहुंच गई?
आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों की दिशा उत्पादन, घरेलू मांग, त्योहारों की खपत, सरकारी हस्तक्षेप और बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर निर्भर करेगी।


