नई दिल्ली: भारत की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है और इसके साथ ही देश स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी कि वित्त वर्ष 2024-25 में भारत की कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (Total Primary Energy Supply – TPES) बढ़कर 39,055 पेटाजूल हो गई है, जबकि 2023-24 में यह 37,936 पेटाजूल थी। यह बढ़ोतरी देश की बढ़ती ऊर्जा खपत और आर्थिक गतिविधियों का संकेत मानी जा रही है।
केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राव इंद्रजीत सिंह ने संसद में बताया कि ऊर्जा क्षेत्र में पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा का दायरा भी तेजी से बढ़ा है। सरकार का फोकस ऊर्जा सुरक्षा के साथ स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने पर है।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में बड़ी छलांग
सरकार के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 47,04,043 मेगावाट तक पहुंच गई, जबकि 31 मार्च 2024 तक यह 21,09,655 मेगावाट थी। इससे स्पष्ट है कि भारत सौर, पवन और अन्य हरित ऊर्जा स्रोतों के विस्तार पर तेजी से काम कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में यह वृद्धि देश के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
क्या होती है प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (TPES)?
मंत्री ने बताया कि एक पेटाजूल (Petajoule) ऊर्जा 10¹⁵ जूल यानी लगभग 278 गीगावाट-घंटे (GWh) के बराबर होती है।
कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (TPES) किसी देश में उपलब्ध कुल ऊर्जा को दर्शाती है। इसमें कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सभी प्रमुख स्रोत शामिल होते हैं। यह किसी अर्थव्यवस्था की ऊर्जा मांग और विकास का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
डिजिटल तकनीक से मजबूत हुआ सरकारी डेटा सिस्टम
राव इंद्रजीत सिंह ने बताया कि सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने आधिकारिक आंकड़ों के संग्रह और प्रकाशन की प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक आधुनिक और पारदर्शी बनाया है।
अब नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के तहत आंकड़े Computer Assisted Personal Interview (CAPI) और e-SIGMA जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुटाए जा रहे हैं।
इन प्लेटफॉर्म में कई आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं, जैसे—
- इन-बिल्ट डेटा वैलिडेशन
- रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग
- एआई आधारित चैटबॉट
- बहुभाषी इंटरफेस
- डिजिटल डेटा सत्यापन
सरकार का कहना है कि इन तकनीकों से डेटा संग्रह की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और फर्जी या त्रुटिपूर्ण आंकड़ों की संभावना भी कम हुई है।
सर्वे रिपोर्ट जारी होने में लग रहा है कम समय
डिजिटल सिस्टम लागू होने के बाद सरकारी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट पहले की तुलना में कहीं तेजी से जारी हो रही हैं।
पहले जहां रिपोर्ट तैयार होने में 8 से 9 महीने लग जाते थे, वहीं अब—
- मासिक रिपोर्ट: 15 से 30 दिन
- तिमाही रिपोर्ट: 45 से 60 दिन
- वार्षिक सर्वे रिपोर्ट: 90 से 120 दिन
के भीतर प्रकाशित की जा रही हैं।
सरकार के अनुसार इससे नीति निर्माण के लिए ताज़ा और भरोसेमंद आंकड़े समय पर उपलब्ध हो रहे हैं।
शोधकर्ताओं के लिए माइक्रोडाटा पोर्टल शुरू
मंत्री ने बताया कि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से मंत्रालय ने नया माइक्रोडाटा पोर्टल भी विकसित किया है। इस पोर्टल पर सर्वेक्षणों का गोपनीय यूनिट-लेवल डेटा उपलब्ध कराया जा रहा है।
इससे शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों को आधिकारिक आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने में सुविधा मिलेगी और साक्ष्य-आधारित नीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।
जीडीपी, आईआईपी और सीपीआई के बेस ईयर में बदलाव
सरकार ने यह भी जानकारी दी कि अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों और अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय मानकों के अनुरूप भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों के बेस ईयर में संशोधन किया गया है।
नए बदलाव इस प्रकार हैं—
- GDP (सकल घरेलू उत्पाद): 2011-12 से बदलकर 2022-23
- IIP (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक): 2011-12 से बदलकर 2022-23
- CPI (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक): 2012=100 से बदलकर 2024=100
सरकार का कहना है कि नए बेस ईयर से देश की बदलती आर्थिक संरचना और उपभोक्ता व्यवहार को अधिक सटीक तरीके से दर्शाया जा सकेगा।
भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया बल
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में वृद्धि यह दर्शाती है कि भारत की औद्योगिक गतिविधियां, बुनियादी ढांचा विकास और बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार देश को स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करेगा।


