नई दिल्ली: दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत के लिए वर्ल्ड बैंक की ताज़ा रिपोर्ट कई सवाल खड़े करती है। नई World Bank Income Classification 2026 में श्रीलंका ने दोबारा ‘अपर-मिडिल इनकम इकॉनमी’ (Upper-Middle Income Economy) का दर्जा हासिल कर लिया है, जबकि भारत अब भी ‘लोअर-मिडिल इनकम इकॉनमी’ (Lower-Middle Income Economy) की श्रेणी में बना हुआ है।
पहली नज़र में यह खबर चौंकाने वाली लग सकती है कि आर्थिक संकट से जूझ चुका श्रीलंका अब इस सूची में भारत से ऊपर पहुंच गया है। हालांकि इसकी वजह भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय (GNI per Capita) को आधार बनाकर की जाने वाली वर्ल्ड बैंक की गणना है।
2022 के संकट से निकलकर श्रीलंका ने की शानदार वापसी
साल 2022 में श्रीलंका गंभीर आर्थिक संकट से गुज़रा था। विदेशी मुद्रा खत्म होने, ईंधन और खाद्य संकट, भारी महंगाई तथा सरकारी कर्ज़ चुकाने में असफल रहने के कारण देश को सॉवरेन डेट डिफॉल्ट तक का सामना करना पड़ा।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक सुधारों, कर्ज पुनर्गठन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से श्रीलंका ने उल्लेखनीय वापसी की है।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार—
- वर्ष 2025 में श्रीलंका की वास्तविक GDP वृद्धि दर लगभग 5% रही।
- प्रति व्यक्ति Atlas GNI में 11.2% की वृद्धि दर्ज की गई।
- महंगाई नियंत्रण में आई।
- मुद्रा विनिमय दर अपेक्षाकृत स्थिर रही।
- आर्थिक गतिविधियों में तेजी लौटने लगी।
इन्हीं कारणों से श्रीलंका फिर से Upper-Middle Income Economy की श्रेणी में शामिल हो गया।
भारत क्यों नहीं पहुंच पाया इस श्रेणी में?
कई लोगों के मन में सवाल उठ सकता है कि जब भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है तो फिर वह श्रीलंका से नीचे कैसे रह गया?
इसका जवाब वर्ल्ड बैंक की गणना पद्धति में छिपा है।
वर्ल्ड बैंक देशों की रैंकिंग कुल GDP के आधार पर नहीं बल्कि प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI Per Capita) के आधार पर तय करता है।
भारत की अर्थव्यवस्था विशाल है, लेकिन इसकी आबादी 140 करोड़ से अधिक होने के कारण कुल आय बड़ी संख्या में लोगों के बीच विभाजित हो जाती है। परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति औसत आय अभी भी Upper-Middle Income श्रेणी के लिए निर्धारित सीमा से नीचे बनी हुई है।
वर्ल्ड बैंक कैसे तय करता है इनकम कैटेगरी?
हर वर्ष वर्ल्ड बैंक दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को चार प्रमुख आय वर्गों में विभाजित करता है।
चार प्रमुख कैटेगरी
- Low Income Economy
- Lower-Middle Income Economy
- Upper-Middle Income Economy
- High Income Economy
यह वर्गीकरण Atlas Method के आधार पर किया जाता है।
इस पद्धति में कई वर्षों के औसत विनिमय दर (Exchange Rate) और महंगाई के प्रभाव को समायोजित कर प्रति व्यक्ति GNI निकाली जाती है, ताकि किसी एक वर्ष के उतार-चढ़ाव का अधिक असर न पड़े।
इस बार किन देशों को मिला प्रमोशन?
1 जुलाई 2026 से लागू नई सूची में कुल 218 अर्थव्यवस्थाओं का मूल्यांकन किया गया।
इस वर्ष कई देशों की श्रेणी बदली गई।
लोअर-मिडिल से अपर-मिडिल इनकम में पहुंचे देश:
- श्रीलंका
- वियतनाम
- फिलीपींस
- जॉर्डन
- फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया
वहीं मायोट को Upper-Middle Income से High Income Economy की श्रेणी में स्थान मिला।
क्या इसका मतलब है कि श्रीलंकाई भारतीयों से ज्यादा अमीर हो गए?
इस सवाल का उत्तर नहीं है।
यह रिपोर्ट किसी देश के प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं बताती।
यह केवल औसत प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय का अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार आकलन करती है।
किसी देश में अमीरी-गरीबी, आय असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन स्तर जैसे कई अन्य कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं, जिन्हें केवल GNI से नहीं मापा जा सकता।
भारत कब बन सकता है Upper-Middle Income Economy?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि भारत—
- तेज आर्थिक विकास की गति बनाए रखता है,
- रोजगार के अवसर बढ़ते हैं,
- प्रति व्यक्ति आय लगातार बढ़ती है,
- उत्पादकता में सुधार होता है,
- राज्यों के बीच आय असमानता घटती है,
तो आने वाले दशक में भारत भी Upper-Middle Income Economy की श्रेणी में पहुंच सकता है।
हालांकि इसके लिए केवल GDP बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रति व्यक्ति आय में भी लगातार सुधार आवश्यक होगा।
भारत के सामने प्रमुख चुनौतियां
भारत के अभी भी Lower-Middle Income श्रेणी में बने रहने के पीछे कई कारण हैं।
- बड़ी आबादी के कारण प्रति व्यक्ति आय कम रहना।
- आर्थिक विकास के बावजूद आय में समान वृद्धि न होना।
- राज्यों के बीच आय और उत्पादकता में बड़ा अंतर।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता।
- बड़ी संख्या में निम्न आय वर्ग की आबादी।
वर्ल्ड बैंक की इनकम क्लासिफिकेशन क्यों महत्वपूर्ण होती है?
यह वर्गीकरण केवल सांख्यिकीय रिपोर्ट नहीं है। इसका उपयोग कई महत्वपूर्ण निर्णयों में किया जाता है।
- सरकारें आर्थिक प्रदर्शन का मूल्यांकन करती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं देशों की तुलना करती हैं।
- विकास एजेंसियां सहायता और रियायती वित्तपोषण की पात्रता तय करती हैं।
- वैश्विक निवेशक किसी देश की दीर्घकालिक आर्थिक दिशा का आकलन करते हैं।
- शोधकर्ता वैश्विक विकास के रुझानों का विश्लेषण करते हैं।
हालांकि वर्ल्ड बैंक स्वयं भी स्पष्ट करता है कि किसी देश के विकास को केवल प्रति व्यक्ति GNI से नहीं मापा जा सकता।
1987 से अब तक दुनिया में बड़ा बदलाव
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग चार दशकों में वैश्विक आय संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है।
- 1987 में दुनिया की लगभग 30% अर्थव्यवस्थाएं Low Income श्रेणी में थीं।
- 2026 तक यह आंकड़ा घटकर 11% रह गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि अनेक देशों ने आर्थिक विकास के जरिए अपनी आय श्रेणी में सुधार किया है। वहीं कई देश अब भी संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण निचली श्रेणियों में बने हुए हैं।
निष्कर्ष
श्रीलंका का दोबारा Upper-Middle Income Economy बनना उसके आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर श्रीलंकाई नागरिक भारतीयों से अधिक संपन्न हो गया है। वर्ल्ड बैंक की यह रैंकिंग केवल प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय पर आधारित होती है। भारत की विशाल आबादी के कारण औसत आय अभी भी अगले स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। यदि आर्थिक विकास और प्रति व्यक्ति आय में लगातार वृद्धि जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में भारत के भी Upper-Middle Income Economy की श्रेणी में शामिल होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।


