नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला पर साफ दिखाई देने लगा है। हालांकि इस मार्ग से तेल और एलएनजी (LNG) की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन जहाजों की गतिविधियों को ट्रैक करना पहले की तुलना में काफी मुश्किल हो गया है।
ऊर्जा बाजार से जुड़े विश्लेषकों का कहना है कि कई तेल और एलएनजी टैंकर अब अपनी पहचान और लोकेशन बताने वाले सिस्टम को अस्थायी रूप से बंद करके यात्रा कर रहे हैं। इस वजह से यह पता लगाना कठिन हो गया है कि वास्तव में कितनी मात्रा में तेल और गैस वैश्विक बाजारों तक पहुंच रही है और कौन-कौन से देश इन खेपों के अंतिम खरीदार हैं।
क्या है ‘डार्क मोड’ रणनीति?
शिपिंग इंडस्ट्री में “डार्क मोड” उस स्थिति को कहा जाता है जब कोई जहाज अपना AIS (Automatic Identification System) बंद कर देता है। AIS एक ट्रैकिंग सिस्टम है जो जहाज की लोकेशन, गति और दिशा जैसी जानकारी प्रसारित करता है। सामान्य परिस्थितियों में यह प्रणाली समुद्री सुरक्षा और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए जरूरी मानी जाती है।
हाल के महीनों में होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे कई जहाजों ने AIS सिग्नल बंद रखने की रणनीति अपनाई है। इससे उनकी गतिविधियों को सार्वजनिक रूप से ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। पहले इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्रतिबंधों से बचने वाले जहाजों द्वारा किया जाता था, लेकिन अब बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के कारण सामान्य वाणिज्यिक जहाज भी इसका उपयोग कर रहे हैं।
मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म Vortexa के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र से गुजरने वाले बड़ी संख्या में जहाजों ने हाल के महीनों में अपने ट्रांसपोंडर बंद रखे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल प्रतिबंधों से बचने की रणनीति नहीं बल्कि युद्ध और सुरक्षा जोखिमों के बीच परिचालन जारी रखने का एक व्यावसायिक उपाय भी बन गया है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और कतर जैसे खाड़ी देश शामिल हैं।
इन देशों से आने वाले अधिकांश तेल और एलएनजी कार्गो होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं। यही वजह है कि इस समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे आयात लागत बढ़ सकती है। हालांकि फिलहाल देश के पास पर्याप्त रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार मौजूद हैं, जिससे तत्काल संकट की संभावना कम मानी जा रही है।
क्या भारत तक अभी भी पहुंच रही है तेल और LNG की सप्लाई?
तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों तक ऊर्जा आपूर्ति जारी है। कई शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ अपने जहाजों का संचालन कर रही हैं। बाजार से जुड़े सूत्रों और शिपिंग डेटा के विश्लेषण से संकेत मिलते हैं कि तेल और गैस की खेपें अभी भी खाड़ी क्षेत्र से निकल रही हैं, हालांकि उनकी ट्रैकिंग पहले जितनी आसान नहीं रह गई है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक बाजार की जरूरतों को देखते हुए तेल उत्पादक देश और खरीदार दोनों ही सप्लाई चेन को चालू रखने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कारण कई जहाज जोखिम उठाकर भी अपने गंतव्य तक पहुंच रहे हैं।
तेल बाजार पर क्या पड़ रहा है असर?
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है।
हाल के महीनों में ब्रेंट क्रूड और अन्य बेंचमार्क तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है या किसी कारण से इस मार्ग पर आवाजाही गंभीर रूप से बाधित होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।
एलएनजी बाजार भी इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है। कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल है और उसकी अधिकांश आपूर्ति भी इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है।
भारत के आम लोगों पर क्या हो सकता है असर?
यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर भारत में भी महसूस किया जा सकता है। सबसे पहले असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। तेल महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन की लागत बढ़ सकती है।
इसके अलावा उर्वरक उद्योग, बिजली उत्पादन और गैस आधारित उद्योगों पर भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत सरकार और तेल कंपनियां लगातार स्थिति की निगरानी कर रही हैं और वैकल्पिक आपूर्ति विकल्पों पर भी काम कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए यह स्थिति एक महत्वपूर्ण जोखिम बनी हुई है।
सामान्य होने की उम्मीदें अभी कमजोर
वर्ष की शुरुआत में कई बाजार विश्लेषकों को उम्मीद थी कि क्षेत्रीय तनाव कुछ महीनों में कम हो जाएगा और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य गतिविधियां बहाल हो जाएंगी। लेकिन संघर्ष लंबा खिंचने से यह उम्मीद कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि जब तक क्षेत्र में स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त सतर्कता बरतती रहेंगी। इसका मतलब है कि आने वाले समय में भी “डार्क मोड” संचालन, अतिरिक्त बीमा लागत और शिपिंग जोखिम वैश्विक ऊर्जा व्यापार का हिस्सा बने रह सकते हैं।
निष्कर्ष
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल और एलएनजी बाजार को नई चुनौती दी है। कई जहाज सुरक्षा कारणों से AIS सिग्नल बंद करके यात्रा कर रहे हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति को ट्रैक करना मुश्किल हो गया है। इसके बावजूद भारत समेत एशियाई देशों तक तेल और गैस की सप्लाई जारी है। हालांकि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर ऊर्जा कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।


