Human Lifespan Study: क्या इंसान कभी 150 साल से ज्यादा जी सकता है? यह सवाल सदियों से वैज्ञानिकों और आम लोगों के मन में रहा है। अब रूस के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी ने इस बहस को फिर से हवा दे दी है। रिसर्च के मुताबिक, यदि भविष्य में ऐसी दवाएं विकसित हो जाएं जो उम्र बढ़ने की लगभग सभी प्रक्रियाओं को रोक दें, तब भी इंसानों की अधिकतम औसत उम्र करीब 156 साल तक ही सीमित रह सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह शरीर की कोशिकाओं में समय के साथ होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन बताए गए हैं।
156 साल की उम्र का अनुमान कैसे लगाया गया?
रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (Skoltech) के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर एक मैथमैटिकल मॉडल तैयार किया। यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल npj Aging में प्रकाशित हुआ है।
रिसर्च में वैज्ञानिकों ने एक काल्पनिक स्थिति बनाई, जिसमें माना गया कि भविष्य में इंसान उम्र बढ़ने से जुड़ी लगभग सभी समस्याओं—जैसे हार्मोन की कमी, बीमारियां, कोशिकाओं का कमजोर होना और अन्य जैविक बदलाव—को पूरी तरह नियंत्रित कर लेगा। इसके बाद उन्होंने केवल एक कारक ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (Somatic Mutation) को मॉडल में शामिल किया।
अध्ययन के अनुसार, यदि केवल यही प्रक्रिया सक्रिय रहे तो इंसानों की संभावित अधिकतम औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच हो सकती है, जबकि 156 साल का अनुमान सबसे संभावित माना गया।
क्या यह मतलब है कि भविष्य में हर इंसान 156 साल तक जिएगा?
इस सवाल का जवाब नहीं है।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक थॉट एक्सपेरिमेंट (Thought Experiment) है। इसका उद्देश्य यह समझना था कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में केवल DNA म्यूटेशन का कितना योगदान होता है।
यानी यह अध्ययन यह दावा नहीं करता कि आने वाले वर्षों में इंसान निश्चित रूप से 156 साल तक जी पाएगा।
आखिर क्या होते हैं सोमैटिक म्यूटेशन?
हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार विभाजित होती रहती हैं। हर बार कोशिका के विभाजन के दौरान DNA की कॉपी बनती है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी छोटी-छोटी गलतियां हो जाती हैं, जिन्हें सोमैटिक म्यूटेशन कहा जाता है।
शरीर अधिकांश गलतियों की मरम्मत कर देता है, लेकिन कुछ बदलाव स्थायी रूप से रह जाते हैं। दशकों तक ये म्यूटेशन जमा होते रहते हैं।
इनमें से अधिकांश नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ मामलों में यही बदलाव—
- कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
- कोशिकाओं की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे कम कर देते हैं।
- उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
दिमाग और दिल सबसे बड़ी चुनौती क्यों?
रिसर्च में यह भी सामने आया कि शरीर के सभी अंग एक जैसे नहीं होते।
त्वचा और लिवर जैसे अंग लगातार नई कोशिकाएं बनाते रहते हैं। इसलिए इनमें क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं आ जाती हैं।
लेकिन दिमाग (Brain) और दिल (Heart) के साथ ऐसा नहीं होता।
इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—
- न्यूरॉन्स (Neurons)
- कार्डियोमायोसाइट्स (Cardiomyocytes)
जीवनभर बहुत कम या लगभग नहीं बनतीं। ऐसे में इन कोशिकाओं में होने वाला DNA नुकसान लगातार जमा होता रहता है और यही लंबी उम्र की सबसे बड़ी सीमा बन सकता है।
स्टडी के सह-लेखक येवगेनी एफिमोव के अनुसार, न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स इंसानी उम्र को सीमित करने वाले सबसे अहम कारकों में शामिल हैं।
अगर DNA म्यूटेशन न हों तो क्या होगा?
वैज्ञानिकों ने मॉडल में एक और काल्पनिक स्थिति बनाई, जिसमें यह मान लिया गया कि उम्र बढ़ने के साथ मृत्यु का खतरा बिल्कुल नहीं बढ़ता।
इस स्थिति में औसत जीवनकाल का अनुमान करीब 1,759 साल तक पहुंच गया।
लेकिन जैसे ही मॉडल में सोमैटिक म्यूटेशन को शामिल किया गया, संभावित जीवनकाल तेजी से घटकर लगभग 156 साल रह गया।
यही कारण है कि वैज्ञानिक DNA को होने वाले लगातार नुकसान को लंबी उम्र की सबसे बड़ी जैविक सीमाओं में से एक मान रहे हैं।
क्या DNA ही बुढ़ापे का अकेला कारण है?
वैज्ञानिकों का जवाब फिर से नहीं है।
स्टडी के मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने कहा कि इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि इंसान निश्चित रूप से 156 साल तक जिएगा।
उनके अनुसार यह केवल एक गणितीय अनुमान है, जो यह समझने में मदद करता है कि DNA म्यूटेशन उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में कितना योगदान देते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि DNA म्यूटेशन अकेले उतने प्रभावी न हों, लेकिन जब वे शरीर की दूसरी जैविक प्रक्रियाओं के साथ मिलते हैं, तब उनका असर काफी बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों को इस स्टडी से क्या फायदा मिलेगा?
रिसर्चर्स का मानना है कि इस अध्ययन की सबसे बड़ी उपलब्धि 156 साल का आंकड़ा नहीं, बल्कि वह नया वैज्ञानिक मॉडल है जिसके जरिए भविष्य में उम्र बढ़ने की अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया जा सकेगा।
इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि—
- कौन-सी जैविक प्रक्रिया उम्र बढ़ने में सबसे ज्यादा योगदान देती है।
- किस कारण को रोकने से जीवनकाल बढ़ सकता है।
- भविष्य की एंटी-एजिंग दवाओं और रीजेनरेटिव मेडिसिन पर बेहतर रिसर्च संभव हो सकेगी।
रीजेनरेटिव मेडिसिन विशेषज्ञ एगले पाविडे ने भी इस अध्ययन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह रिसर्च इस बात को और मजबूत करती है कि बुढ़ापा एक बेहद जटिल जैविक प्रक्रिया है, जिसे किसी एक कारण से नहीं समझा जा सकता।
क्या इंसान कभी अमर हो पाएगा?
फिलहाल विज्ञान के पास इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है।
हालांकि एंटी-एजिंग थेरेपी, जीन एडिटिंग, स्टेम सेल रिसर्च और रीजेनरेटिव मेडिसिन तेजी से आगे बढ़ रही हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि शरीर में लगातार जमा होने वाले DNA म्यूटेशन जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं इंसानी जीवनकाल की एक महत्वपूर्ण सीमा बनी रह सकती हैं।
इसलिए वर्तमान अध्ययन यह संकेत देता है कि भविष्य में चिकित्सा विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले, तब भी मानव जीवन की एक जैविक सीमा मौजूद रह सकती है।
निष्कर्ष
रूस के वैज्ञानिकों की यह स्टडी इंसानी उम्र की अधिकतम सीमा को लेकर नई बहस छेड़ती है। हालांकि 156 साल का आंकड़ा कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं है, लेकिन यह बताता है कि शरीर में समय के साथ होने वाले DNA म्यूटेशन लंबे जीवन की राह में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यदि एंटी-एजिंग तकनीक और जीन थेरेपी में बड़ी सफलता मिलती है, तो इस विषय पर और भी अहम वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं।


