नई दिल्ली: दुनिया के ऊर्जा बाजार की निगाहें रविवार को होने वाली OPEC+ देशों की महत्वपूर्ण ऑनलाइन बैठक पर टिकी हुई हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-अमेरिका संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के बाद वैश्विक तेल बाजार अभूतपूर्व दबाव में है। पिछले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है और कई बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अभी खत्म होने वाला नहीं है।
OPEC+ की यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा बाधित है। निवेशकों, सरकारों और उद्योग जगत को उम्मीद है कि संगठन उत्पादन बढ़ाने का फैसला लेकर बाजार को कुछ राहत दे सकता है। हालांकि कई विश्लेषकों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने की घोषणा से समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि असली चुनौती तेल की आपूर्ति और परिवहन से जुड़ी हुई है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। यह खाड़ी देशों को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों और तेल बाजार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार दुनिया की कुल तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे बड़े ऊर्जा निर्यातक देशों का अधिकांश तेल इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पहुंचता है। ऐसे में इस जलमार्ग के बंद होने का असर केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई तेल टैंकर फंस गए हैं जबकि कुछ शिपिंग कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपने मार्ग बदल दिए हैं। इसका सीधा असर तेल की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है।
OPEC+ आखिर है क्या और इसकी भूमिका क्यों अहम है?
OPEC+ दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का समूह है। इसमें पारंपरिक OPEC सदस्य देशों के साथ रूस समेत कई अन्य बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं। वैश्विक तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा इस संगठन के नियंत्रण में माना जाता है।
जब भी तेल की कीमतों में असामान्य उतार-चढ़ाव होता है, OPEC+ उत्पादन बढ़ाने या घटाने के जरिए बाजार को संतुलित करने की कोशिश करता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी संगठन ने बड़े पैमाने पर उत्पादन कटौती करके तेल बाजार को स्थिर करने का प्रयास किया था।
अब मौजूदा संकट में भी बाजार की नजर इसी संगठन पर है। निवेशकों को उम्मीद है कि उत्पादन बढ़ाने का फैसला कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
क्या उत्पादन बढ़ाने से वास्तव में सस्ता होगा तेल?
यही सबसे बड़ा सवाल है। रैस्टैड एनर्जी के विश्लेषकों का अनुमान है कि OPEC+ लगभग 1.88 लाख बैरल प्रतिदिन उत्पादन बढ़ाने की घोषणा कर सकता है। लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इसका वास्तविक प्रभाव सीमित हो सकता है।
कारण यह है कि OPEC+ के सभी सदस्य देश अतिरिक्त उत्पादन क्षमता नहीं रखते। कई देशों का उत्पादन पहले से ही अपनी अधिकतम सीमा के आसपास है। केवल कुछ देशों के पास ही अतिरिक्त क्षमता मौजूद है।
दूसरी ओर, अगर तेल का उत्पादन बढ़ भी जाता है तो उसे वैश्विक बाजार तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित परिवहन मार्गों की आवश्यकता होगी। जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक अतिरिक्त उत्पादन का पूरा लाभ बाजार तक पहुंचना मुश्किल माना जा रहा है।
उत्पादन में आई भारी गिरावट
संघर्ष शुरू होने से पहले OPEC+ देशों का संयुक्त उत्पादन लगभग 4.3 करोड़ बैरल प्रतिदिन बताया जाता था। लेकिन हालिया घटनाक्रम के बाद इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होने और कई निर्यात टर्मिनलों पर परिचालन प्रभावित होने से प्रभावी आपूर्ति कम हो गई है। डेटा एनालिटिक्स फर्म Kpler के अनुसार बाजार में उपलब्ध वास्तविक तेल की मात्रा आधिकारिक आंकड़ों से भी कम हो सकती है।
यही कारण है कि तेल की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है।
UAE के फैसले ने बढ़ाई चिंता
ऊर्जा बाजार में एक और बड़ा झटका संयुक्त अरब अमीरात के फैसले से लगा है। हाल के महीनों में UAE ने OPEC ढांचे से अलग होकर अधिक स्वतंत्र ऊर्जा नीति अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि UAE के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है और वह वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बनाना चाहता है। यदि भविष्य में अन्य देश भी इसी राह पर चलते हैं तो OPEC+ की सामूहिक ताकत कमजोर पड़ सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यह संगठन के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ती है। इससे परिवहन महंगा होता है और फिर खाद्य पदार्थों समेत कई वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है। महंगाई बढ़ने से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होती है और आर्थिक विकास की गति पर भी असर पड़ सकता है।
यदि तेल संकट लंबा खिंचता है तो सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के लिए महंगाई नियंत्रण एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
चीन क्यों बन गया है बाजार का सबसे बड़ा संतुलनकर्ता?
ऊर्जा बाजार के कई विश्लेषकों का मानना है कि इस समय चीन वैश्विक तेल कीमतों को और अधिक बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। चीन ने हाल के महीनों में अपनी तेल खरीद अपेक्षाकृत सीमित रखी है और रणनीतिक भंडारों का उपयोग किया है।
यदि चीन अचानक बड़े पैमाने पर तेल खरीदना शुरू कर देता है तो वैश्विक मांग में तेज उछाल आ सकता है, जिससे कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। इसलिए बाजार फिलहाल चीन की ऊर्जा रणनीति पर भी नजर बनाए हुए है।
NewsJagran Analysis
OPEC+ की बैठक से बाजार को कुछ मनोवैज्ञानिक राहत मिल सकती है, लेकिन मौजूदा संकट का मूल कारण उत्पादन नहीं बल्कि आपूर्ति मार्गों का बाधित होना है। जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह सामान्य नहीं होता, तब तक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि OPEC+ उत्पादन बढ़ाने का बड़ा फैसला करता है और साथ ही समुद्री मार्गों की स्थिति में सुधार आता है, तो कीमतों में कुछ नरमी देखी जा सकती है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में आज की OPEC+ बैठक केवल तेल बाजार ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।


