नई दिल्ली। भारतीय रुपये में पिछले कुछ महीनों से लगातार कमजोरी देखने को मिली है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कई बार नए निचले स्तरों के करीब पहुंचा, जिससे बाजार में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या भारतीय मुद्रा 100 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंच सकती है। हालांकि अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया कदमों ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है।
रुपये पर दबाव केवल घरेलू कारणों से नहीं है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक निवेशकों की जोखिम से दूरी, अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता और डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मांग ने भी भारतीय मुद्रा पर असर डाला है। इसके बावजूद RBI और केंद्र सरकार विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं जिनसे आने वाले महीनों में भारत में 40 से 75 अरब डॉलर तक का नया निवेश आ सकता है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनुमानित निवेश वास्तव में भारत आता है तो इससे रुपये को मजबूती मिल सकती है और डॉलर के मुकाबले इसकी स्थिति बेहतर हो सकती है।
क्यों बढ़ी थी रुपये के 100 तक पहुंचने की चिंता?
इस वर्ष रुपया कई बार दबाव में दिखाई दिया। हाल के सप्ताहों में यह 97 रुपये प्रति डॉलर के करीब तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला और यह 95.18 के आसपास बंद हुआ।
आमतौर पर जब किसी देश की मुद्रा लगातार कमजोर होती है तो आयात महंगे हो जाते हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में कमजोर रुपया सीधे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरक और कई औद्योगिक उत्पादों की लागत को प्रभावित करता है।
यही वजह है कि बाजार में कई निवेशकों और विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि यदि विदेशी पूंजी का प्रवाह कमजोर रहा और वैश्विक परिस्थितियां प्रतिकूल बनी रहीं तो रुपया 100 प्रति डॉलर तक भी जा सकता है। लेकिन RBI के हालिया फैसलों को इस आशंका के खिलाफ एक मजबूत जवाब माना जा रहा है।
भारत में 75 अरब डॉलर तक निवेश आने का अनुमान
देश के प्रमुख वित्तीय संस्थानों का मानना है कि RBI के हालिया कदम विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने में मदद करेंगे।
SBI Research का अनुमान है कि इन उपायों से कम से कम 40 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश भारत में आ सकता है। यदि ऐसा होता है तो रुपये को मजबूती मिल सकती है और यह 92 से 93 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है।
वहीं Kotak Securities का आकलन इससे भी अधिक आशावादी है। उसके अनुसार आने वाले समय में भारत में 50 से 75 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है। यह निवेश बॉन्ड मार्केट, बैंकिंग प्रणाली, एफसीएनआर जमा और इक्विटी बाजार के जरिए आ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा देश में आने से डॉलर की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे रुपये पर दबाव कम होगा।
पहला बड़ा कदम: सरकारी बॉन्ड बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए और आकर्षक बनाना
RBI ने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के दायरे को और विस्तारित किया है।
अब 15 वर्ष, 30 वर्ष और 40 वर्ष की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड भी इसमें शामिल कर दिए गए हैं। साथ ही शॉर्ट मैच्योरिटी से जुड़ी कुछ सीमाओं को हटाया गया है।
इस फैसले का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वैश्विक पेंशन फंड, इंश्योरेंस फंड और सॉवरेन वेल्थ फंड आमतौर पर लंबी अवधि के सुरक्षित निवेश विकल्प तलाशते हैं। भारत के सरकारी बॉन्ड उन्हें आकर्षक रिटर्न के साथ अपेक्षाकृत स्थिर निवेश का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय बॉन्ड बाजार में अरबों डॉलर का विदेशी निवेश इसी रास्ते से आ सकता है।
दूसरा बड़ा कदम: एनआरआई और OCI निवेश नियमों को आसान बनाना
भारत दुनिया में सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में से एक का घर है। लाखों भारतीय मूल के लोग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मध्य पूर्व और अन्य देशों में रहते हैं।
RBI और सरकार ने एनआरआई (NRI) तथा ओसीआई (OCI) निवेशकों के लिए कई प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
कोटक सिक्योरिटीज के अनुसार इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी भारतीय समुदाय को भारतीय शेयर बाजार और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों में अधिक निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बढ़ती है तो इससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भरता कम होगी और पूंजी प्रवाह अधिक स्थिर बन सकेगा।
तीसरा बड़ा कदम: FCNR जमा पर विशेष प्रोत्साहन
विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR-B) जमा योजना को लेकर RBI ने बड़ा फैसला लिया है।
केंद्रीय बैंक ने घोषणा की है कि 30 सितंबर 2026 तक 3 से 5 वर्ष की अवधि वाली FCNR जमा पर हेजिंग लागत का पूरा खर्च स्वयं वहन किया जाएगा। यह लागत लगभग 2.5 प्रतिशत सालाना मानी जाती है।
इस कदम का सीधा फायदा बैंकों और जमाकर्ताओं दोनों को मिलेगा।
बैंक अधिक आकर्षक ब्याज दरें दे सकेंगे और विदेशी मुद्रा रखने वाले निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलेगा। इससे बड़ी मात्रा में डॉलर भारत आने की संभावना बढ़ेगी।
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम 2013 के उस दौर की याद दिलाता है जब FCNR जमा के माध्यम से भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में सफलता हासिल की थी।
चौथा बड़ा कदम: निर्यात आय को जल्दी भारत लाने की व्यवस्था
RBI ने निर्यातकों के लिए भी नियमों में बदलाव किया है।
पहले निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा को भारत वापस लाने के लिए 15 महीने का समय मिलता था। अब इस समयसीमा को घटाकर 9 महीने कर दिया गया है।
इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्यात से अर्जित डॉलर अधिक तेजी से भारतीय बैंकिंग प्रणाली में आएं।
जब निर्यातकों की विदेशी मुद्रा देश में जल्दी आती है तो बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है। इससे रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिलती है और विदेशी मुद्रा भंडार को भी समर्थन मिलता है।
क्या वास्तव में रुपया 100 तक नहीं जाएगा?
इस सवाल का कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता क्योंकि मुद्रा बाजार कई वैश्विक कारकों से प्रभावित होता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि रुपये के 100 प्रति डॉलर तक गिरने की आशंका पहले की तुलना में काफी कम हुई है।
भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बनी हुई है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है, बैंकिंग प्रणाली अपेक्षाकृत स्थिर है और सरकार निवेश आकर्षित करने के लिए लगातार सुधार कर रही है।
यदि RBI के हालिया कदमों से अपेक्षित पूंजी प्रवाह आता है तो रुपये को मजबूत आधार मिल सकता है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव आगे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
निष्कर्ष
रुपये की कमजोरी को लेकर चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन RBI ने हाल के महीनों में जो कदम उठाए हैं, उन्होंने बाजार को एक सकारात्मक संकेत दिया है। सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना, एनआरआई निवेश को आसान बनाना, FCNR जमा को प्रोत्साहन देना और निर्यात आय की वापसी को तेज करना ऐसे उपाय हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था में डॉलर प्रवाह बढ़ा सकते हैं।
यदि SBI Research और Kotak Securities के अनुमान सही साबित होते हैं और भारत में 40 से 75 अरब डॉलर तक का निवेश आता है, तो न केवल रुपये को मजबूती मिलेगी बल्कि वित्तीय बाजारों और आर्थिक विकास को भी बड़ा सहारा मिल सकता है। ऐसे में फिलहाल रुपये के 100 प्रति डॉलर तक टूटने की आशंका पहले जितनी मजबूत नहीं दिखाई देती।


