नई दिल्ली। देश में मानसून को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच दालों की कीमतें एक बार फिर चर्चा में हैं। मौसम वैज्ञानिकों द्वारा अल नीनो (El Nino) की आशंका जताए जाने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले महीनों में दालों के दाम फिर से बढ़ सकते हैं। कमजोर या असामान्य मानसून का असर सबसे पहले कृषि उत्पादन पर पड़ता है और भारत जैसे देश में इसका सीधा प्रभाव खाद्य महंगाई पर देखने को मिलता है।
हालांकि इस बार सरकार का दावा है कि स्थिति पहले जैसी नहीं है। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में दालों की खरीद और भंडारण नीति पर विशेष ध्यान दिया है, जिसके कारण देश का बफर स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, वर्तमान में देश के पास 43 लाख टन दालों का बफर स्टॉक मौजूद है, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक है।
सरकार के पास कितना है दालों का बफर स्टॉक?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 तक देश में दालों का कुल बफर स्टॉक 43 लाख टन पहुंच चुका है। तुलना करें तो मई 2025 में यह आंकड़ा लगभग 18 लाख टन था, जबकि मई 2024 में यह करीब 21 लाख टन था। यानी दो वर्षों के भीतर बफर स्टॉक में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि केवल संयोग नहीं है, बल्कि सरकार की उस रणनीति का परिणाम है जिसके तहत घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने, किसानों से अधिक खरीद करने और आयात पर निर्भरता घटाने का प्रयास किया गया है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने तूर, उड़द और मसूर जैसी दालों की खरीद को प्राथमिकता दी है, जिससे सरकारी भंडार लगातार मजबूत हुआ है।
खाद्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मजबूत बफर स्टॉक किसी भी संभावित आपूर्ति संकट के दौरान बाजार में हस्तक्षेप करने का अवसर देता है। यदि किसी कारणवश उत्पादन घटता है या कीमतों में अचानक उछाल आता है, तो सरकार अपने भंडार से दालें बाजार में जारी कर सकती है।
El Nino से क्यों बढ़ती है चिंता?
अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव के कारण विकसित होती है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल नीनो अक्सर सामान्य से कम बारिश और कमजोर मानसून से जुड़ा हुआ माना जाता है।
भारतीय कृषि का एक बड़ा हिस्सा अब भी मानसून पर निर्भर है। खरीफ सीजन में बोई जाने वाली कई फसलें, जिनमें कुछ प्रमुख दालें भी शामिल हैं, पर्याप्त बारिश की मांग करती हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे बाजार में आपूर्ति कम हो जाती है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है।
यही वजह है कि जब भी अल नीनो की चर्चा होती है, खाद्यान्न और दालों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ जाती है। पिछले वर्षों में भी कमजोर मानसून के दौरान अरहर और उड़द जैसी दालों की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था।
क्या इस बार दालों की कीमतों में आएगा बड़ा उछाल?
फिलहाल सरकारी अधिकारियों का मानना है कि दालों की कीमतों में बहुत बड़ी वृद्धि की संभावना कम है। इसका सबसे बड़ा कारण रिकॉर्ड स्तर का बफर स्टॉक है। यदि उत्पादन पर मौसम का असर पड़ता भी है, तब भी सरकार के पास बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए पर्याप्त भंडार उपलब्ध है।
अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि दालें ऐसी वस्तु नहीं हैं जो कुछ महीनों में खराब हो जाएं। वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था के तहत इन्हें दो से तीन वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए मौजूदा स्टॉक निकट भविष्य में आपूर्ति को संतुलित रखने में मदद करेगा।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कीमतों में कोई बदलाव नहीं होगा। यदि मानसून अपेक्षा से अधिक कमजोर रहता है, उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है या वैश्विक बाजार में दालों की कीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू बाजार में भी कुछ दबाव देखने को मिल सकता है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में अचानक बड़े उछाल की आशंका सीमित दिखाई देती है।
खाद्य महंगाई पर भी रहेगी नजर
देश में खुदरा महंगाई दर को नियंत्रित रखने में खाद्य वस्तुओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दालें भारतीय परिवारों के भोजन का प्रमुख हिस्सा हैं और इनके दाम बढ़ने पर सीधे आम उपभोक्ता का बजट प्रभावित होता है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने प्याज, गेहूं, चावल और दालों के बफर स्टॉक को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है। इसका उद्देश्य केवल आपूर्ति बनाए रखना नहीं, बल्कि खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत बफर स्टॉक होने से सरकार को बाजार में समय पर हस्तक्षेप करने की क्षमता मिलती है, जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोका जा सकता है।
किसानों के लिए क्या है संकेत?
सरकार की बढ़ी हुई खरीद नीति का फायदा किसानों को भी मिल सकता है। यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अधिक खरीद जारी रहती है, तो किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है। इससे दाल उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और लंबे समय में देश की आयात निर्भरता भी कम हो सकती है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उपभोक्ता देश है, लेकिन कई वर्षों तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ा। अब सरकार का लक्ष्य घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
आगे क्या देखना होगा?
दालों की कीमतों का भविष्य काफी हद तक आगामी मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की भविष्यवाणियों और खरीफ बुवाई के आंकड़ों पर बाजार की नजर बनी रहेगी। यदि बारिश सामान्य रहती है तो उत्पादन अच्छा रहने की उम्मीद है और कीमतें नियंत्रित रह सकती हैं।
वहीं यदि अल नीनो का असर अपेक्षा से अधिक गंभीर होता है, तो सरकार को अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर बाजार में आपूर्ति बढ़ानी पड़ सकती है। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े संकेत देते हैं कि देश के पास संभावित संकट से निपटने के लिए पर्याप्त दाल भंडार मौजूद है।
निष्कर्ष
अल नीनो और कमजोर मानसून की आशंकाओं के बावजूद फिलहाल दालों की कीमतों को लेकर घबराने की जरूरत नहीं दिख रही है। देश में 43 लाख टन का रिकॉर्ड बफर स्टॉक मौजूद है, जो पिछले दो वर्षों की तुलना में दोगुने से अधिक है। यही कारण है कि सरकार और विशेषज्ञ दोनों मानते हैं कि निकट भविष्य में दालों की कीमतों में बहुत बड़ा उछाल आने की संभावना सीमित है। हालांकि मानसून की स्थिति और खरीफ उत्पादन पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा, क्योंकि यही आने वाले महीनों में बाजार की दिशा तय करेंगे।


