El Nino Alert: दुनिया पर मंडरा रहा नया मौसम संकट, भारत ने पहले ही कर ली बड़ी तैयारी
नई दिल्ली। दुनिया एक बार फिर अल नीनो (El Nino) के खतरे की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में अल नीनो की स्थिति विकसित होने की प्रबल संभावना है। एजेंसी के अनुसार जून से अगस्त 2026 के बीच इसके बनने की संभावना करीब 80 प्रतिशत है, जबकि नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
अल नीनो का नाम सामने आते ही सबसे बड़ी चिंता कृषि उत्पादन, मॉनसून और खाद्य महंगाई को लेकर पैदा होती है। भारत जैसे देश के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है। हालांकि इस संभावित चुनौती के बीच भारत सरकार ने दावा किया है कि देश ने खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर मजबूत तैयारी कर ली है। सरकार के पास इस समय रिकॉर्ड 43 लाख टन दालों का बफर स्टॉक मौजूद है, जो किसी भी आपूर्ति संकट या कीमतों में अचानक उछाल के दौरान सुरक्षा कवच का काम कर सकता है।
सरकार ने क्यों बढ़ाया दालों का भंडार?
उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने फिक्की के एक कार्यक्रम में कहा कि सरकार फिलहाल इस बफर स्टॉक को बाजार में उतारने की कोई जल्दबाजी नहीं कर रही है। यदि अल नीनो का प्रभाव खरीफ सीजन की बुवाई या उत्पादन पर पड़ता है, तब इस भंडार का उपयोग किया जाएगा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई 2025 में दालों का बफर स्टॉक करीब 18 लाख टन था। वहीं मई 2024 में यह लगभग 21 लाख टन दर्ज किया गया था। अब यह बढ़कर 43 लाख टन तक पहुंच चुका है। यानी दो वर्षों के भीतर यह भंडार दोगुने से भी अधिक हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की सुनिश्चित खरीद नीति, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों के कारण यह संभव हो पाया है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखना है।
आखिर अल नीनो क्या होता है?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ जाने पर विकसित होती है। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) प्रणाली का गर्म चरण माना जाता है।
हालांकि इसकी शुरुआत हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसका प्रभाव दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में यह घटना अक्सर कमजोर मॉनसून, कम वर्षा, अधिक तापमान और कृषि उत्पादन में गिरावट से जुड़ी रही है।
अल नीनो आमतौर पर हर दो से सात वर्ष के बीच विकसित हो सकता है और इसका प्रभाव कई महीनों तक बना रह सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक और सरकारें इसके संकेतों पर लगातार नजर रखती हैं।
वैज्ञानिकों की चिंता क्यों बढ़ी?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार प्रशांत महासागर की सतह के नीचे के पानी का तापमान हाल के महीनों में तेजी से बढ़ा है। यह संकेत देता है कि अल नीनो के विकसित होने की परिस्थितियां मजबूत हो रही हैं।
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा है कि दुनिया को संभावित रूप से एक मजबूत अल नीनो घटना के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके अनुसार यह घटना कई क्षेत्रों में सूखे को बढ़ा सकती है, जबकि कुछ इलाकों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा कर सकती है।
इसके अलावा वैश्विक तापमान पहले से ही रिकॉर्ड स्तरों के आसपास बना हुआ है। ऐसे में यदि अल नीनो के कारण अतिरिक्त गर्मी जुड़ती है तो हीटवेव, जंगल की आग, जल संकट और चरम मौसम की घटनाओं का खतरा और बढ़ सकता है।
भारत के मॉनसून पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर निर्भर है। देश के बड़े हिस्से में खरीफ फसलों की बुवाई जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश पर आधारित होती है।
इतिहास बताता है कि कई अल नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम बारिश का सामना करना पड़ा है। हालांकि हर बार ऐसा नहीं होता, लेकिन कमजोर मॉनसून की संभावना बढ़ जाती है।
यदि इस बार अल नीनो प्रभावी होता है और बारिश सामान्य से कम रहती है तो धान, दालें, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा असर खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?
कम बारिश का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वहां उत्पादन में गिरावट का खतरा बढ़ जाता है।
विशेष रूप से अरहर, उड़द, मूंग और अन्य दालों की खेती वर्षा पर काफी निर्भर करती है। यदि उत्पादन प्रभावित होता है तो बाजार में आपूर्ति घट सकती है और कीमतों में तेजी आ सकती है।
इसी संभावना को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों के साथ मिलकर आकस्मिक योजनाओं पर काम शुरू कर दिया है। इनमें वैकल्पिक फसलें, कम पानी वाली किस्में और सिंचाई प्रबंधन जैसे उपाय शामिल हैं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि मॉनसून कमजोर रहता है तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। खाद्यान्न उत्पादन घटने पर खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। दाल, सब्जियां, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
हालांकि सरकार का दावा है कि 43 लाख टन का बफर स्टॉक ऐसी स्थिति में बाजार को स्थिर रखने में मदद करेगा। जरूरत पड़ने पर इस स्टॉक को बाजार में उतारकर आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है और कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है।
यही कारण है कि सरकार इस भंडार को रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में देख रही है।
क्या दालें लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती हैं?
दालों के भंडारण को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं कि क्या इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। सरकार का कहना है कि उचित परिस्थितियों में दालों को दो से तीन वर्षों तक सुरक्षित रूप से संग्रहीत किया जा सकता है।
आधुनिक वेयरहाउस और वैज्ञानिक भंडारण तकनीकों के कारण बड़े पैमाने पर स्टॉक बनाए रखना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है।
आगे क्या हो सकता है?
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि अल नीनो की स्थिति और मजबूत होती है तो मॉनसून, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर इसका असर दिखाई दे सकता है। दूसरी ओर यदि मॉनसून अपेक्षा से बेहतर रहता है तो जोखिम काफी हद तक कम हो सकता है।
फिलहाल सरकार, मौसम एजेंसियां और कृषि विशेषज्ञ लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। 43 लाख टन दालों का रिकॉर्ड बफर स्टॉक यह संकेत देता है कि संभावित संकट से निपटने के लिए तैयारी पहले ही शुरू की जा चुकी है।
निष्कर्ष
अल नीनो का खतरा केवल मौसम तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसका असर कृषि, खाद्य सुरक्षा, महंगाई और आम लोगों के बजट तक पहुंच सकता है। WMO की चेतावनी ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है। हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह है कि सरकार ने रिकॉर्ड दाल भंडार तैयार कर रखा है। यदि मॉनसून प्रभावित होता है और बाजार में आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है तो यही बफर स्टॉक देश की खाद्य सुरक्षा और कीमतों की स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।


