भारत की प्रमुख गोल्ड रिफाइनिंग और ज्वेलरी निर्यातक कंपनियों में शामिल Rajesh Exports इन दिनों गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कंपनी और उसके प्रमोटर-चेयरमैन राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करते हुए वित्तीय अनियमितताओं, राजस्व के कथित गलत खुलासे और कंपनी के फंड के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
HighLights
- SEBI ने Rajesh Exports पर 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाया।
- चेयरमैन और एमडी राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी।
- फोरेंसिक ऑडिट में विदेशी सहायक कंपनियों के रिकॉर्ड और घोषित राजस्व में बड़ा अंतर मिला।
- कंपनी के फंड के कथित दुरुपयोग और अफ्रीका में निवेश को लेकर भी सवाल।
- LIC समेत लाखों निवेशकों की हिस्सेदारी दांव पर।
सबसे बड़ा आरोप 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित Revenue Gap को लेकर है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसने बाजार, निवेशकों और कॉरपोरेट जगत में हलचल मचा दी है। हालांकि कंपनी के चेयरमैन राजेश मेहता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि SEBI का आदेश अंतरिम है और कंपनी जल्द ही अपना पक्ष रखेगी।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर SEBI की जांच में ऐसा क्या मिला कि देश की सबसे चर्चित गोल्ड कंपनियों में से एक पर इतनी बड़ी कार्रवाई करनी पड़ी? आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
क्या करती है Rajesh Exports?
बेंगलुरु स्थित Rajesh Exports सोने के आभूषणों के निर्माण, निर्यात और गोल्ड रिफाइनिंग के कारोबार में सक्रिय है। कंपनी का नाम वैश्विक गोल्ड इंडस्ट्री में जाना जाता है और कई वर्षों तक यह राजस्व के आधार पर भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में गिनी जाती रही है।
कंपनी की अंतरराष्ट्रीय पहचान उसकी स्विट्जरलैंड स्थित सहायक कंपनी Valcambi SA के कारण भी है। Valcambi दुनिया की प्रमुख गोल्ड रिफाइनरियों में से एक मानी जाती है और इसे Rajesh Exports ने वर्षों पहले अधिग्रहित किया था।
मामला शुरू कैसे हुआ?
इस पूरे विवाद की शुरुआत मार्च 2024 में हुई जब SEBI को एक शेयरधारक की ओर से शिकायत प्राप्त हुई। शिकायत में कंपनी की बैलेंस शीट में दिखाई गई बड़ी व्यापार प्राप्तियों (Trade Receivables) पर सवाल उठाए गए थे।
आरोप था कि कंपनी की बड़ी रकम दो वर्षों से अधिक समय तक बकाया दिखाई जा रही थी। आमतौर पर इतनी लंबी अवधि तक बकाया रहने वाली प्राप्तियां किसी भी कंपनी के वित्तीय स्वास्थ्य को लेकर चिंता पैदा करती हैं। इससे यह आशंका भी पैदा होती है कि कहीं कंपनी अपने वास्तविक वित्तीय आंकड़ों को छिपाने की कोशिश तो नहीं कर रही।
शिकायत मिलने के बाद SEBI ने प्रारंभिक जांच शुरू की और बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत जांच का आदेश दिया।
फोरेंसिक ऑडिट में क्या मिला?
अक्टूबर 2024 में SEBI ने मामले की गहन जांच के लिए एक जांच प्राधिकरण नियुक्त किया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ऑडिट फर्म BDO को फोरेंसिक ऑडिट का जिम्मा सौंपा गया।
फोरेंसिक ऑडिट के दौरान कंपनी और उसकी विदेशी सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड, बिक्री के आंकड़े, ग्राहकों की जानकारी और अन्य दस्तावेजों की जांच की गई।
जांच के दौरान ऑडिटर्स को घोषित राजस्व और वास्तविक रिकॉर्ड में बड़ा अंतर दिखाई दिया। यहीं से पूरे विवाद ने बड़ा रूप ले लिया।
आखिर 15.15 लाख करोड़ रुपये का अंतर कैसे सामने आया?
SEBI के अनुसार वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2025 के बीच Rajesh Exports की 97% से 99% तक आय विदेशी सहायक कंपनियों से आई बताई गई थी।
सबसे महत्वपूर्ण भूमिका Valcambi SA की थी। यह कंपनी समूह के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का मुख्य आधार मानी जाती है।
जब ऑडिटर्स ने Valcambi और अन्य विदेशी इकाइयों के रिकॉर्ड की जांच की, तब पाया गया कि समूह द्वारा घोषित कुल राजस्व और उपलब्ध दस्तावेजों से सत्यापित राजस्व के बीच भारी अंतर है।
SEBI का आरोप है कि पांच वर्षों के दौरान यह अंतर कुल मिलाकर 15.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसी कथित Revenue Gap को लेकर नियामक ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
Revenue Gap का मतलब क्या है?
कई निवेशक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि Revenue Gap आखिर होता क्या है।
सरल भाषा में कहें तो यदि कोई कंपनी अपने वित्तीय विवरणों में जितनी बिक्री या आय दिखाती है, उसे रिकॉर्ड, बिल, ग्राहकों या सहायक कंपनियों के दस्तावेजों से सत्यापित नहीं किया जा सके तो इसे Revenue Mismatch या Revenue Gap कहा जाता है।
यह जरूरी नहीं कि पूरी राशि नकद रूप में गायब हो, लेकिन इतना बड़ा अंतर कंपनी की रिपोर्टिंग और वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जांच में सहयोग न करने के भी आरोप
SEBI ने अपने आदेश में कहा है कि जांच के दौरान कंपनी ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए।
फोरेंसिक ऑडिटर को कथित रूप से ग्राहकों की पूरी सूची, विक्रेताओं का विवरण, कुछ सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य आवश्यक दस्तावेज समय पर नहीं मिले।
नियामक का कहना है कि इससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हुई और कई सवालों के जवाब नहीं मिल सके।
सिर्फ Revenue Gap ही नहीं, 1035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी सवाल
SEBI की जांच केवल राजस्व तक सीमित नहीं रही।
नियामक ने अफ्रीका में स्थित गोल्ड माइनिंग प्रॉपर्टीज में किए गए लगभग 1035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी सवाल उठाए हैं। जांच एजेंसी यह समझने की कोशिश कर रही है कि इन निवेशों का वास्तविक मूल्यांकन क्या था और क्या इनसे जुड़े सभी खुलासे सही तरीके से किए गए थे।
क्या कंपनी का पैसा निजी ट्रेडिंग में इस्तेमाल हुआ?
SEBI के आदेश में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है।
नियामक का कहना है कि कंपनी के कुछ फंड प्रमोटर राजेश मेहता से जुड़े खातों में ट्रांसफर किए गए। आरोप है कि बाद में इन पैसों का उपयोग व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग गतिविधियों में किया गया।
जांच में लगभग 7.4 करोड़ रुपये के लेन-देन का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि बाद में इस राशि का एक हिस्सा कंपनी को वापस लौटा दिया गया था।
यदि ये आरोप साबित होते हैं तो यह कॉरपोरेट गवर्नेंस और निवेशकों के हितों से जुड़ा बड़ा मामला बन सकता है।
Canara Bank का कर्ज भी बना चिंता का कारण
Rajesh Exports पहले से ही वित्तीय दबाव का सामना कर रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कर्ज चुकाने में चूक के बाद Canara Bank ने कंपनी के लगभग 509 करोड़ रुपये के ऋण को तनावग्रस्त परिसंपत्ति (Stressed Asset) के रूप में वर्गीकृत किया है।
इसके बाद बैंक ने इस ऋण को बेचने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति को लेकर बाजार की चिंताएं और बढ़ गई हैं।
LIC समेत लाखों निवेशकों की चिंता क्यों बढ़ी?
इस मामले का असर केवल प्रमोटर्स या कंपनी तक सीमित नहीं है।
Rajesh Exports में देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC की लगभग 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके अलावा हजारों रिटेल निवेशकों ने भी कंपनी के शेयरों में निवेश कर रखा है।
यही कारण है कि SEBI की कार्रवाई के बाद कंपनी के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली और निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई।
आगे क्या होगा?
फिलहाल SEBI का आदेश अंतरिम है और जांच अभी जारी है। अंतिम निष्कर्ष आने में समय लग सकता है।
आने वाले महीनों में SEBI कंपनी के जवाब, उपलब्ध दस्तावेजों और फोरेंसिक ऑडिट की विस्तृत रिपोर्ट का अध्ययन करेगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कंपनी और प्रमोटर्स के खिलाफ भारी जुर्माना, बाजार प्रतिबंध और अन्य नियामकीय कार्रवाई हो सकती है।
दूसरी ओर कंपनी ने आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि वह नियामक के समक्ष अपना पक्ष रखेगी।
निष्कर्ष
Rajesh Exports का मामला सिर्फ एक कंपनी की वित्तीय गड़बड़ी का मामला नहीं है, बल्कि यह कॉरपोरेट गवर्नेंस, पारदर्शिता और निवेशकों के भरोसे से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित Revenue Gap, फोरेंसिक ऑडिट की टिप्पणियों और कंपनी फंड के उपयोग को लेकर लगे आरोपों ने बाजार को चौंका दिया है।
अब सभी की निगाहें SEBI की अंतिम जांच रिपोर्ट और कंपनी के जवाब पर टिकी हैं। आने वाले समय में यह मामला भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी नियामकीय जांचों में से एक साबित हो सकता है।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है। शेयर बाजार और आईपीओ में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।


