नई दिल्ली। जब भी भारी उद्योगों और खनन कंपनियों की बात होती है, तब अक्सर पर्यावरण पर उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठते हैं। लेकिन भारत के प्रमुख औद्योगिक समूहों में शामिल वेदांता ग्रुप ने इस धारणा को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कंपनी के लौह अयस्क खनन और इस्पात कारोबार ने पिछले पांच वर्षों में विभिन्न स्थिरता और पर्यावरण संरक्षण पहलों के जरिए लगभग 25 लाख टन कार्बन उत्सर्जन को कम या अवशोषित करने का दावा किया है।
Highlights
- वेदांता ग्रुप ने 5 वर्षों में करीब 25 लाख टन कार्बन उत्सर्जन कम या अवशोषित किया।
- जलमार्ग परिवहन से 2.1 लाख ट्रक यात्राओं के बराबर डीजल की बचत हुई।
- गोवा और झारखंड में लाखों पेड़ लगाकर बड़े स्तर पर कार्बन अवशोषण किया गया।
- अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति परियोजनाओं से 100 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता विकसित हुई।
- स्वच्छ ऊर्जा और हरित तकनीक अपनाकर कंपनी ने डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में बड़ा कदम उठाया।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जारी बयान में कंपनी ने बताया कि नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ औद्योगिक प्रक्रियाओं, जलमार्ग आधारित परिवहन और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण जैसी पहलों ने इस उपलब्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पहल भारत के नेट-जीरो और जलवायु परिवर्तन संबंधी लक्ष्यों के अनुरूप भी मानी जा रही है।
आखिर 25 लाख टन कार्बन उत्सर्जन कम करना कितना बड़ा आंकड़ा है?
कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करना आज दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। विशेषज्ञों के अनुसार लाखों टन कार्बन उत्सर्जन में कमी का अर्थ है कि वातावरण में जाने वाली ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा कम हुई, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
वेदांता के अनुसार यह उपलब्धि किसी एक परियोजना से नहीं बल्कि कई वर्षों से चल रही विभिन्न पर्यावरणीय पहलों का संयुक्त परिणाम है। कंपनी ने ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, स्वच्छ ईंधन अपनाने और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन कार्यक्रमों के जरिए यह लक्ष्य हासिल किया है।
जलमार्ग परिवहन से हुई बड़ी बचत
कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जलमार्ग आधारित परिवहन प्रणाली अपनाने से लगभग 2.1 लाख ट्रक यात्राओं के बराबर सड़क परिवहन कम हुआ।
इस कदम से:
- लगभग 1.08 करोड़ लीटर डीजल की बचत हुई।
- करीब 28,900 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हुआ।
- सड़क परिवहन से होने वाले प्रदूषण और ट्रैफिक दबाव में भी कमी आई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे बड़े देश में जलमार्ग परिवहन को बढ़ावा देना लॉजिस्टिक्स लागत कम करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता उपयोग
वेदांता ने अपने संचालन में इलेक्ट्रिक यात्री वाहन, इलेक्ट्रिक व्हील लोडर और फोर्कलिफ्ट जैसे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाया है।
कंपनी के अनुसार इससे हर साल लगभग 800 किलोलीटर डीजल की बचत हो रही है। डीजल खपत में कमी का सीधा असर कार्बन उत्सर्जन पर पड़ता है और यही कारण है कि इलेक्ट्रिफिकेशन को डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
अपशिष्ट ऊष्मा से बिजली उत्पादन
वेदांता की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति (Waste Heat Recovery) परियोजना रही है।
गोवा के अमोना स्थित पिग आयरन प्लांट और झारखंड के बोकारो इस्पात संयंत्र में कंपनी ने कुल 100 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता विकसित की है।
इस पहल के कारण:
- अतिरिक्त ईंधन की आवश्यकता कम हुई।
- ऊर्जा दक्षता बढ़ी।
- लगभग 2.4 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से बचाव हुआ।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारी उद्योगों में वेस्ट हीट रिकवरी तकनीक को कार्बन उत्सर्जन घटाने का प्रभावी उपाय माना जाता है।
लाखों पेड़ बन रहे कार्बन सिंक
कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ वेदांता ने कार्बन अवशोषण पर भी बड़ा ध्यान दिया है।
गोवा की संक्वेलिम पुनर्वास खदान में 100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में लगभग 7.5 लाख पेड़ लगाए गए हैं। कंपनी का दावा है कि यह क्षेत्र हर साल लगभग 16,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है।
पिछले तीन दशकों में यह क्षेत्र करीब 4.8 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर चुका है।
इसके अलावा:
- गोवा और बोकारो में मियावाकी पद्धति से घने वन विकसित किए गए।
- 75,000 से अधिक पेड़ लगाए गए।
- नियमित वृक्षारोपण अभियानों के तहत 3 लाख अतिरिक्त पौधे लगाए गए।
एलपीजी से प्राकृतिक गैस की ओर बढ़ रही कंपनी
बोकारो स्थित 15 लाख टन क्षमता वाले एकीकृत इस्पात संयंत्र में कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के साथ मिलकर एलपीजी की जगह पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) अपनाने की दिशा में काम कर रही है।
कंपनी के अनुसार इस बदलाव से हर साल लगभग 1,500 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होने की संभावना है।
प्राकृतिक गैस को पारंपरिक ईंधनों की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है और कई उद्योग अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
भारत के जलवायु लक्ष्यों में कैसे मदद मिलेगी?
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए उद्योगों, ऊर्जा कंपनियों और खनन क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वेदांता जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा अपनाई जा रही हरित तकनीकें और पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम भारत के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में सहायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अन्य औद्योगिक समूह भी इसी प्रकार की पहल करते हैं तो देश के कुल औद्योगिक कार्बन फुटप्रिंट में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
क्या कहा कंपनी के सीईओ ने?
वेदांता आयरन एंड स्टील लिमिटेड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) पंकज कुमार शर्मा ने कहा कि टिकाऊ भविष्य के निर्माण के लिए उद्योगों को ऊर्जा उपयोग, परिवहन व्यवस्था और पर्यावरण के साथ अपने संबंधों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
उन्होंने कहा कि कंपनी का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का पालन करते हुए दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना भी है।
निष्कर्ष
वेदांता का दावा है कि पिछले पांच वर्षों में लगभग 25 लाख टन कार्बन उत्सर्जन कम या अवशोषित किया गया है। इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग, जलमार्ग परिवहन, वेस्ट हीट रिकवरी, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और स्वच्छ ईंधन की ओर बढ़ते कदम इस उपलब्धि के प्रमुख आधार रहे हैं। ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है, उद्योग जगत की इस तरह की पहलें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मानी जा सकती हैं।


