अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार गिरावट देखने को मिली। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बाद निवेशकों ने राहत की सांस ली, जिससे ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसल गया। इससे पहले युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के कारण तेल की कीमतें 115 डॉलर तक पहुंच गई थीं।
भारतीय समयानुसार सुबह करीब 10:30 बजे ब्रेंट क्रूड लगभग 5.60% टूटकर 97.74 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड 5.82% की गिरावट के साथ करीब 90.98 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। पिछले दो हफ्तों में यह सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।
तेल बाजार में आई इस नरमी ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को राहत की उम्मीद दी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी खतरा पूरी तरह टला नहीं है और पश्चिम एशिया की स्थिति दोबारा बिगड़ने पर कीमतों में फिर तेज उछाल आ सकता है।
आखिर अचानक क्यों गिर गया कच्चे तेल का भाव?
तेल बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक बातचीत को माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा था कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति समझौते के लिए एक सहमति पत्र (MoU) पर काफी हद तक बातचीत पूरी हो चुकी है।
इसी बयान के बाद बाजार में यह उम्मीद बढ़ गई कि होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से पूरी तरह खुल सकता है। यही वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल और LNG की सप्लाई गुजरती है। युद्ध और तनाव के कारण इस मार्ग पर लगातार खतरा बना हुआ था, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई थी।
जैसे ही बाजार को संकेत मिला कि सप्लाई दोबारा सामान्य हो सकती है, ट्रेडर्स ने तेजी से बिकवाली शुरू कर दी और तेल की कीमतें नीचे आ गईं।
फिर भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ संकट
हालांकि तेल की कीमतों में आई गिरावट ने बाजार को कुछ राहत दी है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञ अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनका कहना है कि केवल समझौते की खबर से सप्लाई तुरंत सामान्य नहीं हो जाएगी।
ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी सऊदी अरामको के CEO अमीन नासिर ने हाल ही में कहा था कि होर्मुज संकट के कारण वैश्विक तेल बाजार को स्थिर होने में 2027 तक का समय लग सकता है। उनके मुताबिक इस संकट से हर सप्ताह करीब 100 मिलियन बैरल तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है।
ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली का भी मानना है कि तेल बाजार अभी बेहद संवेदनशील स्थिति में है। अगर जून के बाद भी होर्मुज जलमार्ग में व्यवधान जारी रहता है, तो वैश्विक बाजार में फिर से भारी तेल संकट पैदा हो सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार अभी जो गिरावट दिख रही है, वह मुख्य रूप से “शांति की उम्मीद” पर आधारित है, न कि पूरी तरह सामान्य हुई सप्लाई पर।
115 डॉलर तक पहुंच गया था ब्रेंट क्रूड
ईरान संकट शुरू होने के बाद मई की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। उस समय बाजार में यह डर था कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक प्रभावित रहा, तो दुनिया भर में तेल की भारी कमी हो सकती है।
युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगभग 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच थीं। यानी कुछ ही हफ्तों में कीमतों में लगभग दोगुनी तेजी देखने को मिली थी। हालांकि 4 मई से 25 मई के बीच ब्रेंट क्रूड में करीब 15% की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन यह अब भी युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर से काफी ऊपर बना हुआ है।
भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर गिरावट सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर असर डालती है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है, महंगाई बढ़ती है, रुपये पर दबाव आता है, सरकार का आयात बिल बढ़ जाता है लेकिन अब कीमतों में गिरावट से भारतीय तेल कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है। पिछले कुछ हफ्तों से IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों पर भारी दबाव था क्योंकि उन्हें महंगा तेल खरीदना पड़ रहा था।
इसी घाटे को कम करने के लिए सोमवार को फिर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए गए। यह इस साल चौथी बढ़ोतरी मानी जा रही है। अगर आने वाले दिनों में ब्रेंट क्रूड लगातार 100 डॉलर से नीचे बना रहता है, तो पेट्रोल-डीजल कीमतों में स्थिरता आ सकती है आगे बढ़ोतरी रुक सकती है, महंगाई पर दबाव कम हो सकता है, शेयर बाजार को सपोर्ट मिल सकता है, रुपये को मजबूती मिल सकती है
शेयर बाजार पर क्या असर पड़ा?
तेल की कीमतों में गिरावट का असर भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला। सस्ता कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पॉजिटिव माना जाता है क्योंकि इससे कंपनियों की लागत घटती है। सोमवार को एयरलाइन शेयरों में तेजी देखी गई पेंट और केमिकल कंपनियों में खरीदारी बढ़ी ऑटो सेक्टर को सपोर्ट मिला OMC शेयरों में राहत की उम्मीद बनी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर क्रूड 90-95 डॉलर के बीच स्थिर रहता है, तो भारतीय बाजार के लिए यह बड़ा सकारात्मक संकेत हो सकता है।
क्या पेट्रोल-डीजल सस्ता हो सकता है?
फिलहाल तुरंत कीमतें घटने की संभावना कम दिख रही है क्योंकि तेल कंपनियां पहले हुए नुकसान की भरपाई करना चाहेंगी। लेकिन अगर तेल लंबे समय तक सस्ता रहता है, होर्मुज संकट कम होता है डॉलर में नरमी आती है तो आने वाले महीनों में आम लोगों को राहत मिल सकती है।
हालांकि अगर पश्चिम एशिया में तनाव दोबारा बढ़ता है, तो तेल फिर 110-120 डॉलर की तरफ जा सकता है। इसलिए बाजार अभी भी काफी अनिश्चित बना हुआ है।
निष्कर्ष
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह बड़ी गिरावट फिलहाल वैश्विक बाजार के लिए राहत भरी खबर है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते ने निवेशकों का डर कुछ हद तक कम किया है। भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
तेल बाजार अभी भी पश्चिम एशिया की स्थिति, होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक सप्लाई पर निर्भर बना हुआ है। आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि यह राहत अस्थायी है या वास्तव में दुनिया बड़ा तेल संकट टालने में सफल रही है।
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