“Work minus gigs equals less giggles” — यह वाक्य भले ही हल्के अंदाज़ में कहा गया हो, लेकिन यह भारत की गिग इकॉनमी की गंभीर वास्तविकताओं की ओर इशारा करता है। हाल के वर्षों में गिग वर्कर्स पर हुए विरोध, नए नियमों और बढ़ती बहसों ने इस पूरे सेक्टर को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। डिलीवरी ऐप्स, राइड-शेयरिंग सेवाएं और डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित काम ने रोजगार की परिभाषा बदल दी है, लेकिन इसके साथ ही कई सामाजिक और आर्थिक सवाल भी खड़े हुए हैं।
गिग वर्कर्स की जिंदगी को अक्सर एक “सामाजिक-आर्थिक परत” के पीछे छिपा हुआ माना जाता है, जिसे पूरी तरह समझना आसान नहीं है। कई शोधकर्ताओं का मानना है कि केवल दूर से देखने या छोटे इंटरव्यू के आधार पर उनकी वास्तविक स्थिति को समझा नहीं जा सकता। इसी वजह से अब लंबे समय तक चलने वाले एथनोग्राफिक अध्ययन किए जा रहे हैं, जिनमें शोधकर्ता गिग वर्कर्स के साथ 24 घंटे तक रहते हैं ताकि उनकी वास्तविक चुनौतियों को समझा जा सके।
कर्नाटक में किए गए एक सर्वे, जिसमें 1,355 कर्मचारियों को शामिल किया गया, ने इस बहस को और जटिल बना दिया है। सर्वे के अनुसार अधिकांश लोग यह मानते हैं कि गिग वर्कर्स को कम वेतन मिलता है और उनकी आय हर महीने बदलती रहती है क्योंकि यह पूरी तरह डिलीवरी वॉल्यूम और कमीशन पर आधारित होती है। यही कारण है कि हाल ही में बेंगलुरु सहित कई शहरों में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले।
हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि उसी सर्वे में लगभग 95 प्रतिशत गिग वर्कर्स ने अपनी आय को लेकर संतुष्टि जताई। यह आंकड़ा पहली नजर में विरोधाभासी लगता है, लेकिन इसका कारण यह है कि गिग वर्क केवल अतिरिक्त आय का स्रोत नहीं है, बल्कि अधिकांश लोगों के लिए यह मुख्य आय का साधन बन चुका है। लगभग 84 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनकी मुख्य कमाई इसी काम से होती है।
इसका मतलब यह है कि बड़े शहरों जैसे बेंगलुरु में कुछ लोग असंतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन छोटे शहरों में स्थिति अलग है, जहां रोजगार के विकल्प सीमित हैं। वहां गिग वर्क अपेक्षाकृत स्थिर और उपलब्ध अवसर के रूप में देखा जाता है। भले ही इसमें सामाजिक सुरक्षा नहीं है और काम के दौरान कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जैसे गर्मी या सर्दी में लगातार बाहर रहना, फिर भी यह कई लोगों के लिए स्थिर आय का माध्यम बन गया है।
गिग इकॉनमी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह पारंपरिक 9-to-5 नौकरी से अलग स्वतंत्रता और लचीलापन प्रदान करती है। लोग अपनी सुविधा के अनुसार काम कर सकते हैं और विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर स्विच कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, डिलीवरी सेक्टर में बढ़ती 10-मिनट क्विक कॉमर्स सेवा ने प्रतिस्पर्धा को काफी बढ़ा दिया है, जिससे काम की उपलब्धता तो बढ़ी है, लेकिन दबाव भी बढ़ा है।
इस प्रतिस्पर्धा के कारण गिग वर्कर्स अक्सर एक ऐप से दूसरे ऐप पर तेजी से शिफ्ट करते हैं ताकि बेहतर कमाई कर सकें। नौकरी बदलने की यह प्रवृत्ति इस सेक्टर की एक खास विशेषता बन गई है। कई वर्कर्स कुछ महीनों या यहां तक कि कुछ हफ्तों में ही प्लेटफॉर्म बदल देते हैं, जिससे उनका औसत रोजगार काल काफी छोटा हो जाता है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गिग वर्क एक “करियर जंपिंग प्लेटफॉर्म” की तरह काम करता है, जहां लोग अस्थायी रूप से आते हैं और फिर बेहतर अवसर मिलने पर आगे बढ़ जाते हैं। कई उदाहरण यह भी दिखाते हैं कि गिग वर्क से शुरू करके लोग बाद में तकनीकी और उच्च स्तरीय नौकरियों तक पहुंच चुके हैं। यह इस बात का संकेत है कि यह मॉडल कई लोगों के लिए एक संक्रमणकालीन चरण है।
हालांकि, इस व्यवस्था की सबसे बड़ी चिंता बचत और सामाजिक सुरक्षा को लेकर है। सर्वे में यह सामने आया कि आधे से अधिक गिग वर्कर्स के पास कोई बचत नहीं है। यह स्थिति इसलिए चिंताजनक मानी जाती है क्योंकि इस सेक्टर में कोई पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या स्थायी सुरक्षा व्यवस्था मौजूद नहीं है। फिर भी, कई विशेषज्ञ यह मानते हैं कि चूंकि अधिकांश गिग वर्कर्स युवा हैं, इसलिए उनके पास भविष्य में वित्तीय स्थिरता बनाने का समय है।
इस पूरी बहस में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामाजिक सोच का है। पहले गिग वर्क को कम सम्मान वाली नौकरी माना जाता था, लेकिन अब धीरे-धीरे इसे एक वैध और सामान्य रोजगार विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। श्रम कानूनों में सुधार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने इस धारणा को बदलने में मदद की है।
नई पीढ़ी, विशेष रूप से Gen Z, अब पारंपरिक नौकरियों की बजाय फ्रीलांस, लचीले और मल्टीपल इनकम वाले कामों को प्राथमिकता दे रही है। उनके लिए काम केवल आय का साधन नहीं बल्कि जीवनशैली और मानसिक संतुलन का हिस्सा भी है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह लचीलापन लंबे समय तक उनके लिए स्थिरता प्रदान करेगा या नहीं।
गिग इकॉनमी को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह भारत की रोजगार समस्या का स्थायी समाधान है या केवल एक अस्थायी विकल्प। देश में योग्य और शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियों की कमी भी इस मॉडल को बढ़ावा दे रही है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल सर्वेक्षण गिग वर्कर्स की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शा सकते। कई बार लोग सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार जवाब देते हैं, न कि अपनी वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर। इसलिए इस क्षेत्र को समझने के लिए गहरी और लंबे समय तक चलने वाली फील्ड स्टडी की जरूरत है।
हालांकि, धीरे-धीरे एक सकारात्मक बदलाव भी देखा जा रहा है। समाज अब गिग वर्कर्स के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहा है। कई लोग अब उन्हें बेहतर टिप्स दे रहे हैं और उनके काम को अधिक सम्मान के साथ देख रहे हैं। यह बदलाव इस सेक्टर की सामाजिक स्वीकार्यता को बढ़ा रहा है।
कुल मिलाकर, गिग इकॉनमी एक ऐसी व्यवस्था है जो स्वतंत्रता और अस्थिरता दोनों को साथ लेकर चलती है। यह लाखों लोगों को रोजगार देती है, लेकिन साथ ही कई चुनौतियां भी पैदा करती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मॉडल अधिक सुरक्षित, संरचित और संतुलित बन पाता है या फिर यह केवल एक अस्थायी आर्थिक समाधान बनकर रह जाता है।
Also Read:


