Insurance Claim Consumer Commission Nagpur: बीमा पॉलिसी खरीदते समय अगर पॉलिसीधारक ने अपनी शराब पीने की आदत की जानकारी पहले ही दे दी है, तो केवल इसी आधार पर बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता। नागपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ऐसे ही एक मामले में बीमा कंपनी को बड़ा झटका दिया है। आयोग ने कंपनी को मृतक की पत्नी को 50 लाख रुपये की बीमा दावा राशि देने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा कंपनी को 30 सितंबर 2023 से 9 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। आयोग ने मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के लिए 10 हजार रुपये तथा कानूनी खर्च के तौर पर 10 हजार रुपये अतिरिक्त भुगतान करने का भी आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला महाराष्ट्र के नागपुर का है। जानकारी के मुताबिक, शिकायतकर्ता के पति ने अप्रैल 2021 में एडलवाइस टोकियो लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। पॉलिसी जारी होने से पहले उनका मेडिकल परीक्षण भी कराया गया था।
इसके बाद 26 जनवरी 2023 को अचानक उनकी मौत हो गई। पति की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने बीमा कंपनी के सामने पॉलिसी के तहत क्लेम पेश किया।
हालांकि, बीमा कंपनी ने इस दावे को स्वीकार करने के बजाय उसे खारिज कर दिया। इतना ही नहीं, कंपनी ने पॉलिसी को भी रद्द कर दिया और सितंबर 2023 में करीब 18,713 रुपये के प्रीमियम रिफंड का चेक भेज दिया।
कंपनी के इस फैसले के बाद महिला ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, नागपुर का दरवाजा खटखटाया और बीमा राशि के साथ मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजे की मांग की।
बीमा कंपनी ने क्लेम क्यों किया रिजेक्ट?
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने दावा किया कि मृतक ने अपनी कुछ स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां और लंबे समय से चली आ रही शराब की आदत के बारे में सही जानकारी नहीं दी थी।
कंपनी का तर्क था कि मृतक लंबे समय से शराब का सेवन करते थे। इसके अलावा उन्हें हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की समस्या भी थी, जिसकी जानकारी कथित तौर पर पॉलिसी लेते समय नहीं दी गई थी।
बीमा कंपनी ने इन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर बीमा क्लेम को खारिज किया था।
मेडिकल फॉर्म में पहले से दर्ज थी शराब की आदत
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के सामने महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किए गए। आयोग ने पाया कि 20 मई 2021 को पॉलिसी जारी होने से पहले जमा किए गए मेडिकल टेस्ट फॉर्म में शराब के सेवन का उल्लेख पहले से मौजूद था।
दस्तावेज में दर्ज था कि पॉलिसीधारक पिछले करीब 15 वर्षों से महीने में दो बार लगभग 90 मिलीलीटर व्हिस्की का सेवन करते थे।
यानी बीमा कंपनी के पास पॉलिसी जारी करने से पहले ही पॉलिसीधारक की शराब पीने की आदत की जानकारी मौजूद थी। इसके बावजूद बाद में इसी आधार पर क्लेम को खारिज करना आयोग को उचित नहीं लगा।
मेडिकल जांच में हाई BP और डायबिटीज का भी नहीं मिला जिक्र
आयोग ने यह भी गौर किया कि बीमा कंपनी के पैनल डॉक्टर की ओर से किए गए प्री-पॉलिसी मेडिकल टेस्ट में हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज का कोई उल्लेख नहीं था।
आयोग ने इसी आधार पर बीमा कंपनी के उस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि पॉलिसीधारक ने जानबूझकर अपनी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी छिपाई थी।
आयोग ने कहा कि जब बीमा कंपनी के पास पॉलिसी जारी करने से पहले मेडिकल जांच और संबंधित जानकारी मौजूद थी, तो बाद में उसी जानकारी के आधार पर वैध बीमा दावे को खारिज करना उचित नहीं है।
आयोग ने क्लेम रिजेक्ट करने को माना ‘सेवा में कमी’
जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में बीमा कंपनी को सेवा में कमी का दोषी माना। आयोग के मुताबिक, पॉलिसी लेने से पहले शराब के सेवन की जानकारी स्पष्ट रूप से दिए जाने के बावजूद कंपनी ने बीमा दावे को खारिज कर दिया।
आयोग ने यह भी माना कि केवल शराब के सेवन की आदत के आधार पर वैध बीमा दावे को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब यह जानकारी पॉलिसी जारी होने से पहले ही बीमा कंपनी के रिकॉर्ड में मौजूद थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
सुनवाई के दौरान आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें हाइपरटेंशन और डायबिटीज मेलिटस को लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के रूप में देखा गया है।
आयोग के अनुसार, केवल पहले से मौजूद ऐसी स्वास्थ्य स्थितियों का उल्लेख न होने के आधार पर हर मामले में जीवन बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, प्रत्येक बीमा विवाद का फैसला उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है।
कंपनी को देने होंगे ₹50 लाख और ब्याज
मामले में फैसला सुनाते हुए नागपुर जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को शिकायतकर्ता महिला को 50 लाख रुपये की दावा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही कंपनी को 30 सितंबर 2023 से 9 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
आयोग ने महिला को हुए शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के लिए 10,000 रुपये मुआवजा तथा कानूनी कार्यवाही के खर्च के लिए 10,000 रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया।
फैसले से क्या समझें?
इस मामले से यह महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि बीमा पॉलिसी लेते समय दी गई जानकारी और बीमा कंपनी के मेडिकल रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अगर किसी आदत या स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी पॉलिसी जारी होने से पहले ही कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज है, तो बाद में उसी आधार पर क्लेम खारिज करने का फैसला उपभोक्ता आयोग की जांच के दायरे में आ सकता है।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हर स्थिति में शराब का सेवन या पहले से मौजूद बीमारी बताना जरूरी नहीं है। बीमा पॉलिसी लेते समय अपनी स्वास्थ्य संबंधी सभी महत्वपूर्ण जानकारियां ईमानदारी से देना बेहद जरूरी है। गलत या अधूरी जानकारी देने पर अलग परिस्थितियों में बीमा दावा प्रभावित हो सकता है।


