Agriculture Policy: भारत में इथेनॉल उत्पादन और ब्लेंडिंग को बढ़ावा देने के बीच कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कृषि नीति को लेकर कई अहम सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय संतुलन को भी प्राथमिकता देनी होगी। उनके मुताबिक, किसी दूसरे देश की कृषि या इथेनॉल नीति को बिना भारतीय परिस्थितियों का आकलन किए अपनाना लंबे समय में नुकसानदायक हो सकता है।
नई दिल्ली: कृषि नीति को लेकर कृषि विश्लेषक देविंदर शर्मा ने सरकार से व्यापक स्तर पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि कृषि से जुड़ी नीतियों का लक्ष्य सिर्फ इथेनॉल उत्पादन, फर्टिलाइजर सब्सिडी, कृषि व्यापार या उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। नीति का केंद्र किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता होना चाहिए।
द इकोनॉमिक टाइम्स डिजिटल के साथ बातचीत में शर्मा ने इथेनॉल, चीनी, मक्का, चावल, फर्टिलाइजर सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी राय रखी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर नीतियों के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन नहीं किया गया तो आज का फायदा आने वाले वर्षों में नई समस्याएं पैदा कर सकता है।
इथेनॉल को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। हालांकि, देविंदर शर्मा का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के साथ यह भी देखना जरूरी है कि इसके लिए कृषि उपज का कितना हिस्सा भोजन से हटाकर ईंधन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनके अनुसार, चीनी सेक्टर इसका एक उदाहरण है। उनका दावा है कि भारत पहले चीनी के बड़े निर्यातकों में शामिल था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। शर्मा का मानना है कि मौसम, सूखा और फसल संबंधी बीमारियों के साथ-साथ गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ना भी चीनी की उपलब्धता पर चर्चा करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उनका सवाल है कि जब कृषि उत्पादों का इस्तेमाल ईंधन के लिए बढ़ाया जा रहा है तो किसानों को इसका पर्याप्त आर्थिक लाभ मिल रहा है या नहीं।
मक्का और चावल पर भी बढ़ सकता है दबाव
इथेनॉल की चर्चा केवल गन्ने तक सीमित नहीं है। मक्का और चावल भी इथेनॉल उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। ऐसे में इन फसलों की मांग बढ़ने से खेती के पैटर्न में बदलाव की संभावना है।
शर्मा के मुताबिक, सरकार को पहले से यह तय करना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा से समझौता किए बिना कितनी कृषि उपज को ईंधन उत्पादन की ओर मोड़ा जा सकता है। अगर इस सीमा का ध्यान नहीं रखा गया तो भविष्य में खाद्य उपलब्धता, कृषि कीमतों और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।
उनका कहना है कि इथेनॉल नीति बनाते समय केवल पेट्रोलियम आयात में कमी या ऊर्जा सुरक्षा को नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें किसानों की आमदनी और देश की खाद्य जरूरतों को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
‘ब्राजील की आंख बंद करके नकल न करें’
शर्मा ने भारत की इथेनॉल रणनीति की तुलना ब्राजील से करते हुए सावधानी बरतने की बात कही है। उनका तर्क है कि भारत और ब्राजील की कृषि परिस्थितियां, पानी की उपलब्धता, फसल पैटर्न और किसानों की स्थिति अलग-अलग हैं। इसलिए किसी दूसरे देश के मॉडल को उसी रूप में भारत में लागू करना उचित नहीं होगा।
खास तौर पर धान जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों को लेकर उन्होंने चिंता जताई। अगर इथेनॉल की मांग के कारण किसानों को ऐसी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिलता है तो भूजल पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए उनके मुताबिक भारत को ऐसी इथेनॉल नीति चाहिए जिसमें ऊर्जा सुरक्षा के साथ पानी, जमीन और खाद्य सुरक्षा का संतुलन बना रहे।
किसानों को मिलना चाहिए ‘इथेनॉल प्रीमियम’
देविंदर शर्मा ने यह भी सवाल उठाया कि कृषि उपज को ईंधन उत्पादन की ओर मोड़ने का सीधा फायदा किसानों को कितना मिल रहा है।
उन्होंने मक्का का उदाहरण देते हुए कहा कि मक्का इथेनॉल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, लेकिन कई बार किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। ऐसे में अगर कृषि उत्पाद की मांग ईंधन क्षेत्र से बढ़ रही है तो किसानों को उसका अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलना चाहिए।
उनके अनुसार, किसानों को सिर्फ उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उन्हें अपनी उपज का लाभकारी मूल्य मिले।
फर्टिलाइजर सब्सिडी पर भी बदलाव की जरूरत
कृषि नीति में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा फर्टिलाइजर सब्सिडी का है। शर्मा का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में सरकार का बड़ा खर्च फर्टिलाइजर की कीमतों को नियंत्रित रखने में जाता है। इसके बावजूद किसानों को मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ को लेकर सवाल बने हुए हैं।
उनका तर्क है कि रासायनिक उर्वरकों पर लंबे समय तक निर्भरता ने पोषक तत्वों के असंतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा कई उर्वरकों के लिए भारत की आयात निर्भरता भी एक चुनौती है।
हालांकि, शर्मा का सुझाव सब्सिडी को अचानक खत्म करने का नहीं है। वह धीरे-धीरे ऐसी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ने की बात करते हैं जिसमें प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल खेती के तरीकों को बढ़ावा मिले।
उन्होंने आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक और समुदाय आधारित खेती के प्रयोगों का उदाहरण देते हुए कहा कि कम रासायनिक इनपुट के साथ भी खेती को टिकाऊ बनाया जा सकता है।
इनपुट सब्सिडी के बजाय डायरेक्ट इनकम सपोर्ट
शर्मा कृषि क्षेत्र में इनपुट आधारित सब्सिडी की जगह किसानों को सीधे आय सहायता देने की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि इससे सरकारी सहायता का लाभ सीधे किसान तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, भारत में इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती किराए पर खेती करने वाले किसानों की पहचान है। बड़ी संख्या में किसान ऐसी जमीन पर खेती करते हैं जिसका मालिकाना हक उनके पास नहीं होता। ऐसे में केवल जमीन के मालिकों के आधार पर योजनाएं तैयार करने से वास्तविक किसान बाहर रह सकते हैं।
इसलिए डायरेक्ट इनकम सपोर्ट के लिए ऐसा सिस्टम तैयार करना जरूरी होगा जो वास्तविक खेती करने वाले किसानों की पहचान कर सके।
शर्मा का यह भी मानना है कि किसानों के लिए मौजूदा प्रत्यक्ष आय सहायता को महंगाई के साथ जोड़ने पर विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह कृषि नीति को केवल बाजार कीमतों पर निर्भर रहने के बजाय किसानों की आय सुरक्षा की दिशा में ले जा सकता है।
MSP के लिए भरोसेमंद व्यवस्था जरूरी
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP को लेकर भी शर्मा ने अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि किसानों को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें उन्हें अपनी फसल के लिए न्यूनतम लाभकारी मूल्य मिलने का भरोसा हो।
उनके मुताबिक, कृषि उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह बाजार की ताकतों के भरोसे छोड़ना किसानों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। उत्पादन लागत, मौसम और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को हर फसल की पूरी खरीद करनी ही होगी। उनके अनुसार, ऐसी प्रभावी व्यवस्था बनाई जा सकती है जो किसानों को कीमतों में भारी गिरावट से सुरक्षा दे।
खेत और बाजार के बीच कीमत का बड़ा अंतर
शर्मा ने कृषि सप्लाई चेन में किसानों की हिस्सेदारी का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि कई बार उपभोक्ता जिस कीमत पर कृषि उत्पाद खरीदता है, उसका छोटा हिस्सा ही किसान तक पहुंचता है।
उन्होंने पंजाब के किन्नू किसानों का उदाहरण देते हुए कृषि उत्पादों की खेत से बाजार तक की कीमतों में अंतर की ओर ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, यह दिखाता है कि कृषि बाजारों में अभी भी ऐसे सुधारों की जरूरत है जिनसे किसान को अपनी उपज के अंतिम मूल्य में बेहतर हिस्सा मिल सके।
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अभी भी चुनौती
देविंदर शर्मा इस बात से सहमत नहीं हैं कि किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पूरी तरह हासिल हो चुका है। उनके मुताबिक, देश में कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है और कई फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन भी हुआ है, लेकिन उत्पादन बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि किसान की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी है।
उनका कहना है कि किसानों की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ उत्पादकता नहीं बल्कि उपज का सही दाम और स्थिर आय है।
उनके अनुसार, अगर किसान रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद बाजार में कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर है तो केवल उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
कृषि नीति में लॉन्ग टर्म सोच की जरूरत
देविंदर शर्मा की पूरी दलील का केंद्र यही है कि भारत को कृषि नीति बनाते समय तत्काल फायदे के बजाय लंबे समय के प्रभावों को ध्यान में रखना चाहिए।
इथेनॉल से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है, लेकिन इसके लिए कृषि उपज को भोजन से ईंधन की ओर मोड़ने के असर का आकलन भी जरूरी है। इसी तरह फर्टिलाइजर सब्सिडी किसानों को राहत दे सकती है, लेकिन मिट्टी और पर्यावरण पर उसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कृषि क्षेत्र के लिए ऐसी नीति की जरूरत है जो किसान की आय, खाद्य सुरक्षा, पानी, मिट्टी, पर्यावरण और ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाए। शर्मा के मुताबिक, भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार कृषि मॉडल विकसित करना होगा, न कि दूसरे देशों की नीतियों की आंख बंद करके नकल करनी होगी।


