नई दिल्ली: हवाई सफर को आमतौर पर सबसे सुरक्षित परिवहन माध्यमों में गिना जाता है, लेकिन कई बार उड़ान के दौरान अचानक विमान के हिलने-डुलने से यात्रियों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। इसे टर्बुलेंस (Turbulence) कहा जाता है। हाल में एयर इंडिया की फुकेट-दिल्ली फ्लाइट में करीब 300 फीट की अचानक ऊंचाई कम होने की घटना ने एक बार फिर विमान में टर्बुलेंस और फ्लाइट सेफ्टी को लेकर चर्चा तेज कर दी है। हालांकि, इस घटना को सामान्य मौसम संबंधी टर्बुलेंस मानना सही नहीं होगा, क्योंकि मामले की जांच अलग-अलग पहलुओं को ध्यान में रखकर की जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 अगस्त 2026 को एयर इंडिया की AI2379 फ्लाइट फुकेट से दिल्ली आ रही थी। उड़ान के दौरान विमान अचानक करीब 300 फीट नीचे आ गया। घटना में यात्रियों और क्रू के कई सदस्य घायल हुए। बाद में फ्लाइट के पायलट के ड्रग टेस्ट को लेकर भी मामला सामने आया। रॉयटर्स के अनुसार, पायलट के कन्फर्मेटरी टेस्ट में मारिजुआना पॉजिटिव पाया गया। हालांकि, विमान के अचानक नीचे आने का सीधा कारण क्या था, इसकी जांच अभी जारी है। एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) ने भी जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने को कहा है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि पायलट के ड्रग टेस्ट का पॉजिटिव आना और विमान के 300 फीट नीचे आने की वजह एक ही होना साबित नहीं हुआ है। दोनों घटनाओं के बीच संबंध की जांच की जा रही है।
क्या होता है टर्बुलेंस?
टर्बुलेंस उस स्थिति को कहा जाता है जब विमान अस्थिर या तेजी से बदलती हवा के क्षेत्र से गुजरता है। ऐसी स्थिति में विमान को अचानक झटके लग सकते हैं और यात्रियों को ऐसा महसूस हो सकता है कि विमान ऊपर-नीचे हो रहा है।
टर्बुलेंस कई कारणों से पैदा हो सकता है। बादलों के भीतर तेज हवा, आंधी-तूफान, पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठने वाली हवा, अलग-अलग तापमान और गति वाली हवाओं का मिलना इसके प्रमुख कारण हैं। कई बार क्लियर-एयर टर्बुलेंस (Clear Air Turbulence) भी हो सकता है, जिसमें आसमान साफ दिखाई देता है, लेकिन ऊंचाई पर हवा में अस्थिरता मौजूद होती है।
आधुनिक यात्री विमान इस तरह की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाते हैं। हालांकि, तेज टर्बुलेंस यात्रियों के लिए चोट का कारण बन सकता है, खासकर तब जब वे सीट बेल्ट न लगाए हों।
दुनिया का सबसे टर्बुलेंट फ्लाइट रूट कौन सा है?
दुनिया के सबसे ज्यादा टर्बुलेंस वाले फ्लाइट रूट्स की रैंकिंग साल-दर-साल बदल सकती है। इसका कारण मौसम, हवा की स्थिति और इस्तेमाल किए गए डेटा का अलग होना है।
टर्बुलेंस डेटा का विश्लेषण करने वाली वेबसाइट Turbli की 2025 की रैंकिंग के मुताबिक, दुनिया का सबसे ज्यादा औसत टर्बुलेंस वाला रूट अर्जेंटीना के मेंडोजा (Mendoza) और चिली के सैंटियागो (Santiago) के बीच था। करीब 196 किलोमीटर लंबे इस रूट का औसत टर्बुलेंस स्कोर 22.983 EDR रहा।
इसके पीछे एक बड़ा कारण एंडीज पर्वत श्रृंखला का प्रभाव माना जाता है। पहाड़ी इलाकों के ऊपर और आसपास हवा के प्रवाह में तेजी से बदलाव हो सकता है। खासकर जब तेज हवाएं पहाड़ों से टकराती हैं, तो वातावरण में ऐसी स्थितियां बन सकती हैं जिनसे विमान को झटके महसूस होते हैं।
हिमालय वाला रूट भी बेहद चुनौतीपूर्ण
भारत के बिल्कुल पड़ोस में स्थित हिमालयी क्षेत्र का काठमांडू-ल्हासा रूट भी टर्बुलेंस के लिए जाना जाता है। यह रूट नेपाल की राजधानी काठमांडू से तिब्बत के ल्हासा तक जाता है और इसकी दूरी करीब 571 किलोमीटर है।
2024 के Turbli आंकड़ों में काठमांडू-ल्हासा रूट दुनिया के सबसे ज्यादा औसत टर्बुलेंस वाले रूट्स में पांचवें स्थान पर था, जिसका औसत EDR स्कोर 18.817 रहा।
हिमालय की ऊंची चोटियों और जटिल भू-भाग के कारण इस इलाके में हवा का प्रवाह काफी तेजी से बदल सकता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाली उड़ानों में यात्रियों को कभी-कभी तेज झटके महसूस हो सकते हैं।
अमेरिका में भी हैं कई टर्बुलेंट रूट
टर्बुलेंस केवल हिमालय या एंडीज जैसे पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी कुछ फ्लाइट रूट्स पर औसत टर्बुलेंस अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किया गया है।
Turbli की 2025 रैंकिंग में अल्बुकर्क से डेनवर के बीच का करीब 561 किलोमीटर का रूट भी सबसे अधिक टर्बुलेंस वाले छोटे रूट्स में शामिल था। इसका औसत EDR स्कोर 18.18 दर्ज किया गया।
यूरोप का कौन सा रूट ज्यादा टर्बुलेंट है?
यूरोप में फ्रांस के नीस और स्विट्जरलैंड के जेनेवा के बीच का रूट टर्बुलेंस के लिहाज से प्रमुख रूट्स में शामिल है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार इस करीब 299 किलोमीटर लंबे रूट का औसत टर्बुलेंस स्कोर 15.367 EDR था, जो उस साल यूरोप में सबसे ज्यादा था।
इस क्षेत्र में आल्प्स और आसपास के पहाड़ी भू-भाग का मौसम और हवा की गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
अफ्रीका में डरबन-जोहानसबर्ग रूट
अफ्रीका में डरबन से जोहानसबर्ग के बीच की उड़ान भी टर्बुलेंस के मामले में उल्लेखनीय है। Turbli की 2025 रैंकिंग में इस 478 किलोमीटर के रूट का औसत टर्बुलेंस स्कोर 14.707 EDR रहा और यह एशिया-प्रशांत वर्गीकरण में शीर्ष पर रहा।
इस तरह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में टर्बुलेंस वाले रूट अलग-अलग हो सकते हैं। किसी एक रूट को हमेशा के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक कहना सही नहीं होगा, क्योंकि टर्बुलेंस की स्थिति मौसम और समय के साथ बदलती रहती है।
टर्बुलेंस में यात्रियों को क्या करना चाहिए?
टर्बुलेंस के दौरान सबसे जरूरी बात है कि यात्री सीट बेल्ट लगाए रखें। विमान के अंदर अचानक झटका लगने पर बिना सीट बेल्ट के बैठे यात्री अपनी सीट से ऊपर उठ सकते हैं और गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं।
विमान में सीट बेल्ट का साइन बंद होने के बाद भी सीट बेल्ट हल्के से बांधे रखना सुरक्षित माना जाता है। खासकर लंबी उड़ानों में यात्री अक्सर सीट पर सो जाते हैं और अचानक होने वाले टर्बुलेंस के दौरान चोट लगने का जोखिम बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, टर्बुलेंस डरावना जरूर लग सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विमान दुर्घटनाग्रस्त होने वाला है। आधुनिक विमानों और एविएशन सिस्टम में मौसम और हवा से जुड़ी परिस्थितियों की निगरानी के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, हालिया एयर इंडिया मामले में विमान के अचानक नीचे आने की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।


