Indian Oil Export: भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है और रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बनकर उभरा है। लेकिन अब ग्लोबल एनर्जी मार्केट में एक ऐसा बदलाव देखने को मिल रहा है, जो पहली नजर में हैरान करने वाला है। जिस रूस से भारत भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, अब उसी रूस को भारत से पेट्रोल मंगाना पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने भारत से पेट्रोल की पहली खेप हासिल कर ली है। इसके पीछे रूस की रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों का बड़ा असर बताया जा रहा है। कई रिफाइनरियों के प्रभावित होने से रूस के घरेलू बाजार में पेट्रोल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा और उसे विदेशों से ईंधन मंगाने की जरूरत पड़ गई।
यह घटनाक्रम इसलिए भी खास है क्योंकि रूस खुद दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में रूस का भारत जैसे देश से पेट्रोल खरीदना वैश्विक तेल कारोबार में बदलते समीकरण को दिखाता है।
भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है, फिर पेट्रोल बेचने की नौबत क्यों आई?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है। रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। भारतीय रिफाइनरियां रूस से मिलने वाले कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करती हैं।
यहीं से भारत की एक अहम ताकत सामने आती है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक जरूर है, लेकिन उसकी रिफाइनिंग क्षमता इतनी मजबूत है कि वह पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है।
दूसरे शब्दों में समझें तो भारत कच्चा तेल विदेश से खरीदता है, उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है और उससे तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का एक हिस्सा घरेलू बाजार में इस्तेमाल करने के साथ-साथ विदेशों को भी बेचता है।
रूस में इस समय समस्या कच्चे तेल की उपलब्धता से ज्यादा रिफाइनिंग क्षमता और घरेलू पेट्रोल सप्लाई की है। यूक्रेन के ड्रोन हमलों में रूसी रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचने के कारण देश की पेट्रोल उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। Reuters के मुताबिक, एक समय रूस की करीब 40 फीसदी रिफाइनिंग क्षमता कम से कम दो महीने के लिए प्रभावित बताई गई थी।
रूस में पेट्रोल की कमी कितनी गंभीर है?
रूस में ईंधन संकट का असर कई इलाकों में देखने को मिला। पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगीं और कुछ क्षेत्रों में पेट्रोल की बिक्री पर प्रतिबंध या राशनिंग जैसे कदम भी उठाए गए।
रूस सरकार को घरेलू बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए पेट्रोल के निर्यात पर रोक लगाने और दूसरे देशों से ईंधन खरीदने जैसे कदम उठाने पड़े। रिपोर्ट्स में इस संकट को सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के सबसे गंभीर ईंधन संकटों में से एक बताया गया है।
यानी स्थिति ऐसी हो गई कि रूस के पास पर्याप्त कच्चा तेल होने के बावजूद उसे पेट्रोल की कमी का सामना करना पड़ा। इसकी मुख्य वजह यह है कि कच्चे तेल को पेट्रोल में बदलने के लिए रिफाइनरियां जरूरी होती हैं और यूक्रेनी हमलों ने इसी क्षमता को प्रभावित किया।
भारत से रूस पहुंची पेट्रोल की पहली खेप
केप्लर और शिप-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, भारत से रूस के लिए पेट्रोल की सप्लाई की शुरुआत समुद्री रास्ते से हुई। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, भारत से कम से कम 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल रूस की ओर भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी।
इस कारोबार में गुजरात के वाडिनार स्थित रिफाइनरी का नाम सामने आया है। यह रिफाइनरी नायरा एनर्जी की है। कंपनी में रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट की करीब 49 फीसदी हिस्सेदारी है।
एक खेप में करीब 42,000 टन पेट्रोल वाडिनार से लोड किया गया। इसके बाद कार्गो को मिस्र के डामिएटा क्षेत्र के पास दूसरे जहाज में ट्रांसफर किया गया और फिर रूस की ओर भेजा गया। यह शिप-टू-शिप ट्रांसफर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पेट्रोल की सप्लाई सीधे एक ही जहाज से भारत से रूस तक जाने के बजाय कई चरणों में हुई।
नायरा एनर्जी की क्या भूमिका है?
इस पूरे मामले में नायरा एनर्जी का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी की वाडिनार रिफाइनरी बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता रखती है और रूस की रोसनेफ्ट इसमें बड़ी हिस्सेदारी रखती है।
Reuters के मुताबिक, नायरा की वाडिनार रिफाइनरी की क्षमता करीब 4 लाख बैरल प्रतिदिन है। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि यूरोपीय प्रतिबंधों और अन्य कारोबारी दिक्कतों के बाद कंपनी ने अपने क्रूड और रिफाइंड उत्पादों के कारोबार में ट्रेडर्स पर अधिक निर्भरता दिखाई है।
हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। नायरा एनर्जी ने रूस की कंपनियों को सीधे ईंधन बेचने से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि उसका प्राथमिकता भारतीय बाजार और देशभर में अपने ग्राहकों को ईंधन की पर्याप्त सप्लाई करना है। भारत के पेट्रोलियम मंत्री ने भी कहा था कि भारतीय कंपनियां सीधे रूस को ईंधन नहीं बेच रही हैं, हालांकि ट्रेडर्स के जरिए भारतीय मूल का ईंधन रूस तक पहुंचना संभव है।
पेट्रोल दूसरे जहाजों में क्यों ट्रांसफर किया गया?
भारत से रूस तक पेट्रोल की इस सप्लाई में सबसे दिलचस्प हिस्सा इसका समुद्री रास्ता है। उपलब्ध शिप-ट्रैकिंग जानकारी के अनुसार, भारत के वाडिनार से पेट्रोल लोड करने के बाद जहाज मिस्र के डामिएटा क्षेत्र तक पहुंचे। वहां पेट्रोल को दूसरे जहाजों में ट्रांसफर किया गया और फिर रूस की तरफ रवाना किया गया।
इस तरह के ship-to-ship transfer से अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार में जटिल लॉजिस्टिक्स का इस्तेमाल होता है। इसमें एक जहाज से दूसरे जहाज में कार्गो स्थानांतरित किया जाता है और इसके बाद नया जहाज अंतिम गंतव्य की ओर बढ़ता है।
Reuters ने बताया कि वाडिनार से एक अन्य टैंकर ने भी करीब 40,000 टन पेट्रोल लोड किया था और बाद में मिस्र के पास दूसरे जहाज में ट्रांसफर की प्रक्रिया हुई। इससे संकेत मिलता है कि रूस की पेट्रोल जरूरत पूरी करने के लिए भारत से एक से अधिक खेप भेजी जा सकती हैं।
क्या रूस भारत से सिर्फ पेट्रोल ही खरीदेगा?
फिलहाल सबसे ज्यादा ध्यान पेट्रोल की सप्लाई पर है, क्योंकि रूस में इसकी कमी सबसे गंभीर बनी हुई थी। Reuters के मुताबिक, अगर रिफाइनरियों पर हमले जारी रहते हैं तो रूस को भविष्य में डीजल जैसे अन्य ईंधनों के आयात की जरूरत भी पड़ सकती है, हालांकि उस समय डीजल की स्थिति पेट्रोल की तुलना में बेहतर बताई गई थी।
रूस ने घरेलू सप्लाई को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें पेट्रोल निर्यात पर प्रतिबंध, दूसरे देशों से ईंधन खरीदना और घरेलू बाजार में सप्लाई को प्राथमिकता देना शामिल है।
‘उल्टी गंगा’ का असली मतलब क्या है?
भारत और रूस के ऊर्जा कारोबार की सामान्य तस्वीर में रूस भारत को कच्चा तेल बेचता है और भारत उस कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोल-डीजल समेत कई उत्पाद तैयार करता है। लेकिन मौजूदा हालात में तस्वीर कुछ समय के लिए उलट गई है।
रूस से भारत में आने वाला कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों में प्रोसेस होता है और उसी रिफाइनिंग इकोसिस्टम से तैयार पेट्रोल रूस के बाजार तक पहुंच रहा है। यही वजह है कि इसे ऊर्जा कारोबार की ‘उल्टी गंगा’ कहा जा रहा है।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि भारत अब रूस का नियमित पेट्रोल सप्लायर बन गया है। फिलहाल यह एक असाधारण परिस्थिति में हुई सप्लाई है, जिसका मुख्य कारण रूस की रिफाइनिंग क्षमता पर पड़ा दबाव है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
यह घटनाक्रम भारत की रिफाइनिंग क्षमता और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। भारत भले ही कच्चे तेल के लिए विदेशों पर निर्भर है, लेकिन उसके पास बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है। यही वजह है कि वह कच्चे तेल को वैल्यू-एडेड पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर वैश्विक बाजार में बेच सकता है।
दूसरी तरफ, रूस की स्थिति यह दिखाती है कि दुनिया का बड़ा तेल उत्पादक होना और घरेलू पेट्रोल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना दो अलग-अलग बातें हैं। अगर रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर किसी कारण से प्रभावित होता है तो कच्चा तेल उपलब्ध होने के बावजूद पेट्रोल की कमी पैदा हो सकती है।
भारत-रूस के इस नए ऊर्जा समीकरण पर आगे भी नजर रहेगी। अगर रूस की रिफाइनरियों पर हमले जारी रहते हैं और घरेलू पेट्रोल उत्पादन सामान्य स्तर पर नहीं लौटता, तो भारत से पेट्रोल की और खेप भेजे जाने की संभावना बनी रह सकती है।
निष्कर्ष: भारत और रूस के बीच तेल कारोबार की यह कहानी वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलते समीकरण की बड़ी मिसाल है। एक तरफ भारत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस को अपनी रिफाइनिंग क्षमता पर पड़े दबाव के कारण भारत से तैयार पेट्रोल लेना पड़ रहा है। यानी कच्चे तेल के मामले में रूस भारत का सप्लायर है, लेकिन तैयार ईंधन के मामले में फिलहाल भारत रूस की मदद कर रहा है।


